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उपर्युक्त वाक्यों के [[सर्वनाम]] पद "बउ" तथा "बो" में संधिराहित्य तथा संधि की अवस्थाएँ दोनों भाषाओं की प्रकृतियों को स्पष्ट करती हैं।
 
==ब्रजभाषा का अन्य भाषाओं से सह अस्तित्व==
पश्चिम में राजस्थान तो ब्रजभाषा शैलियों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में करता ही रहा ,गुजरात और कच्छ तक ब्रजभाषा शैली समादृत थी। कच्छ के महाराव लखपत बड़े विद्याप्रेमी थे। ब्रजभाषा के प्रचार और प्रशिक्षण के लिए इन्होंने एक विद्यालय भी खोला था।
 
===सधुक्कड़ी===
संत कवियों के सगुण भक्ति के पदों की भाषा तो ब्रज या परंपरागत काव्यभाषा है, पर निर्गुनबानी की भाषा नाथपंथियों द्वारा गृहीत खड़ी बोली या सधुक्कड़ी भाषा है। प्राचीन रचनाओं में ब्रजी और खड़ी बोली के रुपों का सह-अस्तित्व मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि पद-काव्यरुप के लिए ब्रजी का प्रयोग रुढ़ होता जा रहा था। [[नाथ सम्प्रदाय|नाथ]] और संत भी गीतों में इसी शैली का प्रयोग करते थे। सैद्धांतिक चर्चा या निर्गुन वाणी सधुक्कड़ी में होती थी।
 
===गुजरात और ब्रजभाषा===
गुजरात की आरंभिक रचनाओं में [[शौरसेनी]] अपभ्रंश की स्पष्ट छाया है। नरसी, केशवदास आदि कवियों की भाषा पर ब्रजभाषा का प्रभाव भी है और उन्होंने ब्रजी में काव्य रचना भी की है। [[हेमचंद्र]] के शौरसेनी के उदाहरणों की भाषा ब्रजभाषा की पूर्वपीठिका है। गुजरात के अनेक कवियों ने ब्रजभाषा अथवा ब्रजी मिश्रित भाषा में कविता की। भालण, केशवदास तथा अरवा आदि कवियों का नाम इस संबंध में उल्लेखनीय है। अष्टछापी कवि [[कृष्णदास]] भी गुजरात के ही थे। गुजरात में ब्रजभाषा कवियों की एक दीर्घ परम्परा है जो बीसवीं सदी तक चली आती है। इस प्रकार ब्रजभाषा, गुजराती कवियों के लिए 'निज-शैली' ही थी।
 
[[मालवा]] और [[गुजरात]] को एक साथ उल्लेख करने की परम्परा ब्रज के लोकसाहित्य में भी मिलती है।
 
=== बुन्देलखण्ड===
ब्रजभाषा के लिए 'ग्वालियरी' का प्रयोग भी हुआ है। ब्रजभाषा शैली की सीमाएँ इतनी विस्तृत थीं कि ब्रजी और बुन्देली की संरचना प्रायः समान है। साहित्यिक शैली तो दोनों क्षेत्रों की बिल्कुल समान रही। ब्रज और बुन्देलखंड का सांस्कृतिक सम्बंध भी सदा रहा है।
 
===सिन्ध और पंजाब===
सिन्ध और पंजाब में [[गोस्वामी लालजी]] का नाम आता है। इन्होंने १६२६ वि. में गोस्वामी [[विट्ठलनाथ]] का शिष्यत्व स्वीकार किया। सिंध में वैष्णव धर्म का प्रचार ब्रजभाषा में आरम्भ हुआ। लालजी ब्रजभाषा के मर्मज्ञ थे। इस प्रकार सिंध में ब्रजभाषा साहित्य की पर्याप्त उन्नति की।
 
पंजाब में [[गुरु नानक]] ने भी ब्रजभाषा में कविता की। आगे भी कई गुरुओं ने ब्रजभाषा में कविता रची। [[गुरुगोविन्द सिंह]] का ब्रजभाषा-कृतित्व महत्त्वपूर्ण है ही। गुरु दरबारों में व राजदरबारों में भी ब्रजभाषा के कवि रहते थे। इन कवियों में सिक्खों का विशेष स्थान है। सिख संतों ने धार्मिक प्रचार के लिए ब्रजभाषा को भी चुना ।
 
=== बंगाल ===
सार्वदेशिक शौरसेनी के प्रभाव क्षेत्र में बंगाल भी था । बल्कि यों कहना चाहिए कि पूर्वी अपभ्रंश, पश्चिम भारत से ही पूर्व में आई। अवह का प्रयोग मैथिल कोकिल [[विद्यापति]] ने [[कीर्तिलता]] में किया। इसमें मिथिला और ब्रज के रुपों का मिश्रण है। बंगाल के [[सहजिया]]-साहित्य की रचना भी मुख्यतः इसी में हुई है।
 
