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शेरशाह को बचपन के दिनो में उसकी सौतेली माँ बहुत सताती थी तो उन्होंने घर छोड़ कर [[जौनपुर]] में पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी कर शेरशाह 1522 में ज़माल खान की सेवा में चले गए। पर उनकी सौतेली माँ को ये पसंद नहीं आया। इसलिये उन्होंने ज़माल खान की सेवा छोड़ दी और [[बिहार]] के स्वघोषित स्वतंत्र शासक बहार खान नुहानी के दरबार में चले गए।<ref name="General Knowledge Today" /> अपने पिता की मृत्यु के बाद फ़रीद ने अपने पैतृक ज़ागीर पर कब्ज़ा कर लिया। कालान्तर में इसी जागीर के लिए शेरखां तथा उसके सौतेले भाई सुलेमान के मध्य विवाद हुआ
 
बहार== खानबंगाल और बिहार पर अधिकार = maderchodo के दरबार मे वो जल्द ही उनके सहायक नियुक्त हो गए और बहार खान के नाबालिग बेटे का शिक्षक और गुरू बन गए। लेकिन कुछ वर्षों में शेरशाह ने बहार खान का समर्थन खो दिया। इसलिये वो 1527-28 में [[बाबर]] के शिविर में शामिल हो गए। बहार खान की मौत पर, शेरशाह नाबालिग राजकुमार के संरक्षक और [[बिहार]] के राज्यपाल के रूप में लौट आया। बिहार का राज्यपाल बनने के बाद उन्होंने प्रशासन का पुनर्गठन शुरू किया और [[बिहार]] के मान्यता प्राप्त शासक बन गया।<ref>{{cite web|title=Sher Shah |trans-title=शेर शाह|url=http://www.banglapedia.org/httpdocs/HT/S_0321.HTM|publisher=बांग्लापीडिया|archiveurl=https://web.archive.org/web/20120122073407/http://www.banglapedia.org/httpdocs/HT/S_0321.HTM |archivedate=२२ जनवरी २०१२|language=अंग्रेज़ी}}</ref>
== बंगाल और बिहार पर अधिकार ==
 
बहार खान के दरबार मे वो जल्द ही उनके सहायक नियुक्त हो गए और बहार खान के नाबालिग बेटे का शिक्षक और गुरू बन गए। लेकिन कुछ वर्षों में शेरशाह ने बहार खान का समर्थन खो दिया। इसलिये वो 1527-28 में [[बाबर]] के शिविर में शामिल हो गए। बहार खान की मौत पर, शेरशाह नाबालिग राजकुमार के संरक्षक और [[बिहार]] के राज्यपाल के रूप में लौट आया। बिहार का राज्यपाल बनने के बाद उन्होंने प्रशासन का पुनर्गठन शुरू किया और [[बिहार]] के मान्यता प्राप्त शासक बन गया।<ref>{{cite web|title=Sher Shah |trans-title=शेर शाह|url=http://www.banglapedia.org/httpdocs/HT/S_0321.HTM|publisher=बांग्लापीडिया|archiveurl=https://web.archive.org/web/20120122073407/http://www.banglapedia.org/httpdocs/HT/S_0321.HTM |archivedate=२२ जनवरी २०१२|language=अंग्रेज़ी}}</ref>
 
1537 में [[बंगाल]] पर एक अचानक हमले में शेरशाह ने उसके बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया हालांकि वो [[हुमायूँ]] के बलों के साथ सीधे टकराव से बचता रहा।
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