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'''पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यं''' [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] [[महाकाव्य]] है। इसे [[हिन्दी]] में 'पृथ्वीराज विजय महाकाव्य' भी कहा जाता है। इसमें [[तराइन का युद्ध|तारावड़ी के प्रथम युद्ध]] में [[पृथ्वीराज चौहान]] की विजय का वर्णन है। इसमें [[तराईन का द्वितीय युद्ध|तरावड़ी के द्वितीय युद्ध]] का उल्लेख नहीं है। इसकी रचना लगभग ११९१-९२ में [[जयानक]] नामक कश्मीरी शासनिक राव कवि ने किया था।
== पांडुलिपि ==
 
'' पृथ्वीराज विजया '' की एकमात्र ज्ञात पांडुलिपि [[शारदा लिपि] में लिखी गई पांडुलिपि [[बर्च की छाल]] है। इसकी खोज [[जॉर्ज बुहलर]] ने 1875 में की थी, जब वे [[कश्मीर]] में संस्कृत पांडुलिपियों की खोज कर रहे थे। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारडाशारदा | 1935 | p = 191}} पांडुलिपि अत्यधिक उत्परिवर्तित है, और कई पाठ के कुछ हिस्से (लेखक का नाम सहित) इससे गायब हैं। {{sfn | हर बिलासहरविलास सरदशारदा | 1935 | p = 192}}
 
== प्रमाणीकरण ==
 
यद्यपि लेखक का नाम पांडुलिपि से गायब है, [[हरहरविलास बिलास सारडशारदा]] ने सिद्धांत दिया कि पाठ की रचना जयनाका ने की थी, जो [[पृथ्वीराज तृतीय | पृथ्वीराज]] के दरबारी-कवि थे। यह सिद्धांत निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित है: {{sfn | हर बिलासहरविलास सारशारदा | 1935 | पीपीpp = 192-193}}
 
* कविता के कैंटोसर्ग 12 ​​में पृथ्वीराज के दरबार में कश्मीरी कवि जयनाका की प्रविष्टि है
* कैंटोसर्ग 1 में, पृथ्वीराज को कविता सुनने की उम्मीद है। यह इंगित करता है कि कविता की रचना उनके एक दरबारी-कवि ने की थी।
* लेखक को [[कश्मीरी पंडित]] लगता है:
** काव्यात्मक शैली 11 वीं शताब्दी के कश्मीरी कवि [[बिल्हानाबिल्हण]] से मिलती जुलती है।
** '' मंगलाचरण '' (प्रार्थना) और पाठ की शुरुआत में अन्य कवियों की आलोचना बिल्हना की '' विक्रमांका-देव-चरित्र '' [[विक्रमादित्य VI]] के जीवन पर आधारित एक और स्तवन कविता ।
** कविता कैंटोसर्ग 12 ​​में कश्मीर की प्रशंसा करती है
** कश्मीरी विद्वान [[जोनराज]] ने पाठ पर एक टिप्पणी लिखी
** कविता को उद्धृत करने वाला एकमात्र समकालीन जयराथ था, जो एक कश्मीरी भी था।
== रचना की तिथि ==
 
कविता को कश्मीरी विद्वान जयरथ ने अपनी '' विमर्षिनी '' (सी। 1200 सीई) में उद्धृत किया है, इसलिए इस तिथि से पहले निश्चित रूप से इसकी रचना की गई थी। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935। P = 193}}
 
[[तराइन की पहली लड़ाई]] में पृथ्वीराज की विजय [[घोरी]] पर कविता का उल्लेख है, लेकिन [[तराइन की दूसरी लड़ाई | दूसरी लड़ाई]] में उसकी हार को कवर नहीं करता है। <ref> रोमिला थापर 2005 p = 119</ref> यह इंगित करता है कि यह संभवतः 1191-1192 CE के दौरान लिखा गया था, दो लड़ाइयों के बीच की अवधि में। इस प्रकार, '' पृथ्वीराज विजया '' पृथ्वीराज के शासनकाल से एकमात्र विलुप्त साहित्यिक पाठ है। <Ref> सिंथिया टैलबोट 2015 p = 37</ref>
== सामग्री ==
 
