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==इतिहास==
चंदेल मूल रूप से गुर्जरोंगुर्जर-प्रतिहारों के जागीरदार थे।<ref>Radhey Shyam Chaurasia, History of Ancient India: Earliest Times to 1000 A. D.</ref> नानुका (831-845 CE), राजवंश का संस्थापक, खजुराहो के आसपास केंद्रित एक छोटे से राज्य का शासक था।<ref>{{cite book |author=Sailendra Sen |title=A Textbook of Medieval Indian History |url=https://books.google.com/books?id=UdW6lAEACAAJ |year=2013 |publisher=Primus |isbn=978-93-80607-34-4 |page=22 |access-date=4 जुलाई 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20200614174039/https://books.google.com/books?id=UdW6lAEACAAJ |archive-date=14 जून 2020 |url-status=live }}</ref>
 
चंदेला शिलालेखों के अनुसार, नानुका के उत्तराधिकारी वक्पति ने कई दुश्मनों को हराया। {{sfn|Sisirkumar Mitra|1977|pp=27-28}} वक्पति के पुत्र जयशक्ति (जेजा) और विजयशक्ति (विज) ने चंदेला शक्ति को समेकित किया{{sfn|Sisirkumar Mitra|1977|p=30}} एक महोबा शिलालेख के अनुसार, चंदेला क्षेत्र को जयशक्ति के बाद "जेजाकभुक्ति" नाम दिया गया था। विजयशक्ति के उत्तराधिकारी रहीला को प्रशंसात्मक शिलालेखों में कई सैन्य जीत का श्रेय दिया जाता है। रहीला के पुत्र हर्ष ने संभवत: राष्ट्रकूट आक्रमण के बाद या अपने सौतेले भाई भोज द्वितीय के साथ महिपाल के संघर्ष के बाद प्रतिहार गुर्जर सम्राटराजा महीपाल के शासन को बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
 
===एक संप्रभु शक्ति के रूप में उदय===
हर्ष के पुत्र यशोवर्मन (925-950 CE) ने प्रतिहार आधीनता स्वीकार करना जारी रखा, लेकिन व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र हो गया। उसने कलंजारा के महत्वपूर्ण किले को जीत लिया। एक 953-954 सदी के खजुराहो के शिलालेख उसे कई अन्य सैन्य सफलताओं के साथ श्रेय देता है, जिसमें गौडा (पाला के साथ पहचाना गया), खासा, छेदी (त्रिपुरी का कलचुरि), कोसला (संभवतः सोमवमेश), मिथिला (संभवतः छोटे उपनदी शासक), मालव (पारमारों के साथ पहचाने गए), कौरव, कश्मीरी और गुर्जर थे । हालांकि ये दावे अतिरंजित प्रतीत होते हैं, क्योंकि उत्तरी भारत में व्यापक विजय के समान दावे अन्य समकालीन राजाओं जैसे कलचुरि राजा युवा-राजा और राष्ट्रकूट राजा कृष्ण III के रिकॉर्ड में भी पाए जाते हैं। यशोवर्मन के शासनकाल ने प्रसिद्ध चंदेला-युग कला और वास्तुकला की शुरुआत को चिह्नित किया। उन्होंने खजुराहो में लक्ष्मण मंदिर की स्थापना की।
 
पहले के चंदेला शिलालेखों के विपरीत, यशोवर्मन के उत्तराधिकारी धनंगा (950-999 CE) के रिकॉर्ड में किसी भी गुर्जर प्रतिहार अधिपति का उल्लेख नहीं है। यह इंगित करता है कि धनंगा ने औपचारिक रूप से चंदेला संप्रभुता की स्थापना की। खजुराहो के एक शिलालेख में दावा किया गया है कि कोशल, क्रथा (विदर्भ क्षेत्र का हिस्सा), कुंतला, और सिम्हाला के शासकों ने धनंगा के शासन को विनम्रता से स्वीकारा। यह भी दावा करता है कि आंध्र, अंग, कांची और राह के राजाओं की पत्नियाँ युद्धों में उनकी सफलता के परिणामस्वरूप उनकी जेलों में रहीं। ये एक दरबारी कवि द्वारा विलक्षण अतिशयोक्ति प्रतीत होता हैं, लेकिन बताता है कि धनंगा ने व्यापक सैन्य अभियान किए। अपने पूर्ववर्ती की तरह, धंगा ने भी खजुराहो में एक शानदार मंदिर की स्थापना की, जिसे विश्वनाथ मंदिर के रूप में पहचाना जाता है।
 
धंगा के उत्तराधिकारी गंडा को अपने द्वारा विरासत में मिले क्षेत्र को बनाए रखता है ऐसा प्रतीत होता है। उनके पुत्र विद्याधर ने कन्नौज (संभवतः राज्यापाल) के गुर्जर प्रतिहार राजा की हत्या कर दी, क्योंकि वह ग़ज़नी के ग़ज़नावी आक्रमणकारी महमूद से लड़ने के बजाय अपनी राजधानी से भाग गया था। बाद में महमूद ने विद्याधर के राज्य पर आक्रमण किया, मुस्लिम आक्रमणकारियों के अनुसार, यह संघर्ष विद्याधर द्वारा महमूद को श्रद्धांजलि देने के साथ समाप्त हो गया।{{sfn|Sisirkumar Mitra|1977|pp=81-82}} विद्याधारा को कंदरिया महादेव मंदिर की स्थापना के लिए जाना जाता है।
 
