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== परिचय ==
[[चित्र:Château de Himeji02.jpg|right|thumb|300px|ऐतिहासिक वास्तु : '''हिमेजी दुर्ग''' (जापान)]]
[[चित्र:PantheonRoma.jpg|right|thumb|300px|[[रोम]] स्थित [[पैन्थियॉन]] के आंतरिक भाग की नक्काशी ; पियरर्स कॉन्वर्सेशन्सलेक्सिकॉन इनसाइक्लोपीडिया, प्रकाशक: जोसेफ कुर्स्चनर, १८९१ ; पैंथियन का श्रेय [[दमिश्क]] के वास्तुकार अपोलोडोरस को दिया जाता है।]]
 
प्राचीन काल में वास्तुकला सभी कलाओं की जननी कही जाती थी। किन्तु वृत्ति के परिवर्तन के साथ और संबद्ध व्यवसायों के भाग लेने पर यह समावेशक संरक्षण की मुहर अब नहीं रही। वास्तुकला पुरातन काल की सामाजिक स्थिति प्रकाश में लानेवाला मुद्रणालय भी कही गई है। यह वहीं तक ठीक है जहाँ तक सामाजिक एवं अन्य उपलब्धियों का प्रभाव है। यह भी कहा गया है कि वास्तुकला भवनों के अलंकरण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जहाँ तक ऐतिहासिक वास्तुकला का सम्बन्ध है, यह अंशत: सत्य है। फिर वास्तुकला सभ्यता का साँचा भी कही गई है। जहाँ तक पुरातत्वीय प्रभाव है, यह ठीक है किन्तु वास्तुकला के इतिहास पर एक संक्षिप्त दृष्टिपात से यह स्पश्ट हो जाएगा कि मानव के प्राचीनतम प्रयास शिकारियों के आदिकालीन गुफा-आवासों, चरवाहों के चर्म-तम्बुओं और किसानों के झोपड़ों के रूप में देख पड़ते हैं। नौका-आवास और वृक्षों पर बनी झोपड़ियाँ पुराकालीन विशिष्टताएँ हैं। धार्मिक स्मारक बनाने के आदिकालीन प्रयास पत्थर और लकड़ी की बाड़ के रूप में थे। इन आदिकालीन प्रयासों में और उनके सुधरे हुए रूपों में सभी देशों में कुछ न कुछ बातें ऐसी महत्वपूर्ण और विशिष्ट प्रकार की हैं कि बहुत दिन बाद की महानतम कला कृतियों में भी वे प्रत्यक्ष हैं।
इसमें सन्देह नहीं कि वास्तुकला का आधार इमारतें हैं, किन्तु यह इमारतें खड़ी करने के अतिरिक्त कुछ और भी हैं जैसे कविता गद्य रचना के रचना के अतिरिक्त कुछ और भी है। मीठे स्वर में गाए जाने पर कविता प्रभावशाली होती ही है, किन्तु जब उसके साथ उपयुक्त संगीत और लययुक्त नृत्य चेष्टाएँ भी होती हैं तब वह केवल मनुष्य के हृदय की और विभिन्न इन्द्रियों को ही आकर्षित नहीं करती अपितु इनके गौरवपूर्ण मेल से निर्मित सारे वातावरण से ही उसे अवगत कराती है। इसी प्रकार वास्तुकल्पनाएँ, दार्शनिक गतिविधियों से, काव्यमय अभिव्यक्तियों से और सम्मिलित लयात्मक, संगीतात्मक तथा वर्णात्मक अर्थों से परिपूर्ण होती हैं और ऐसी उत्कृष्ट वास्तुकृतियाँ मानव के अन्तर्मानस को छूती हुई सभी प्रकार से उसकी प्रशंसा का पात्र होती हैं और फिर विश्वव्यापी ख्याति अर्जित करती हैं। सर्वसम्मत महान्‌ वास्तुकृतियों की यह प्रशस्ति चिरस्थायी होती है और भावी पीढ़ियों को प्रेरणा देती है।
 
यह सत्य है कि वास्तुकला के प्रयोगों में बहुत अस्थिरता रही है, जिससे अगणित शैलियाँ प्रकट हो गई हैं। किन्तु उन शैलियों से किसी वास्तुक को क्या प्रयोजन? या उनका उसके युग से क्या सम्बन्ध ? सच तो यह है कि वास्तुकला न कोई पंथ है न शैली, वरन्‌ यह तो विकास का अटूट क्रम है। इसलिए वास्तुक को शैलियों से विशेष प्रयोजन नहीं, जैसे बदलते हुए फैशन से किसी महिला की पोशाक का कोई सम्बन्ध नहीं। इस विषय में फ्रैंकलायड राइट ने कहा है कि वास्तुकला की परिधि इधर उधर हटती रहती है, उसका केन्द्र नहीं बदलता।
 
आधुनिक वास्तुकला का और व्यापक अर्थों में, वास्तुकला का विकास विन्यास की संरचनात्मक आवश्यकताओं और उपलब्ध सामग्री की सौन्दर्य सम्भावनाओं द्वारा प्रस्तुत प्रतिबन्धों की उपस्थिति में सुन्दरता के लिए खोज और संघर्ष के फलस्वरूप हुआ है। जब इनके फलस्वरूप किसी रचना की सृष्टि होती है, तब ऐसा लगता है कि आज की वास्तुकला भारी रचनाओं और आवृत्तियों के रूप में व्यक्त मूर्तिकला ही है। यदि इस सन्दर्भ में देखे तो वास्तुकला व्यक्ति के अपने सर्जक मन की सम्पूर्ण एवं सुविकसित रचना होनी चाहिए, जो स्वयम्भू के उच्च स्तर तक पहुँचती है।