वैष्णव साधु समाज की जो भाषा बनी उसका नाम ब्रजबुलि है। इसके विकास में मुख्य रुप से ब्रजी और मैथिली का योगदान था। बंगाल के कविवृंद मैथिली, बंगाली और ब्रजभाषा के मेल से घटित ब्रजबुली शैली को अपनाने लगे। इसी भाषा में गोविन्ददास, ज्ञानदास आदि कवियों का साहित्य मिलता है। मैथिली मिश्रित ब्रजी [[असम]] के [[शंकरदेव]] के कंठ से भी फूट पड़ी। बंगाल और [[उत्कल]] के संकीर्तनों की भी यही भाषा बनी।
 
=== महाराष्ट्र ===
ब्रजभाषा शैली का प्रसार महाराष्ट्र तक दिखलाई पड़ता है। सबसे प्राचीन रुप नामदेव की रचनाओं में मिलते हैं। ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम, रामदास प्रभृति भक्त-संतों की हिंदी रचनाओं की भाषा, ब्रज और दक्खिनी हिंदी है।
 
मुस्लिम काल में भी शाहजी एवं शिवाजी के दरबार में रहने वाले ब्रजभाषा के कवियों का स्थान बना रहा। कवि [[भूषण]] तो ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि थे ही।
 
=== दक्षिण भारत===
दक्षिण में खड़ीबोली शैली का ही 'दखनी' नाम से प्रसार हुआ। इन मुस्लिम राज्यों के आश्रित साहित्यकारों ने ग्वालेरी कविता का उल्लेख बड़ी श्रद्धा के साथ किया है। [[तुलसीदास]] के समकालीन [[मुल्ला वजही]] ने सबरस में ग्वालेरी के तीन दोहे उद्धृत किए हैं। ब्रज-शैली के या ब्रज के प्रचलित दोहों का प्रयोग वजही ने बीच-बीच में किया है। दक्खिन क्षेत्र खड़ी बोली शैली के विकास का क्षेत्र था। प्रायः गद्य रचनाओं में हरियाणवी बोली का प्रयोग मिलता है, पद्य रचना में ब्रजभाषा शैली का मिश्रण है। गद्य में लिखित प्रेमगाथाओं के बीच में ब्रजभाषा शैली के दोहे प्रयुक्त मिलते हैं। ब्रजभाषा शैली का संगीत समस्त भारत में प्रसिद्ध था। केरल के महाराजा [[राम वर्मा]], 'स्वाति-तिरुनाल' के नाम से ब्रजभाषा में कविता करते थे।
 
===राजस्थान===
पूर्वी राजस्थान में, ब्रज क्षेत्रीय भाषा शैली को ग्रहण करती हुई, [[पिंगल]] नामक एक भाषा-शैली का जन्म हुआ। पिंगल शब्द राजस्थान और ब्रज के सम्मिलित क्षेत्र में विकसित और चारणों में प्रचलित ब्रजी की एक शैली के लिए प्रयुक्त हुआ है। पिंगल का संबंध शौरसेनी अपभ्रंश और उसके मध्यवर्ती क्षेत्र से है।
 
[[रासो]] की भाषा को इतिहासकारों ने ब्रज या पिंगल माना है। वास्तव में पिंगल ब्रजभाषा पर आधारित एक काव्य शैली थी, यह जनभाषा नहीं थी। इसमें राजस्थानी और पंजाबी का पुट है। ओजपूर्ण शैली की दृष्टि से प्राकृत या अपभ्रंश रुपों का भी मिश्रण इसमें किया गया है। इस शैली का निर्माण तो प्राकृत पैंगलम ( १२वीं- १३वीं शती ) के समय हो गया था, पर इसका प्रयोग [[चारण]] बहुत पीछे के समय तक करते रहे। पीछे पिंगल शैली भक्ति-साहित्य में संक्रमित हो गई।
 
अतः स्पष्ट हो जाता है कि ब्रजभाषा भाषा व ब्रज शैली के खंड-उपखंड समस्त भारत में बिखरे हुए थे। कहीं इनकी स्थिति सघन थी और कहीं विरल।
 
आधुनिक युग में [[भारतेन्दु]] व उनके पिता [[गिरधरदास]] ब्रजभाषा में रचना करते थे। यहाँ से खड़ीबोली व ब्रजभाषा का मिश्र रूप प्रारम्भ हुआ जो आधुनिक हिन्दी खड़ीबोली की पूर्व भूमिका बना। १८७५ में हरिश्चंद्र चन्द्रिका में [[अमृतसर]] के कवि संतोष सिंह का कवित्त ब्रज मिश्रित हिन्दी का उदाहरण है :
 
: ''हों द्विज विलासी वासी अमृत सरोवर कौ
: ''काशी के निकट तट गंग जन्म पाया है ।
: ''शास्त्र ही पढ़ाया कर प्रीति पिता पंडित ने
: ''पाया कवि पंथ राम कीन्हीं बड़ी दाया है ॥
: ''प्रेम को बढाया अब सीस को नबाया देखो,
: ''मेरे मन भाया कृष्ण पांय पे चढ़ाया है ॥
 
==ब्रजभाषा का व्याकरण==