इस अवधि के दौरान चंदेला कला और वास्तुकला अपने चरम पर पहुंच गया। लक्ष्मण मंदिर (930–950 CE), विश्वनाथ मंदिर (999-1002 CE) और कंदरिया महादेव मंदिर (1030 CE) का निर्माण क्रमशः यशोवर्मन, धनगा और विद्याधारा के शासनकाल के दौरान किया गया था। ये नागर-शैली के मंदिर खजुराहो में सबसे अधिक विकसित शैली के प्रतिनिधि हैं।<ref name="James_1994">{{cite book |url=https://books.google.ca/books?id=LwcBVvdqyBkC&pg=PA234 |title=The Art and Architecture of the Indian Subcontinent |author=James C. Harle |publisher=Yale University Press |year=1994 |page=234 |access-date=4 जुलाई 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20200614124934/https://books.google.ca/books?id=LwcBVvdqyBkC&pg=PA234 |archive-date=14 जून 2020 |url-status=live }}</ref>
A view of Kandariya Mahadev Temple Khajuraho India.jpg |कंदरीय महादेव मंदिर
</gallery>
 
===पतन===
[[File:Kirtivarman Chandela visits the temple of Khajurahu.jpg|thumb|20 वीं शताब्दी के कलाकार द्वारा कीर्तिवर्मन चंदेला की खजुराहो मंदिर की यात्रा की कल्पना।ल]]
 
===पूर्ण रूप से पतन===
परमर्दी (शासनकाल 1165-1203 ईस्वी) ने छोटी उम्र में चंदेला सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। हालांकि उसके शासनकाल के शुरुआती वर्ष शांतिपूर्ण थे, 1182-1183 ईस्वी के आसपास, चाहमाना शासक गुर्जर सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने चंदेला साम्राज्य पर आक्रमण किया। मध्ययुगीन पौराणिक गाथागीतों के अनुसार, पृथ्वीराज की सेना ने तुर्क बलों द्वारा एक आश्चर्यजनक हमले के बाद अपना रास्ता खो दिया और अनजाने में चंदेला की राजधानी महोबा में डेरा डाल दिया। इससे गुर्जर सम्राट पृथ्वीराज के दिल्ली के लिए रवाना होने से पहले चंदेलों और चौहानों के बीच थोड़ा संघर्ष हुआ । कुछ समय बाद, गुर्जर सम्राट पृथ्वीराज ने चंदेला साम्राज्य पर आक्रमण किया और महोबा को युद्ध में हरा दिया। परमर्दि कायर ने कलंजारा किले में शरण ली। इस लड़ाई में आल्हा, ऊदल और अन्य सेनापतियों के नेतृत्व में चंदेला बल हार गया। विभिन्न गाथा के अनुसार, परमर्दी ने या तो शर्म से आत्महत्या कर ली या गया भाग गया।
 
गुर्जर सम्राट पृथ्वीराज चौहान की महोबा की छापेमारी उनके मदनपुर के शिलालेखों में अंकित है। हालांकि,भाटों की किंवदंतियों में ऐतिहासिक अशुद्धियों के कई उदाहरण हैं। उदाहरण के लिए, यह ज्ञात है कि परमारी चौहान की जीत के तुरंत बाद सेवानिवृत्त नहीं हुआ या मृत्यु नही हुयी थे। उसने चंदेला सत्ता को फिर बहाल किया, और लगभग 1202-1203 CE तक एक प्रभुता के रूप में शासन किया, जब दिल्ली के घुरिड राज्यपाल ने चंदेला साम्राज्य पर आक्रमण किया। दिल्ली सल्तनत के एक इतिहासकार, ताज-उल-मासीर के अनुसार, परमर्दी ने दिल्ली की सेनाओं के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उसने सुल्तान को उपहार देने का वादा किया, लेकिन इस वादे को निभाने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। उनके दीवान ने हमलावर ताकतों के लिए कुछ प्रतिरोध किया, लेकिन अंत में उसे अधीन कर लिया गया। 16 वीं शताब्दी के इतिहासकार फरिश्ता का कहना है कि परमर्दी की हत्या उसके ही मंत्री ने की थी, जो दिल्ली की सेनाओं के सामने आत्मसमर्पण करने के राजा के फैसले से असहमत था ।
 
चंदेला सत्ता दिल्ली की सेना के खिलाफ अपनी हार से पूरी तरह उबर नहीं पाई थी। त्रिलोकीवर्मन, वीरवर्मन और भोजवर्मन द्वारा परमर्दी को उत्तराधिकारी बनाया गया। अगले शासक हम्मीरवर्मन (1288-1311 CE) ने शाही उपाधि महाराजाधिराज का उपयोग नहीं किया, जो बताता है कि चंदेला राजा की उस समय तक निम्न दर्ज़े की स्थिति थी। बढ़ते मुस्लिम प्रभाव के साथ-साथ अन्य स्थानीय राजवंशों, जैसे बुंदेलों, बघेलों और खंजरों के उदय के कारण चंदेला शक्ति में गिरावट जारी रही।
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