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'''विक्रमोर्वशीयम्''' [[कालिदास]] का विख्यात नाटक। यह पांच अंकों का नाटक है। इसमें राजा [[पुरुरवा]] तथा [[उर्वशी]] का प्रेम और उनके विवाह की कथा है।
 
==कथा==
एक बार देवलोक की परम सुंदरीसुन्दरी [[अप्सरा]] [[उर्वशी]] अपनी सखियों के साथ [[कुबेर]] के भवन से लौट रही थी। मार्ग में [[केशी]] दैत्य ने उन्हें देख लिया और तब उसे उसकी सखी चित्रलेखा सहित वह बीच रास्ते से ही पकड़ कर ले गया।
 
यह देखकर दूसरी अप्सराएँ सहायता के लिए पुकारने लगीं, "आर्यों! जो कोई भी देवताओं का मित्र हो और आकाश में आ-जा सके, वह आकर हमारी रक्षा करें।" उसी समय प्रतिष्ठान देश के राजा [[पुरुरवा]] भगवान सूर्य की उपासना करके उधर से लौट रहे थे। उन्होंने यह करूण पुकार सुनी तो तुरंततुरन्त अप्सराओं के पास जा पहुँचे। उन्हें ढाढ़स बँधाया और जिस ओर वह दुष्ट दैत्य उर्वशी को ले गया था, उसी ओर अपना रथ हाँकने की आज्ञा दी।
 
अप्सराएँ जानती थीं कि पुरुरवा चंद्रवंश के प्रतापी राजा है और जब-जब देवताओं की विजय के लिए युद्ध करना होता है तब-तब इंद्र इन्हीं को, बड़े आदर के साथ बुलाकर अपना सेनापति बनाते हैं।