"दिक्पाल" के अवतरणों में अंतर

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उत्पन्न हुईं जिनमें मुख्य 6 और 4 गौण थीं। उन लोगों ने ब्रह्मा का नमन कर उनसे रहने का स्थान और उपयुक्त पतियों की याचना की। ब्रह्मा ने कहा तुम लोगों का जिस ओर जाने की इच्छा हो जा सकती हो। शीघ्र ही तुम लोगों को अनुरूप पति भी दूँगा। इसके अनुसार उन कन्याओं ने एक एक दिशा की ओर प्रस्थान किया। इसके पश्चात्‌ ब्रह्मा ने आठ दिग्पालों की सृष्टि की और अपनी कन्याओं को बुलाकर प्रत्येक लोकपाल को एक एक कन्या प्रदान कर दी। इसके बाद वे सभी लोकपाल उन कन्याओं में दिशाओं के साथ अपनी दिशाओं में चले गए। इन दिग्पालों के नाम पुराणों में दिशाओं के क्रम से निम्नांकित है
:(1) पूर्व के [[इंद्र]], (2) दक्षिणपूर्व के [[अग्नि देव|अग्नि]], (3) दक्षिण के [[यमराज|यम]], (4) दक्षिण पश्चिम के [[सूर्यदेव|सूर्य]], (5) पश्चिम के [[वरुण (देव)|वरुण]], (6) पश्चिमोत्तर के [[वायु देव|वायु]], (7) उत्तर के [[कुबेर]] और (8) उत्तरपूर्व के सोम।[[सोमदेव|सोम]]। (कुछ पुराणों में इनके नामों में थोड़ा हेर फेर देख पड़ता है।) शेष दो दिशाओं अर्थात्‌ ऊर्ध्व या आकाश की ओर वे स्वयम्‌ चले गए और नीचे की ओर उन्होंने शेष या अनंत को प्रतिष्ठित किया।
 
== इन्हें भी देखें ==
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