"रविदास": अवतरणों में अंतर

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== दोहे ==
 
*: जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।<br>
: रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात॥
 
*: मन चंगा तो कठौती में गंगा
 
*: तुम कहियत हो जगत गुर स्वामी।<br>
: हम कहियत हैं कलयुग के कामी॥
 
*: मन ही पूजा मन ही धूप । <br>
: मन ही सेऊँ सहज सरूप॥
 
*: ऐसा चाहूं राज मैं मिले सबन को '''अन्न ।<br>
: छोट-बड़ो सब सम बसे, रविदास रहे प्रसन्न ॥
 
== संदर्भ ==