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'''तारकासुर''', वज्रांग नामक दैत्य का पुत्र और असुरों का अधिपति था। [[पुराण|पुराणों]] से ज्ञात होता है कि देवताओं को जीतने के लिये उसे घोर तपस्या की और असुरों पर राजत्व तथा शिवपुत्र के अतिरिक्त अन्य किसी भी व्यक्ति से न मारे जा सकने का [[महादेव]] का वरदान प्राप्त किया। परिणामस्वरूप वह अत्यंत दुर्दातं हो गया और देवतागण उसकी सेवा के लिये विवश हो गए। देवताओं ने भी ब्रह्मा की शरण ली और उन्होने उन्हें यह बताया कि तारकासुर का अंत [[शिव]] के पुत्र से ही हो सकेगा। देवताओं ने [[कामदेव]] और [[रति]] के सहारे [[पार्वती]] के माध्यम से शिव को वैवाहिक जीवन के प्रति आकृष्ट करने का प्रयत्न किया। शिव ने क्रुद्ध होकर काम को जला डाला। किंतु पार्वती ने आशा नहीं छोड़ी और रूपसम्मोहन के उपाय को व्यर्थ मानती हुई तपस्या में निरत होकर शिवप्राप्ति का उपाय शुरू कर दिया। शिव प्रसन्न हूए, पार्वती का पाणिग्रहण किया और उनसे कार्तिकेय (स्कंद) की उत्पत्ति हुई। स्कंद को देवताओं ने अपना सेनापति बनाया और [[देवासुरसंग्राम]] में उनके द्वारा तारकासुर का संहार हुआ।
स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव के दिये वरदान के कारण अधर्मी अत्यन्त शक्तिशाली बने वाला राक्षस ताडकासुर / तारकासुर जिसको बध कर्नेके लिए केदारनाथ (शिव) का वीर्य से उत्पन्न पुत्र [[कार्तिकेय (मोहन्याल)]] ने जनमा लिय था । कृतिकाओं के द्वारा लालन पालन होने के कारण कार्तिकेय नाम पड़ गया। [[कार्तिकेय]] ने बड़ा होकर राक्षस तारकासुर का संहार किया। नेपालमे तरकासुर को खपरे /खापरे कहते है । खपरेको कुलदेवताके रुप्मे पुज्ने को कार्तिकेय गण के देवता असुद्द मान्ते है । ताडकासुर /खापरे खस लोग का कुलदेवता है ।खापरे /तारकासुर दैत्य को मस्टो(मष्टो) कहते है इसका उद्गम स्थल नेपालका बझांग है । १२ प्रकारने मष्टो खस लोगोका कुलदेवता है । मष्टो का बडा भाइ दाँत से बकरा कट्ता है । मष्टो दो प्रकारके होते है एक दुध से पुजने वाला दुसरा रगत से पुजने वाला । ये सब तारकासुर गण के देवता है । कर्तिकेयपुर राज्य धोस्त कर्नेको लिए येही मष्टो तारकासुर देवता कुलदेवता मान्य वाला खस लोग दुल्लु ,जुम्ला, बझांग दैलेख ,कालिकोट से कार्तिकेयपुर गए थे । कत्युरी राजा और कत्युरी गण के देवताका भयानक (भिषण)युद्द यिनी खस लोगो से कार्तिकेयपुर और डोटी मे हुइ थि
 
==यिनकी पूजा बिधि / पुजाका दिन ==
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