"परिसंचरण तंत्र" के अवतरणों में अंतर

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वाहिकातंत्र का एक महत्वपूर्ण अवयव [[केशिका]]एँ कहलाता है। धमनियों और शिराओं के बीच में केशिकाओं का समूह स्थित होता है। हृदय से धमनियों में रुधिर आता है। ये धमनियाँ केशिकाओं में विभक्त हो जाती हैं। केशिकाओं के दूसरी ओर से शिराएँ प्रारंभ होती हैं। इस प्रकार केशिकासमूह एक झील के समान होता है, जिसमें एक ओर से नदी प्रवेश करती है और दूसरी ओर से दूसरी नदी निकलती है।
 
केशिकाएँ अत्यन्त सूक्ष्म वाहिकाएँ होती हैं, जिनकी भित्तियाँ अंत में केवल एक कोशिका मोटी रह जाती हैं। जब रुधिर धमनी से आकर इन केशिकाओं में प्रवाह करता है, उस समय रुधिर में उपस्थित पोषक अवयव और ऑक्सीजन का उससे अंग के ऊतकों में विसरण हो जाता है तथा अंग में होनेवालीहोने वाली रासायनिक क्रियाओं के फल स्वरूपफलस्वरूप जो निकृष्ट या अंतिम पदार्थ बनते हैं, वे रुधिर में चले आते हैं। यहीं से शिरा का प्रारंभ हो जाता है। पहले यह रुधिर केशिकाओं में प्रवाहित होता है। केशिकाएँ आपस में जुड़कर सूक्ष्म शिरा बना देती हैं। इनके मिल जाने से कुछ बड़ी शिराएँ बनती हैं। ये जुड़कर फिर और बड़ी शिराएँ बनती हैं। इस प्रकार शिराओं का आकार बढ़ता जाता है। यहाँ तक कि महाशिरा बन जाती हैं।
 
हृदय के प्रकुंचन से बाएँ निलय से निकलकर जब रुधिर महाधमनी में आता है, तब उससे धमनी की भित्तियों पर दबाव पड़ता है। वे दबती हैं और थोड़ी बाहर को फैल जाती हैं। जब रुधिर वहाँ से निकल जाता है, तब भित्तियाँ फिर पूर्ववत् हो जाती हैं। यह दबाव ही [[रक्तचाप]] (blood pressure) कहलाता है। यह महाधमनी में सबसे अधिक है। ज्यों ज्यों उससे शाखाएँ निकलती जाती हैं, उनमें दब कम होती जाती है। केशिकाओं में यह बहुत कम होती है। शिराओं में उससे भी कम होती है। जितनी बड़ी शिरा होती है दाब उतनी ही कम होती है, क्योंकि उनका आकार बड़ा होता है और उनमें रक्त कम होता है। स्वस्थ युवा व्यक्ति में प्रकुंचन दाब (systolic pressure) 120-160 मिमी और अनुशिथिलन दाब (diastolic pressure) 80 से 90 मिमी. पारा होता है।
 
== अन्य प्राणियों के वाहिका तंत्र ==
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