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''' ब्रजभाषा ''' [[हिन्दी]] की एक [[धार्मिक भाषाउपभाषा]] है, जो [[पश्चिमी उत्तर प्रदेश]] एवं [[उत्तराखण्ड|उत्तराखंड]] में बोली जाती है। इसके अलावा यह भाषा [[हरियाणा]], [[राजस्थान]] और [[मध्यप्रदेश]] के कुछ जनपदों में भी बोली जाती है। अन्य भारतीय भाषाओं की तरह ये भी [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] से जन्मी है। इस भाषा में प्रचुर मात्रा में साहित्य उपलब्ध है। भारतीय भक्ति काल में यह भाषा प्रमुख रही।
 
ब्रजभाषा१९वीं शताब्दी में हीहिन्दी/हिन्दुस्तानी प्रारम्भके मेंआने के पहले ब्रजभाषा और [[काव्यअवधी]] ही उत्तर-मध्य भारत की रचनादो हुई।प्रमुख सभीसाहित्यिक भाषाएँ थीं। ब्रजभाषा में ही अनेक भक्त कवियों ने अपनी रचनाएं इसी भाषा में लिखीकी हैं जिनमें प्रमुख हैं [[सूरदास]], [[रहीम]], [[रसखान]], [[केशव]], [[घनानंद]], [[बिहारी]], इत्यादि।
 
== भौगोलिक विस्तार ==
जब से गोकुल [[वल्लभ संप्रदाय]] का केंद्र बना, ब्रजभाषा में [[श्रीकृष्ण|कृष्ण]] विषयक साहित्य लिखा जाने लगा। इसी के प्रभाव से ब्रज की बोली साहित्यिक भाषा बन गई। [[भक्तिकाल]] के प्रसिद्ध महाकवि महात्मा [[सूरदास]] से लेकर आधुनिक काल के विख्यात कवि श्री [[वियोगी हरि]] तक ब्रजभाषा में प्रबंध काव्य तथा मुक्तक काव्य समय समय पर रचे जाते रहे।
 
== स्वरूप ==
जनपदीय जीवन के प्रभाव से ब्रजभाषा के कई रूप हमें दृष्टिगोचर होते हैं। किंतु थोड़े से अंतर के साथ उनमें एकरूपता की स्पष्ट झलक हमें देखने को मिलती है।
 
ब्रजभाषा की अपनी रूपगत प्रकृति '''औ'''कारान्त है अर्थात् इसकी एकवचनीय पुंलिंग संज्ञाएँ तथा विशेषण प्राय: औकारान्त होते हैं; जैसे खुरपौ, यामरौ, माँझौ आदि संज्ञा शब्द औकारांत हैं। इसी प्रकार कारौ, गोरौ, साँवरौ आदि विशेषण पद औकारांत है। क्रिया का सामान्य भूतकालिक एकवचन पुंलिंग रूप भी ब्रजभाषा में प्रमुखरूपेण औकारान्त ही रहता है। यह बात अलग है कि उसके कुछ क्षेत्रों में "य्" श्रुति का आगम भी पाया जाता है। जिला अलीगढ़ की तहसील कोल की बोली में सामान्य भूतकालीन रूप "य्" श्रुति से रहित मिलता है, लेकिन जिला मथुरा तथा दक्षिणी बुलंदशहर की तहसीलों में "य्" श्रुति अवश्य पाई जाती है। जैसे :
 
"""कारौ छोरा बोलौ"" - (कोल, जिला [[अलीगढ़]])
 
:""कारौ छोरा बोल्यौ"" - (माट जिला [[मथुरा]])
 
:""कारौ छोरा बोल्यौ"" - (डीग जिला [[भरतपुर जिला|भरतपुर]])
 
:""कारौ लौंडा बोल्यौ"" - (बरन, जिला [[बुलंदशहर]])।
 
कन्नौजी की अपनी प्रकृति '''ओकारान्त''' है। संज्ञा, विशेषण तथा क्रिया के रूपों में ब्रजभाषा जहाँ औकारान्तता लेकर चलती है वहाँ कन्नौजी ओकारांतता का अनुसरण करती है। जिला अलीगढ़ की जलपदीय ब्रजभाषा में यदि हम कहें कि- ""कारौ छोरा बोलौ"" (= काला लड़का बोला) तो इसे ही कन्नौजी में कहेंगे कि-""कारो लरिका बोलो। भविष्यत्कालीन क्रिया कन्नौजी में तिङंतरूपिणी होती है, लेकिन ब्रजभाषा में वह कृदंतरूपिणी पाई जाती है। यदि हम "लड़का जाएगा" और "लड़की जाएगी" वाक्यों को कन्नौजी तथा ब्रजभाषा में रूपांतरित करके बोलें तो निम्नांकित रूप प्रदान करेंगे :
 
: कन्नौजी में - (1) लरिका जइहै। (2) बिटिया जइहै।
 
: ब्रजभाषा में - (1) छोरा जाइगौ। (2) छोरी जाइगी।
 
उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि ब्रजभाषा के सामान्य भविष्यत् काल रूप में क्रिया कर्ता के लिंग के अनुसार परिवर्तित होती है, जब कि कन्नौजी में एक रूप रहती है।
 
इसके अतिरिक्त [[कन्नौजी]] में अवधी की भाँति विवृति (Hiatus) की प्रवृत्ति भी पाई जाती है जिसका ब्रजभाषा में अभाव है। कन्नौजी के संज्ञा, सर्वनाम आदि वाक्यपदों में संधिराहित्य प्राय: मिलता है, किंतु ब्रजभाषा में वे पद संधिगत अवस्था में मिलते हैं। उदाहरण :
 