=== कैंटोसर्ग 1 ===
 
पहला सैंटो प्राचीन कवियों [[वाल्मीकि]], [[व्यास]] और [[भासा]] की प्रशंसा करता है। इसमें समकालीन कवियों कृष्ण और विश्वरूप का भी उल्लेख है। कविता अजमेर के मूल निवासी विश्वरूपा और लेखक के एक मित्र और मार्गदर्शक को पुकारती है। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 194}}
 
कविता तब राजा की प्रशंसा करती है, [[पृथ्वीराज तृतीय]], जिसने कवि को बहुत सम्मान दिया। इसमें उल्लेख है कि पृथ्वीराज ने बचपन में भविष्य की महानता का वादा किया था। इसमें यह भी उल्लेख है कि राजा छह भाषाओं में कुशल था। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 194}}
 
इसके बाद, कविता में [[पुष्कर]], कवि के निवास की जगह, और चम्मन राजधानी [[अजमेर]] के पास एक शहर का वर्णन किया गया है। इसमें कहा गया है कि [[शिव]] को समर्पित मंदिर, अजगंधा महादेव, पुष्कर में स्थित था। कविता में, [[ब्रह्मा]] [[विष्णु]] को बताता है कि मूल रूप से उस स्थल पर तीन '' [[यज्ञ]] हैं- कुंड के (अग्नि कुंड), जो अंततः झील बन गए। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारदाशारदा | 1935 | p = 194}}
 
ब्रह्मा ने विष्णु से पृथ्वी पर जन्म लेने के लिए "पुष्कर के मुस्लिम अशिष्टता को सुधारने" का अनुरोध किया, और परिणामस्वरूप पृथ्वीराज - जिन्हें पाठ विष्णु के एक रूप के रूप में पहचानता है - पैदा हुआ है। {{sfn | सिंथिया टैलबोट | 2015 | पी = 41}}
 
=== कैंटोसर्ग 2 ===
 
पृथ्वीराज के वंश का संस्थापक चमन सूर्य की कक्षा से निकला। वह इस प्रकार पौराणिक [[सौर वंश]] का सदस्य था। उनके भाई धनंजय ने उनके सेनापति के रूप में कार्य किया। राजा [[वासुदेव (चरणमान वंश) | वासुदेव]] का जन्म चमन के वंश में हुआ था। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारडाशारदा | 1935 | पी = 195}}
 
=== केंटोसर्ग 3-4 ===
[[File:Sambhar lake.JPG|thumb|right|The [[Sambhar Salt Lake]]]]
 
एक जंगल में शिकार अभियान के दौरान, वासुदेव ने एक जादू की गोली पाई और उसे अपने मालिक, [[विद्याधर]] (अलौकिक प्राणी) के रूप में बहाल किया। प्रसन्न विद्याधर ने उन्हें बताया कि देवी [[पार्वती]] नाम [[शाकम्भरी]] के नाम से वन में निवास करती हैं। उन्होंने जादुई रूप से एक नमक झील ([[सांभर साल्ट लेक]]) का निर्माण किया। उन्होंने वासुदेव को बताया कि यह झील हमेशा शाकम्भरी और [[आशापुरा माता | आशापुरी]] (राजा के [[पारिवारिक देवता]]) द्वारा संरक्षित राजा के परिवार के कब्जे में रहेगी। <Ref>{{sfn हर| बिलासहरविलास सारशारदा | 1935 | पीपीpp = 195-196</ref>}}
 
=== केंटोसर्ग ५ ===
 
पृथ्वीराज के पूर्वजों की वंशावली दी गई है:
सैंटो ने कुछ शुरुआती चम्मन शासकों के शासनकाल के बारे में संक्षेप में बताया है:
 
