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(नया पृष्ठ: '''मनोविक्षिप्ति''' (Psychosis) मन की वह दशा है जिसमें मन संसार के साधारण व्...)
 
यह विक्षिप्ति पैतृक परंपरा से प्राप्त होती है। कितने ही कुटुंबों में पीढ़ी दर पीढ़ी इसे देखा जाता है। कभी कभी पिता की और कभी माता की पूर्व पीढ़ियों में इसे पाया जाता है। कभी कभी तुरंत के पहले की पीढ़ी में मनोविक्षिप्ति नहीं रहती, परंतु किसी सुदूर पूर्वज में यह पाई जाती है। किसी विशेष प्रकार के रोग के कारण जीन (gene) की विशिष्ट प्रकार की क्षति हो जाती है और जब यही जीन फिर से नए शरीर के निर्माण का कारण होता है, तब उसकी क्षति इस नए प्राणी में व्यक्त होती है। जिस प्रकार क्षय रोग और उपदंश (गर्मी) वंशपरंपरागत चलते रहते हैं, उसी प्रकार शरीर-जन्य मनोविक्षिप्ति वंशपरंपरागत चलती रहती है। इस प्रकार के रोग की चिकित्सा के लिये अनेक वैज्ञानिक खोंजें हो रही हैं, परंतु उनमें पर्याप्त सफलता अभी तक नहीं मिली है।
 
===मनोजन्य मनोविक्षिप्ति===
दूसरे प्रकार की मनोविक्षिप्ति मनोविकारजन्य है। यह विक्षिप्ति प्रबल मानसिक संघर्ष से उत्पन्न होती है। इस प्रकार के रोगी के पूर्वजों में मनोविक्षिप्ति का पाया जाना अनिवार्य नहीं है। इसे हम '''मनौवैज्ञानिक मनोविक्षिप्ति''' कह सकते हैं।
 
 
विक्षिप्त व्यक्ति के प्राय: सभी व्यवहार असाधारण होते हैं। वह कभी कभी ही सामान्य स्थिति में आता है, पर सनकी मनुष्य समाज में अपना जीवन ठीक से चलाता रहता है। समाज के दूसरे लोग उसे भले ही झक्की, सनकी कहें पर वह अपना काम अधिकतर ठीक से कर लेता है। सनकी, अथवा उन्मादग्रस्त, व्यक्ति थोड़े समय ही असाधारण रहता है, किंतु विक्षिप्ति सब समय असाधारण रहता है। सनकी मनुष्य को असाधारणतया का ज्ञान कभी कभी हो जाता है। वह अपने आपको इससे मुक्त करने की चेष्टा भी करता है और निरंतर प्रयत्न करने से वह अपनी असाधारणता से मुक्त भी हो जाता है। विक्षिप्त व्यक्ति में यह क्षमता नहीं रहती। जीवन में वह अपने आपको सँभाल भी नहीं सकता। दूसरों को उसकी देखभाल करनी पड़ती है।
 
 
==मनोविक्षिप्ति के कुछ रूप==