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परमपिता [[ब्रह्मा|ब्र्ह्मा]] ने [[मेघनाद]] को आशिर्वाद दिया था कि [[प्रत्यङ्गिरा|देवी प्रत्यङ्गिरा]] के लिए [[यज्ञ]] की समाप्ती के पश्चात उसे एक दिव्य [[रथ]] प्राप्त होगा। इस रथ के रहने से कोई भी प्राणी उसे पराजित नहीं कर सकता। परंतु इस आशिर्वाद को पूर्ण करने के लिए [[यज्ञ]] में किसी भी प्रकार का व्यवधान नहीं होना चाहिए था। मेघनाद ने परमपिता से एक दूसरा वरदान मांगा - उसका वध केवल वही कर सकता है जिसे बारह वर्ष से लगातार नींद नहीं आई थी।
 
इस रीति से [[लक्ष्मण]] ही ऐसा मनुष्य था जो [[मेघनाद]] का वध कर सकता था। [[विभीषण|विभीष्ण]] के र्निर्देशानुसार लक्ष्मण ने मेघनाद के यज्ञ को रोका एवं अंजलिकास्त्र से मेघनाद का वध किया।
 
== [[महाभारत]] ==
[[कुरुक्षेत्र युद्ध]] के सत्रहवे दिन को [[अर्जुन|इन्द्रपुत्र अर्जुन]] एवं [[कर्ण|सूर्यपुत्र कर्ण]] का युद्ध हुआ। अर्जुन के सारथी [[कृष्ण|श्रीकृष्ण]] थें एवं कर्ण के सारथी [[शल्य|मद्रनरेश शल्य]] थें।
 
जब कर्ण ने आगे बढ़ने का प्रयत्न किया, [[पृथ्वी (माता)|भूदेवी]] के दिए गए श्राप से उसके रथ का पहिया कीचड़ में अटक गया। उसने [[ब्रम्हास्त्र]] प्रयोग में लाना चाहा परंतु [[परशुराम]] के दिए गए श्राप के कारण ऐसायह भी संभव नहीं करहो पाया। अंत में विवश होकर उसने पहिए को कीचड़ से निकालने का प्रयत्न किया।
 
कर्ण के हाथों में न अस्त्र थे, न शस्त्र। श्रीकृष्ण के र्निर्देशानुसार ठीक इसी समय अर्जुन ने अंजलिकास्त्र का प्रयोग करके कर्ण का वध किया।
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