* गोविंदराजा II (उर्फ गुवाका II) की बहन की बारह बहनें थीं, लेकिन उसने [[कान्यकुब्ज]] (कन्नौज) के राजा से शादी की। उसने अन्य सूइटर्स को हराया, और अपनी बहन को अपनी संपत्ति दी। {{sfn | हरहरविलास बिलास सरदशारदा | 1935 | p = 199-200}}
* चंदनराज की रानी रुद्राणी, जिन्हें अतापम्भा या योगिनी भी कहा जाता है, को 1000 [[शिव]] [[लिंगम]] पुष्कर झील के किनारे स्थापित किया गया है। ये लिंग ऐसे थे जैसे दीपक जो अंधकार को दूर करते हैं। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 200}}
* वाक्पतिराज प्रथम ने 188 युद्ध जीते, और पुष्कर में एक शिव मंदिर का निर्माण किया। {{sfn | हर हरदास सार | 1935 | p = 200}}
* विग्रहराज द्वितीय ने [[मुलाराजा]], [[गुजरात]] के राजा को हराया, जिन्हें कंठ-दुर्गा ([[कंथकोट]]) से भागना पड़ा। विग्रहराज ने रीवा ([[नर्मदा]]) नदी के तट पर आशापुरी देवी का मंदिर बनाया। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 201}}
* वाक्पतिराज द्वितीय ने अघट के शासक अम्बा-प्रसाद को मार डाला। {{sfn | हर हरदास सार | 1935 | p = 201}}
* [[मालवा]] [[भोज]] द्वारा वीराराम की हत्या कर दी गई थी। {{sf | हरहरविलास बिलास सारशारदा | १ ९ ३५ | p = २०१}}
* चामुंडराज ने नरपुर (नरवर) में एक विष्णु मंदिर बनवाया। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 201}}
* दुरलाभराजा तृतीय की मातंगों (मुसलमानों) के खिलाफ लड़ाई में मृत्यु हो गई। {{sfn | हर हरदास सार | 1935 | p = 201}}
* विग्रहराज द्वितीय ने मालवा के [[उदयादित्य]] को सारंगा नाम का एक घोड़ा दिया। इस घोड़े की मदद से, उदयादित्य ने गुजरात के राजा को हराया।
* पृथ्वीराज प्रथम ने 700 [[चालुक्य]] को मार डाला जो पुष्कर में ब्राह्मणों को लूटने आए थे। उन्होंने [[सोमनाथ]] के लिए सड़क पर एक धर्मार्थ संस्थान भी स्थापित किया।
* अजयराज द्वितीय (उर्फ सलहना) ने मालवा के राजा सुलहना के साथ-साथ मुसलमानों को हराया। उसने दुनिया को चांदी के सिक्कों से भर दिया, और उसकी रानी सोमालेखा को हर दिन ताजे मिट्टी के सिक्कों का इस्तेमाल किया जाता था। रानी ने एक मंदिर के सामने [[स्टेपवेल]] बनवाया। अजयराज द्वितीय ने अजयमेरु (अजमेर) शहर की स्थापना की, जो मंदिरों से भरा था और जिसे [[मेरु पर्वत | मेरु]] कहा जाने योग्य था। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारडाशारदा | 1935। P = 204}} कविता आगे बढ़ती है। अजयमेरु को समाप्त करने के लिए। उदाहरण के लिए, यह बताता है कि अजयमेरु के नौकरानियों के लिए [[लंका]] और [[द्वारका | द्वारका]] जैसे महान महान शहर भी फिट नहीं थे।
 
=== छावनीसर्ग ६ ===
[[File:Anna sarobar-2-ajmir.jpg|thumb|[[Ana Sagar]], the lake commissioned by Arnoraja]], अरनोरजा द्वारा बनाई गई झील]]
[[अरनोरजा]] ने मुस्लिम आक्रमणकारियों को हराया, जिनमें से कई अजयमेरु के नायकों द्वारा मारे गए थे। जीत का जश्न मनाने के लिए, राजा ने [[एना सागर | एक झील]], और इसे चंद्रा नदी (जिसे अब बांडी नदी कहा जाता है) के पानी से भर दिया। उन्होंने एक शिव मंदिर भी बनाया, और इसका नाम अपने पिता अजयराज (अब अजयपाल मंदिर कहा जाता है) के नाम पर रखा। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | पीपीpp = 205-206}}
 
अर्नोराजा की दो पत्नियाँ थीं: अविची ([[मारवाड़]]) का सुधाव, और कंचनदेवी (गुजरात की [[जयसिम्हा सिद्धराज]] की बेटी]]। अर्नोराजा और सुधा के तीन बेटे थे, जो तीन [[गुआदा | गनस]] (गुणों) के रूप में अलग थे। इनमें से, [[विग्रहराज चतुर्थ]] '' [[सत्त्व]] गुन '(अच्छा) था। सबसे बड़े पुत्र ([[जगददेव (चरणमान वंश) | जगददेव)]]), जिसका नाम पाठ में नहीं है) ने अरनोरजा को [[परशुराम | भृगु के पुत्र]] के समान सेवा प्रदान की (अपनी माता को मार डाला)। यह पुत्र एक दुष्ट गंध को पीछे छोड़ते हुए [[कैंडल बाती | बाती]] की तरह बाहर चला गया। {{sfn | हर बिलासहरविलास सारशारदा | 1935 | p = 206}}
 