:(1) कन्नौजी -""बउ गओ"" (= वह गया)।
 
:(2) ब्रजभाषा -""बो गयौ"" (= वह गया)।
 
उपर्युक्त वाक्यों के [[सर्वनाम]] पद "बउ" तथा "बो" में संधिराहित्य तथा संधि की अवस्थाएँ दोनों भाषाओं की प्रकृतियों को स्पष्ट करती हैं।
 
== ब्रजभाषा की बोलियाँ ==
(5) '''जादोबाटी ब्रजभाषा''' - करौली के क्षेत्र तथा चंबल नदी के मैदान में बोली जानेवाली ब्रजभाषा को "जादौबारी" नाम से पुकारा गया है। यहाँ जादौ (यादव) राजपूतों की बस्तियाँ हैं।
 
(6) ''' कन्नौजी से प्रभावित ब्रजभाषा''' - [[एटा जिला|जिला एटा]] तथा तहसील अनूपशहर एवं अतरौली की भाषा कन्नौजी से प्रभावित है।
 
ब्रजभाषी क्षेत्र की जनपदीय ब्रजभाषा का रूप पश्चिम से पूर्व की ओर कैसा होता चला गया है, इसके लिए निम्नांकित उदाहरण द्रष्टव्य हैं :
 
[[ग्वालियर]] (पश्चिमी भाग) में - "बानैं एक् बोकरा पाल लओ। तब बौ आनंद सै रैबे लगो।""
 
== स्वरूप ==
जनपदीय जीवन के प्रभाव से ब्रजभाषा के कई रूप हमें दृष्टिगोचर होते हैं। किंतु थोड़े से अंतर के साथ उनमें एकरूपता की स्पष्ट झलक हमें देखने को मिलती है।
 
ब्रजभाषा की अपनी रूपगत प्रकृति '''औ'''कारान्त है अर्थात् इसकी एकवचनीय पुंलिंग संज्ञाएँ तथा विशेषण प्राय: औकारान्त होते हैं; जैसे खुरपौ, यामरौ, माँझौ आदि संज्ञा शब्द औकारांत हैं। इसी प्रकार कारौ, गोरौ, साँवरौ आदि विशेषण पद औकारांत है। क्रिया का सामान्य भूतकालिक एकवचन पुंलिंग रूप भी ब्रजभाषा में प्रमुखरूपेण औकारान्त ही रहता है। यह बात अलग है कि उसके कुछ क्षेत्रों में "य्" श्रुति का आगम भी पाया जाता है। जिला अलीगढ़ की तहसील कोल की बोली में सामान्य भूतकालीन रूप "य्" श्रुति से रहित मिलता है, लेकिन जिला मथुरा तथा दक्षिणी बुलंदशहर की तहसीलों में "य्" श्रुति अवश्य पाई जाती है। जैसे :
 
"""कारौ छोरा बोलौ"" - (कोल, जिला [[अलीगढ़]])
 
:""कारौ छोरा बोल्यौ"" - (माट जिला [[मथुरा]])
 
:""कारौ छोरा बोल्यौ"" - (डीग जिला [[भरतपुर जिला|भरतपुर]])
 
:""कारौ लौंडा बोल्यौ"" - (बरन, जिला [[बुलंदशहर]])।
 
कन्नौजी की अपनी प्रकृति '''ओकारान्त''' है। संज्ञा, विशेषण तथा क्रिया के रूपों में ब्रजभाषा जहाँ औकारान्तता लेकर चलती है वहाँ कन्नौजी ओकारांतता का अनुसरण करती है। जिला अलीगढ़ की जलपदीय ब्रजभाषा में यदि हम कहें कि- ""कारौ छोरा बोलौ"" (= काला लड़का बोला) तो इसे ही कन्नौजी में कहेंगे कि-""कारो लरिका बोलो। भविष्यत्कालीन क्रिया कन्नौजी में तिङंतरूपिणी होती है, लेकिन ब्रजभाषा में वह कृदंतरूपिणी पाई जाती है। यदि हम "लड़का जाएगा" और "लड़की जाएगी" वाक्यों को कन्नौजी तथा ब्रजभाषा में रूपांतरित करके बोलें तो निम्नांकित रूप प्रदान करेंगे :
 
: कन्नौजी में - (1) लरिका जइहै। (2) बिटिया जइहै।
 
: ब्रजभाषा में - (1) छोरा जाइगौ। (2) छोरी जाइगी।
 
उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि ब्रजभाषा के सामान्य भविष्यत् काल रूप में क्रिया कर्ता के लिंग के अनुसार परिवर्तित होती है, जब कि कन्नौजी में एक रूप रहती है।
 
इसके अतिरिक्त [[कन्नौजी]] में अवधी की भाँति विवृति (Hiatus) की प्रवृत्ति भी पाई जाती है जिसका ब्रजभाषा में अभाव है। कन्नौजी के संज्ञा, सर्वनाम आदि वाक्यपदों में संधिराहित्य प्राय: मिलता है, किंतु ब्रजभाषा में वे पद संधिगत अवस्था में मिलते हैं। उदाहरण :
 
:(1) कन्नौजी -""बउ गओ"" (= वह गया)।
 
:(2) ब्रजभाषा -""बो गयौ"" (= वह गया)।
 
उपर्युक्त वाक्यों के [[सर्वनाम]] पद "बउ" तथा "बो" में संधिराहित्य तथा संधि की अवस्थाएँ दोनों भाषाओं की प्रकृतियों को स्पष्ट करती हैं।
 
==ब्रजभाषा का व्याकरण==