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=== पाण्डवों का जन्म तथा लाक्षागृह षडयन्त्र ===
[[चित्र:Barnava (1).JPG|thumb|left|वार्णावत (वर्तमान [[बरनावा]]) स्थित लाक्षागृह के सुरक्षित अवशेष]]
'''[[पाण्डु|राजा पाण्डु]]''' के कहने पर [[कुन्ती]] ने [[दुर्वासा]] [[ऋषि]] के दिये [[मन्त्र]] से [[धर्मयमराज]] को आमन्त्रित कर उनसे [[युधिष्ठिर]] और कालान्तर में [[वायु देवता|वायुदेव]] से [[भीम]] तथा [[इन्द्र]] से [[अर्जुन]] को उत्पन्न किया। [[कुन्ती]] से ही उस [[मन्त्र]] की [[दीक्षा]] ले माद्री ने [[अश्विनी कुमार|अश्वनीकुमारों]] से [[नकुल]] तथा [[सहदेव]] को जन्म दिया। एक दिन राजा [[पाण्डु]] [[माद्री]] के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण करते हुए [[पाण्डु]] के मन चंचल हो जाने से [[मैथुन]] में प्रवृत हुये जिससे शापवश उनकी मृत्यु हो गई। [[माद्री]] उनके साथ [[सती]] हो गई किन्तु पुत्रों के पालन-पोषण के लिये [[कुन्ती]] [[हस्तिनापुर]] लौट आई। [[कुन्ती]] ने विवाह से पहले [[सूर्य देवता|सूर्य]] के अंश से [[कर्ण]] को जन्म दिया और लोकलाज के भय से [[कर्ण]] को [[गंगा]] नदी में बहा दिया। [[धृतराष्ट्र]] के [[सारथी]] [[अधिरथ]] ने उसे बचाकर उसका पालन किया। [[कर्ण]] की रुचि युद्धकला में थी अतः [[द्रोणाचार्य]] के मना करने पर उसने [[परशुराम]] से शिक्षा प्राप्त की। [[शकुनि]] के छलकपट से [[दुर्योधन]] ने [[पाण्डव|पाण्डवों]] को बचपन में कई बार मारने का प्रयत्न किया तथा युवावस्था में भी जब [[युधिष्ठिर]] को युवराज बना दिया गया तो लाक्ष के बने हुए घर [[लाक्षाग्रह]] में [[पाण्डव|पाण्डवों]] को भेजकर उन्हें आग से जलाने का प्रयत्न किया, किन्तु [[विदुर]] की सहायता के कारण से वे उस जलते हुए गृह से बाहर निकल गये।
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:'''[[युधिष्ठिर|धर्मराज युधिष्ठिर]]''' सात [[अक्षौहिणी]] सेना के स्वामी होकर [[कौरव|कौरवों]] के साथ युद्ध करने को तैयार हुए। पहले भगवान [[श्रीकृष्ण]] [[दुर्योधन]] के पास दूत बनकर गये। उन्होंने ग्यारह [[अक्षौहिणी]] सेना के स्वामी राजा [[दुर्योधन]] से कहा कि तुम [[युधिष्ठिर]] को आधा राज्य दे दो या केवल पाँच ही गाँव अर्पित कर युद्ध टाल दों।
 
:[[श्रीकृष्ण]] की बात सुनकर [[दुर्योधन]] ने [[पाण्डव|पाण्डवों]] को सुई की नोक के बराबर भूमि भी देने से मना कर युद्ध करने का निशचय किया। ऐसा कहकर वह भगवान [[श्रीकृष्ण]] को बंदी बनाने के लिये उद्यत हो गया। उस समय राजसभा में भगवान [[श्रीकृष्ण]] ने [[माया]] से अपने परम दुर्धर्ष [[विश्वरूप]] का दर्शन कराकर सबको भयभीत कर दिया। तदनन्तर वे [[युधिष्ठिर]] के पास लौट गये और बोले कि [[दुर्योधन]] के साथ युद्ध करो। [[युधिष्ठिर]] और [[दुर्योधन]] की सेनाएँ [[कुरुक्षेत्र]] के मैदान में जा डटीं। अपने विपक्ष में पितामह [[भीष्म]] तथा आचार्य [[द्रोणाचार्य|द्रोण]] आदि गुरुजनों को देखकर [[अर्जुन]] युद्ध से विरत हो गये।
 
:तब भगवान [[श्रीकृष्ण]] ने उनसे कहा-"पार्थ! [[भीष्म]] आदि गुरुजन शोक के योग्य नहीं हैं। मनुष्य का शरीर विनाशशील है, किंतु आत्मा का कभी नाश नहीं होता। यह आत्मा ही [[परब्रह्म]] है। 'मैं [[ब्रह्म]] हूँ'- इस प्रकार तुम उस [[आत्मा]] का अस्तित्व समझो। कार्य की सिद्धि और असिद्धि में समानभाव से रहकर कर्मयोग का आश्रय ले क्षात्रधर्म का पालन करो। इस प्रकार [[श्रीकृष्ण]] के ज्ञानयोग, भक्तियोग एवं कर्मयोग के बारे में विस्तार से कहने पर [[अर्जुन]] ने फिर से रथारूढ़ हो युद्ध के लिये [[शंख|शंखध्वनि]] की।
 
