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[[गुप्त राजवंश|गुप्त साम्राज्य]] के पतन के बाद भारत में (मुख्यतः उत्तरी भाग में) अराजकता की स्थिति बना हुई थी। ऐसी स्थिति में हर्ष के शासन ने राजनैतिक स्थिरता प्रदान की। कवि [[बाणभट्ट]] ने उसकी जीवनी [[हर्षचरितम्|हर्षचरित]] में उसे ''चतुःसमुद्राधिपति'' एवं ''सर्वचक्रवर्तिनाम धीरयेः'' आदि उपाधियों से अलंकृत किया। हर्ष कवि और नाटककार भी था। उसके लिखे गए दो नाटक [[प्रियदर्शिका]] और [[रत्नावली]] प्राप्त होते हैं।
 
हर्ष का जन्म [[थानेसर]] (वर्तमान में हरियाणा) वैश्य वर्धन वंश में हुआ था। थानेसर, प्राचीन हिन्दुओं के तीर्थ केन्द्रों में से एक है तथा ५१ [[शक्ति पीठ|शक्तिपीठों]] में एक है। यह अब एक छोटा नगर है जो [[दिल्ली]] के उत्तर में हरियाणा राज्य में बने नये कुरुक्षेत्र के आस-पडोस में स्थित है। हर्ष के मूल और उत्पत्ति के संर्दभ में एक [[अभिलेख|शिलालेख]] प्राप्त हुई है जो कि [[गुजरात]] राज्य के [[गुन्दा जिला|गुन्डा जिले]] में खोजी गयी है। चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग|ह्वेनसांग]] ने अपनी पुस्तक में इनके शासन काल के बारे में लिखा है।{{उद्धरण आवश्यक}}
 
==शासन प्रबन्ध==
==इन्हें भी देखें==
*[[पुष्यभूति राजवंश]]
*[[प्रतिहार राजवंश का इतिहस और शाखाएँ]]
 
==बाहरी कड़ियाँ==
1,951

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