[[सोमेश्वरा (चमन वंश) | सोमेश्वरा]] अरनोरजा और कंचनदेवी के पुत्र थे। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि सोमेश्वर का पुत्र (अर्थात, पृथ्वीराज तृतीय) पौराणिक दिव्य नायक [[राम]] का अवतार होगा। इसलिए, जयसिम्हा ने सोमेश्वरा को गुजरात की अपनी अदालत में ले लिया। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारडाशारदा | 1935 | p = 206}}
 
इसके बाद कविता में [[सोम (देवता: सोम]]], [[बुद्ध]], [[पौरव]] और [[भरत (महाभारत: भरत]]] के सदस्यों सहित पौराणिक [[चंद्र वंश]] का वर्णन है। । {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 206}} पांडुलिपि का एक हिस्सा इन श्लोकों के बाद गायब है। इसके बाद, कविता में पौराणिक राजा [[कार्तवीर्य]] का वर्णन है, और कहा गया है कि [[त्रिपुरी के कलचुरि]] (पृथ्वीराज की माता का परिवार) एक सहसिख ("साहसी") के माध्यम से उनके वंशज थे। <Ref> हर बिलास सारड 1935 पी = 207</ref>
 
=== कैंटोसर्ग 7 ===
 
कविता में कहा गया है कि [[जयसिम्हा सिद्धराज]] (पृथ्वीराज तृतीय के नाना) [[शिव]] के भक्त कुंभोदर के अवतार थे। उनके उत्तराधिकारी [[कुमारपाल (चौलूक्य वंश) | कुमारपाल]] (शाब्दिक रूप से "एक बच्चे के रक्षक") ने एक युवा सोमेश्वरा को अपने पास रखा, और इस तरह वह अपने नाम के योग्य बन गया। जब सोमेश्वरा बड़ी हुई, तो उसने कुमारपाल के उस क्षेत्र पर आक्रमण के दौरान [[कोंकण]] के राजा का सिर काट दिया। सोमेश्वरा ने [[त्रिपुरी के कलचुरि | त्रिपुरी]] की राजकुमारी करपुरा-देवी से शादी की। <Ref>हरहरविलास बिलास सारडाशारदा 1935 p = 207 </ref>
 
पाठ में कहा गया है कि पृथ्वीराज का जन्म [[ज्येष्ठ (महीने) | ज्येष्ठ)] महीने के 8 वें दिन हुआ था। यह उनके जन्म के समय [[कुंडली | ग्रहों की स्थिति]] बताता है, हालांकि कुछ अंश केवल उपलब्ध पांडुलिपि से गायब हैं। <Ref>{{sfn हर| बिलासहरविलास सारशारदा | 1935 | p = 207</ref>}}
 
=== कैंटोसर्ग 8 ===
 
पृथ्वीराज का जन्म कई उत्सवों के साथ मनाया गया था। उनकी देखभाल के लिए एक [[गीली नर्स]] को नियुक्त किया गया था। उनकी रक्षा के लिए, एक बाघ के पंजे और [[दशावतार | विष्णु के दस अवतार]] के चित्र उनके हार से जुड़े थे। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 207}} रानी फिर से गर्भवती हुई, और उसे जन्म दिया। [[हरिराज]] [[माघ (महीना) | मघा]] महीने में। {{sfn | हर बिलासहरविलास सारशारदा | १ ९ ३५ | p = २०}}}
 
