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(दम घोष और जरासंध के बाद ही चंद्रवंशियों को चंदेल कहा जाने लगा)
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{{मूल शोध|date=जुलाई 2020}}
{{Infobox former country
|conventional_long_name = जेजाकभुक्ति के चन्देल,चंदेला,चंद्रवंशीय चंदेल दमघोष और उनके कुटुंब का राजा जरासंध इन्हीं राजाओं के बाद चंदेल वंश की स्थापना हुई।
|common_name = चन्देला
|continent = एशिया
}}
[[चित्र:Vishvanatha Temple, Khajuraho (side).jpg|300px|thumb|[[खजुराहो]] का कंदरीया महादेव मंदिर]]
नंद के अत्याचार से रवाना हुए कुछ जरासंध वंशी बुंदेलखंड आकार बसे जहा कभी उनके पूर्वज उपरीचर वसु और जरासंध का राज था। उन्हीं राजा नन्नुक (चंद्रवर्मन) ने चंदेल वंश की स्थापना की।
'''चन्देला वंश''' भारत का प्रसिद्ध राजवंश हुआ, जिसने 08वीं से 12वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से यमुना और नर्मदा के बीच, बुंदेलखंड तथा उत्तर प्रदेश के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर राज किया। चंदेल वंश के शासकों का बुंदेलखंड के इतिहास में विशेष योगदान रहा है। चंदेलो ने लगभग चार शताब्दियों तक बुंदेलखंड पर शासन किया। चन्देल शासक न केवल महान विजेता तथा सफल शासक थे, अपितु कला के प्रसार तथा संरक्षण में भी उनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा। चंदेलों का शासनकाल आमतौर पर बुंदेलखंड के शांति और समृद्धि के काल के रूप में याद किया जाता है। चंदेलकालीन स्‍थापत्‍य कला ने समूचे विश्‍व को प्रभावित किया उस दौरान वास्तुकला तथा मूर्तिकला अपने उत्‍कर्ष पर थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं खजुराहो के मंदिर इस वंश का प्रथम राजा नन्नुक देव था।बुंदेलखंड के चंदेल मध्य भारत में एक शाही राजवंश थे। उन्होंने 9 वीं और 13 वीं शताब्दी के बीच बुंदेलखंड क्षेत्र (तब जेजाकभुक्ति कहा जाता था) पर शासन किया।चदेलों को उनकी कला और वास्तुकला के लिए जाना जाता है, विशेष रूप से उनकी मूल राजधानी खजुराहो में मंदिरों के लिए। उन्होंने अजायगढ़, कालिंजर के गढ़ों और बाद में उनकी राजधानी महोबा सहित अन्य स्थानों पर कई मंदिरों, जल निकायों, महलों और किलों की स्थापना की ।चदेलों ने शुरू में कान्यकुब्ज (कन्नौज) के गुर्जर-प्रतिहारों के सामंतों के रूप में शासन किया। 10 वीं शताब्दी के चंदेला शासक [[यशोवर्मन]] व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र हो गए, हालांकि उन्होंने प्रतिहार की अधीनता स्वीकार करना जारी रखा। उनके उत्तराधिकारी धनंग के समय तक, चंदेल एक प्रभु सत्ता बन गए थे। उनकी शक्ति में वृद्धि हुई और गिरावट आई क्योंकि उन्होंने पड़ोसी राजवंशों, विशेष रूप से मालवा के परमार और त्रिपुरी के कलचुरियों के साथ लड़ाई लड़ी। 11 वीं शताब्दी के बाद से, चंदेलों को उत्तरी मुस्लिम राजवंशों द्वारा छापे का सामना करना पड़ा, जिसमें गजनवी और शामिल थे। चाहमाना और घोरी आक्रमणों के बाद चंदेला शक्ति 13 वीं शताब्दी की शुरुआत में प्रभावी रूप से समाप्त हो गई।
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