"बद्रीनाथ मन्दिर" के अवतरणों में अंतर

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लोककथा के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना :- पौराणिक कथा के अनुसार यह स्थान भगवान शिव भूमि( केदार भूमि ) के रूप में व्यवस्थित था | भगवान विष्णु अपने ध्यानयोग के लिए एक स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा के पास शिवभूमि का स्थान बहुत भा गया | उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के पास) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के पास बालक रूप धारण किया और रोने लगे
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मन्दिर के ठीक नीचे तप्त कुण्ड नामक [[गरम चश्मा|गर्म चश्मा]] है। सल्फर युक्त पानी के इस चश्मे को औषधीय माना जाता है; कई तीर्थयात्री मन्दिर में जाने से पहले इस चश्मे में स्नान करना आवश्यक मानते हैं। इन चश्मों में सालाना तापमान ५५ डिग्री सेल्सियस (११३ डिग्री फ़ारेनहाइट) होता है, जबकि बाहरी तापमान आमतौर पर पूरे वर्ष १७ डिग्री सेल्सियस (६३ डिग्री फ़ारेनहाइट) से भी नीचे रहता है।<ref name="about" /> तप्त कुण्ड का तापमान १३० डिग्री सेल्सियस तक भी दर्ज किया जा चुका है।<ref>{{Cite web |url=https://m.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-bdraivishal-darshan-means-baikunyh-darshan-12306278.html |title=संग्रहीत प्रति |access-date=12 अगस्त 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20180812115657/https://m.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-bdraivishal-darshan-means-baikunyh-darshan-12306278.html |archive-date=12 अगस्त 2018 |url-status=live }}</ref> मन्दिर में पानी के दो तालाब भी हैं, जिन्हें क्रमशः नारद कुण्ड और सूर्य कुण्ड कहा जाता है।{{sfn |भल्ला |२००६ |p=११० }}
 
== लोककथा के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना :- ==
== स्थापत्य शैली ==
<small>पौराणिक कथा के अनुसार यह स्थान [https://toprajasthani.com/2021/02/07/%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0-%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C/ भगवान शिव] भूमि( केदार भूमि ) के रूप में व्यवस्थित था | भगवान विष्णु अपने ध्यानयोग के लिए एक स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा के पास शिवभूमि का स्थान बहुत भा गया | उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के पास) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के पास बालक रूप धारण किया और रोने लगे |</small>[[चित्र:Badrinath Temple Entrance.jpg|अंगूठाकार|बाएँ|मन्दिर का प्रवेश द्वार]]
[[चित्र:Badrinath Temple Entrance.jpg|अंगूठाकार|बाएँ|मन्दिर का प्रवेश द्वार]]
बद्रीनाथ मन्दिर [[अलकनन्दा नदी]] से लगभग ५० मीटर ऊंचे धरातल पर निर्मित है, और इसका प्रवेश द्वार नदी की ओर देखता हुआ है। मन्दिर में तीन संरचनाएं हैं: गर्भगृह, दर्शन मंडप, और सभा मंडप।<ref name="about" />{{sfn |नायर |२००७ |p=६७–६८ }}{{sfn |त्यागी |१९९१ |p=७० }} मन्दिर का मुख पत्थर से बना है, और इसमें धनुषाकार खिड़कियाँ हैं। चौड़ी सीढ़ियों के माध्यम से मुख्य प्रवेश द्वार तक पहुंचा जा सकता है, जिसे सिंह द्वार कहा जाता है। यह एक लंबा धनुषाकार द्वार है। इस द्वार के शीर्ष पर तीन स्वर्ण कलश लगे हुए हैं, और छत के मध्य में एक विशाल घंटी लटकी हुई है। अंदर प्रवेश करते ही मंडप है: एक बड़ा, स्तम्भों से भरा हॉल जो गर्भगृह या मुख्य मन्दिर क्षेत्र की ओर जाता है। हॉल की दीवारों और स्तंभों को जटिल नक्काशी के साथ सजाया गया है।{{sfn |सेनगुप्ता |२००२ |p=३२ }} इस मंडप में बैठ कर श्रद्धालु विशेष पूजाएँ तथा आरती आदि करते हैं। सभा मंडप में ही मन्दिर के धर्माधिकारी, नायब रावल एवं वेदपाठी विद्वानों के बैठने का स्थान है। गर्भगृह की छत शंकुधारी आकार की है, और लगभग १५ मीटर (४९ फीट) लंबी है। छत के शीर्ष पर एक छोटा कपोला भी है, जिस पर सोने का पानी चढ़ा हुआ है।{{sfn |नायर |२००७ |p=६७–६८ }}{{sfn |नौटियाल |१९६२ |p=११० }}
 
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