[[विग्रहराज चतुर्थ]] यह सुनकर एक खुशहाल व्यक्ति की मृत्यु हो गई कि उसके भाई के दो पुत्रों के साथ पृथ्वी धन्य हो गई। वाक्यांश "कवियों का मित्र" उनकी मृत्यु के साथ गायब हो गया। उनके अविवाहित पुत्र [[अपरगंगे]] की भी मृत्यु हो गई। [[पृथ्वीराज द्वितीय | पृथ्वीभट्ट]], सुधाव के ज्येष्ठ पुत्र, भी प्रस्थान कर गए, मानो विग्रहराज को वापस लाने के लिए। सुधा की रेखा से नर मोती की तरह गिर रहे थे। [[लक्ष्मी]] (भाग्य की देवी) ने सुधवा के वंश को छोड़ दिया, और देखना चाहती थी [[सोमेश्वरा (चरणमान वंश) | सोमेश्वरा]] (पृथ्वीराज के पिता)। इसलिए, चमन मंत्री सोमेश्वरा को सपादलक्ष (चम्मन देश) ले आए। {{sfn <Ref>| हरहरविलास बिलास सारदाशारदा | 1935 | p = 208</ref>}}
 
सोमेश्वरा और कर्पूर-देवी अपने दो पुत्रों पृथ्वीराज और हरिराज के साथ अजयमेरु आए। सोमेश्वरा नए चम्मन राजा बने, और एक नए नगर की स्थापना की जहाँ विग्रहराज के महल स्थित थे। उसने अपने पिता अरनोरजा के नाम पर अपने बड़े बेटे द्वारा अर्नोराजा की हत्या के बाद छोड़े गए धब्बे को हटाने के लिए इस नए शहर का नाम रखा। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारडाशारदा | 1935 | p = 209}}
 
अजयमेरु में, विग्रहराज ने जितने मंदिरों पर विजय प्राप्त की थी, उतने मंदिरों का निर्माण किया था। इन मंदिरों के मध्य में, सोमेश्वर ने वैद्यनाथ (शिव) मंदिर का निर्माण किया, जो कि विग्रहराज के सभी मंदिरों से लंबा था। उन्होंने इस मंदिर में [[ब्रह्मा]], [[विष्णु]] और [[शिव]] के चित्र स्थापित किए। उन्होंने मंदिर परिसर में अपने पिता और स्वयं घोड़ों की सवारी के पुतले भी लगाए। जैसे [[मेरु पर्वत | मेरु]] में पांच [[कल्पवृक्ष]] थे, सोमेश्वर ने अजयमेरु में पांच मंदिरों का निर्माण किया। उसने अन्य स्थानों पर इतने सारे मंदिर बनवाए, कि देवताओं की नगरी की आबादी घट गई। {{sfn | हर हरदास सार | 1935 | पीपीpp = 208-209}}
 
सोमेश्वरा ने अपने जवान बेटे की रक्षा के लिए रानी को नियुक्त किया, और फिर [[svarga | स्वर्ग]] में अपने पिता के साथ रहने के लिए प्रस्थान किया। उनके सभी पूर्ववर्ती, चम्मन से लेकर पृथ्वीभट्ट तक उनका स्वागत करने के लिए आए थे, सिवाय अर्नोरजा के बड़े बेटे को, जो [[नारक (हिंदू धर्म) | नरक]] में छिपा था। {{sfn। हरहरविलास बिलास सारडाशारदा | 1935। P = 209}}
 
=== कैंटोसर्ग ९ ===
 
करपुरा-देवी की रीजेंसी के दौरान, (अजयमेरु) शहर इतनी घनी आबादी वाला था और इसमें कई मानव निर्मित संरचनाएं थीं, जो सूरज जमीन के दसवें हिस्से से अधिक नहीं देख पा रहा था। पृथ्वीराज के मंत्री कदंब-वास ने उन्हें [[हनुमान]] [[राम]] की सेवा दी। उसने युवा राजा की महिमा में जोड़ने के लिए सभी दिशाओं में सेनाएँ भेजीं। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 209}}
 
सीखने की सभी शाखाएँ एकजुट हो गईं और पृथ्वीराज के पास आ गईं, और वह उन सभी कलाओं और विज्ञानों के बारे में जानने लगीं, जिनमें एक राजा को कुशल होना चाहिए। [[कामदेव]] ने धनुर्विद्या सीखने के लिए, और [[] के डर से जीना बंद कर दिया। शिव]]। {{Sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | पीपीpp = 209-210}}
 