:दुर्योधन की सेना में सबसे पहले पितामह [[भीष्म]] सेनापति हुए। पाण्डवों के सेनापति [[धृष्टद्युम्न]] थे। इन दोनों में भारी युद्ध छिड़ गया। भीष्मसहित [[कौरव]] पक्ष के योद्धा उस युद्ध में पाण्डव-पक्ष के सैनिकों पर प्रहार करने लगे और [[शिखण्डी]] आदि पाण्डव- पक्ष के वीर कौरव-सैनिकों को अपने बाणों का निशाना बनाने लगे। कौरव और पाण्डव-सेना का वह युद्ध, देवासुर-संग्राम के समान जान पड़ता था। आकाश में खड़े होकर देखने वाले [[देवता|देवताओं]] को वह युद्ध बड़ा आनन्ददायक प्रतीत हो रहा था। भीष्म ने दस दिनों तक युद्ध करके पाण्डवों की अधिकांश सेना को अपने बाणों से मार गिराया।
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=== भीष्म और द्रोण वध ===
[[चित्र:Arrowbed.jpg|thumb|right|200px|बाणो की शय्या पर लेटे भीष्म]]
'''[[भीष्म]]''' ने दस दिनों तक युद्ध करके [[पाण्डव|पाण्डवों]] की अधिकांश सेना को अपने बाणों से मार गिराया। [[भीष्म]] की मृत्यु उनकी इच्छा के अधीन थी। [[श्रीकृष्ण]] के सुझाव पर [[पाण्डव|पाण्डवों]] ने [[भीष्म]] से ही उनकी मृत्यु का उपाय पूछा। [[भीष्म]] ने कहा कि पांडव [[शिखंडी]] को सामने करके युद्ध लड़े। [[भीष्म]] उसे कन्या ही मानते थे और उसे सामने पाकर वो शस्त्र नहीं चलाने वाले थे। और [[शिखंडी]] को अपने पूर्व जन्म के अपमान का बदला भी लेना था उसके लिये शिवजी से वरदान भी लिया कि [[भीष्म]] कि मृत्यु का कारण बनेगी। १०वे दिन के युद्ध में [[अर्जुन]] ने [[शिखंडी]] को आगे अपने रथ पर बिठाया और [[शिखंडी]] को सामने देख कर [[भीष्म]] ने अपना धनुष त्याग दिया और [[अर्जुन]] ने अपनी बाणवृष्टि से उन्हें बाणों कि शय्या पर सुला दिया। तब आचार्य [[द्रोण]] ने सेनापतित्व का भार ग्रहण किया। फिर से दोनों पक्षो में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। [[मतस्यनरेश विराट]] और [[द्रुपद]] आदि राजा द्रोणरूपी समुद्र में डूब गये थे। लेकिन जब पाण्डवो ने छ्ल से द्रोण को यह विश्वास दिला दिया कि [[अश्वत्थामा]] मारा गया। तो आचार्य द्रोण ने निराश हों [[अस्त्र शस्त्र]] त्यागकर उसके बाद [[योग]] [[समाधि]] ले कर अपना शरीर त्याग दिया। ऐसे समय में [[धृष्टद्युम्न]] ने [[योग]] [[समाधि]] लिए [[द्रोण]] का मस्तक तलवार से काट कर भूमि पर गिरा दिया।
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=== कर्ण और शल्य वध ===
[[चित्र:Arjunakaranbattle.jpg|left|thumb|175px|कर्ण और अर्जुन का युद्ध]]'''[[द्रोण|द्रोण वध]]''' के पश्चात [[कर्ण]] कौरव सेना का कर्णधार हुआ। [[कर्ण]] और [[अर्जुन]] में भाँति-भाँति के [[अस्त्रशस्त्र|अस्त्र-शस्त्रों]] से युक्त महाभयानक युद्ध हुआ, जो देवासुर-संग्राम को भी मात करने वाला था। [[कर्ण]] और [[अर्जुन]] के संग्राम में [[कर्ण]] ने अपने बाणों से शत्रु-पक्ष के बहुत-से वीरों का संहार कर डाला। यद्यपि युद्ध गतिरोधपूर्ण हो रहा था लेकिन [[कर्ण]] तब उलझ गया जब उसके रथ का एक पहिया धरती में धँस गया। गुरु [[परशुराम]] के शाप के कारण वह अपने को [[दिव्यास्त्र|दैवीय अस्त्रों]] के प्रयोग में भी असमर्थ पाकर रथ के पहिए को निकालने के लिए नीचे उतरता है। तब [[श्रीकृष्ण]], [[अर्जुन]] को उसके द्वारा किये [[अभिमन्यु (अर्जुनपुत्र)|अभिमन्यु]] वध, [[कुरु]] सभा में [[द्रोपदी]] को वेश्या और उसकी [[कर्ण]] वध करने की प्रतिज्ञा याद दिलाकर उसे मारने को कहते है, तब [[अर्जुन]] ने एक [[दिव्यास्त्र|दैवीयअंजलिका अस्त्र]] से [[कर्ण]] का सिर धड़ से अलग कर दिया। तदनन्तर राजा [[शल्य]] कौरव-सेना के सेनापति हुए, किंतु वे युद्ध में आधे दिन तक ही टिक सके। दोपहर होते-होते राजा [[युधिष्ठिर]] ने उन्हें मार दिया।
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