पृथ्वीराज और उनके भाई हरिराज जैसे [[राम]] और [[लक्ष्मण]] थे। पृथ्वीराज के मामा रिश्तेदार भुवनिका-मल्ल उनके पास यह पता लगाने के लिए आए कि वे केवल दो भुजाओं के साथ पृथ्वी की रक्षा करने में कैसे सक्षम थे। भुवनिका-मल्ल एक दुस्साहसी योद्धा थे, और उन्होंने अपना सारा धन दान में दे दिया। वह छापा मारना चाहता था [[दक्खन | दक्षिण]], लेकिन ऐसा करने के खिलाफ फैसला किया क्योंकि सम्मानित ऋषि [[अगस्त्य]] वहीं रहते थे। [[गरुड़]] का अवतार, उन्होंने दो भाइयों की सेवा की, और नागों को अपने अधीन कर लिया। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 210} |
 
कदंब-वास और भुवनिका-मल्ल के समर्थन से, पृथ्वीराज ने अपने लोगों के कल्याण के लिए कई काम किए। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 210}}
 
=== केंटोसर्ग 10 ===
[[File:Prithvi Raj Chauhan (Edited).jpg|thumb|left|A statue of [[Prithviraja III]]]]
जब पृथ्वीराज वयस्क हुआ, तो कई राजकुमारियों ने उससे शादी करने की इच्छा व्यक्त की। उनके अच्छे भाग्य ने उन्हें युद्ध करने के कई अवसर भी दिए। जब विग्रहराज के पुत्र नागार्जुन ने गुदापुरा पर विजय प्राप्त की, तो पृथ्वीराज ने उनके खिलाफ एक सेना का नेतृत्व किया और गुदापुरा किले को घेर लिया। नागार्जुन ने एक योद्धा के कर्तव्य को त्याग दिया, और किले से भाग गया। पृथ्वीराज ने अपने योद्धाओं को मार डाला और किले पर कब्जा कर लिया। वह नागार्जुन की पत्नी और माँ को अजमेर ले आया, और अपने दुश्मनों के सिर अजमेर किले की लड़ाइयों पर रख दिए। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारडाशारदा | 1935 | p = 211}}
 
एक [[हिंदू धर्म में गाय | गोमांस खाने वाला]] [[म्लेच्छ]] [[घोरी का घोड़ी | घोरी]] ने उत्तर-पश्चिम में [[गजनी | गर्जनी]] पर कब्जा कर लिया था, जहाँ घोड़े घिसटते थे। उनके दूत एक [[कोढ़ी]] के रंग के साथ एक गंजे आदमी थे, और जंगली पक्षियों की तरह बोलते थे। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारडाशारदा | 1935 | p = 211}} {{sfn | CththiaCynthia Talbot।Talbot | 2015 = |p = 29 | }} जब उन्होंने सुना कि पृथ्वीराज ने म्लेच्छों को नष्ट करने की कसम खाई है, तो उन्होंने चम्हाण राजधानी में एक राजदूत को भेजा। [[राजा]] के (सामंती राजाओं) ने उनके भय से उनके किले में शरण ली। जब उन्होंने [[नददुला]] पर कब्जा कर लिया, तो पृथ्वीराज क्रोधित हो गए और उन्हें अपने वश में करने की कसम खाई।
 
=== केंटोसर्ग 11 ===
[[File:Fronton Cambodge Musée Guimet 9972.jpg|thumb|[[Sunda (asura)|Sunda]] and [[Upasunda]] fight over [[Tilottama]]]]
पृथ्वीराज के मंत्री कदंब-वास ने उसे क्रोध न करने और ग़ोरी से न लड़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि दुश्मन खुद को नष्ट कर देंगे, ठीक उसी तरह जैसे [[सुंडा (असुर) | सुंडा]] और [[उपसुंद]] ने खुद को [[तिलोत्तमा]] पर बर्बाद कर लिया। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935। Pp = 211- 212}} बस फिर, गुजरात से एक दूत पहुंचे और पृथ्वीराज को सूचित किया कि गुजरात के राजा का [[कसरावद का युद्ध | पराजित]] घोरी की सेना थी। कवियों के प्रमुख पृथ्वीभट्ट ने कदंबवास की प्रशंसा की क्योंकि घोमी को चम्हाण पक्ष की ओर से बिना किसी प्रयास के हराया गया था। फिर उन्होंने तिलोत्तमा की कहानी सुनाई। पृथ्वीराज ने उस पर उपहार देने के बाद दूत को खारिज कर दिया। {{sfn | हर बिलासहरविलास सरदशारदा | 1935 | p = 212}}
 
पृथ्वीराज ने फिर अपनी गैलरी का दौरा किया, जहाँ पृथ्वीभट्ट ने उन्हें '' [[रामायण]] '' से चित्रण दिखाए, और राजा के कर्मों को उनके पिछले जन्म [[राम]] में सुनाया। राजा ने तब तिलोत्तमा का एक चित्र देखा, और [[कामदेव]] (प्रेम के देवता) ने उस पर विजय प्राप्त की। पृथ्वीराज ने तिलोत्तमा के लिए लंबे समय तक काम करना शुरू किया, और कामदेव के बाणों से घायल होकर दोपहर को गैलरी से बाहर निकल गए। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारडाशारदा | 1935 | p = 212}}
 
=== केंटोसर्ग 12 ​​===
 
जैसे ही पृथ्वीराज गैलरी से बाहर आया, उसने किसी को एक कविता सुनाई। कविता ने घोषित किया कि जो व्यक्ति कुछ पाने के लिए प्रयास करता है वह उसे प्राप्त करता है। पृथ्वीराज ने पद्मनाभ (पूर्व राजा विग्रहराज का एक मंत्री) से पूछा कि भिक्षु कौन है। पद्मनाभ ने कश्मीर के एक महान कवि-विद्वान जयनाका के रूप में गायन की शुरुआत की। जयनाका ने समझाया कि वह कश्मीर से अजयमेरु आया था, क्योंकि विद्या की देवी ने उसे [[विष्णु]] के अवतार की सेवा करने के लिए कहा था: पृथ्वीराज। {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935। पीपीpp = 212-213}}
 
पाठ की एकमात्र प्रचलित पांडुलिपि बारहवें अध्याय में अचानक समाप्त हो जाती है। {{sfn | Cynthia Talbot | 2015 | p = 40}} यह इस प्रकार अधूरा है, लेकिन इसमें घोरी पर पृथ्वीराज की विजय का उल्लेख है [[तराइन का पहला युद्ध] ]] {{sfn | हरहरविलास बिलास सारशारदा | 1935 | p = 213}}
 
==इन्हें भी देखें==
==बाहरी कड़ियाँ==
*[https://web.archive.org/web/20170510141418/http://www.dli.ernet.in/handle/2015/284204 पृथ्वीराजविजय महाकाव्य]
*[https://archive.org/details/speechesandwriti030754mbp/speechesandwriti030754mbp_djvu.txt पृथ्वी राजविजय महावाक्य का विश्लेषण [[हरविलास शारदा]] द्वारा]
 
==संदर्भ==
{{reflist}}
 
=== ग्रन्थसूची ===
 
* {{cite book |author=Cynthia Talbot |title=The Last Hindu Emperor: Prithviraj Cauhan and the Indian Past, 1200–2000 |url=https://books.google.com/books?id=m3DjCgAAQBAJ |publisher=Cambridge University Press |year=2015 |isbn=9781107118560 |ref=harv }}
* {{cite book |author=E. Sreedharan |title=A Textbook of Historiography: 500 BC to AD 2000 |url=https://books.google.com/books?id=jJVoi3PIejwC&pg=PA329 |year=2004 |publisher=Orient Blackswan |isbn=9788125026570 |ref=harv }}
* {{cite book |author=हरविलास शारदा |authorlink=Har Bilas Sarda |title=Speeches And Writings Har Bilas Sarda |publisher=Vedic Yantralaya |location=Ajmer |year=1935 |url=https://archive.org/stream/speechesandwriti030754mbp#page/n272/mode/1up |ref=harv }}
* {{cite book |author=R. B. Singh |title=History of the Chāhamānas |publisher=N. Kishore |year=1964 |url=https://books.google.com/books?id=TKs9AAAAIAAJ |oclc=11038728 |ref=harv }}
* {{cite book |author=Romila Thapar |title=Somanatha: The Many Voices of a History |url=https://books.google.com/books?id=PnBMFaGMabYC&pg=PA119 |publisher=Verso |year=2005 |isbn=9781844670208 |ref=harv }}
 
 
[[श्रेणी:संस्कृत ग्रन्थ]]
[[श्रेणी:पृथ्वीराज चौहान]]