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==परिचय==
सन्त चरणदास का जन्म गांव देहरा, जिला अलवर, राजस्थान में च्यवनगौत्रीय भृगुवंशी ढूसर परिवार में विक्रमी संवत् 1760 अर्थात् 1703 ईस्वी में हुआ । उनके पिताजी का नाम श्री मुरलीधर दास और माताजी का नाम कूजो देवी था । हरियाणा के गांव ढोसी से निकलकर जो भी परिवार दूसरे गांवों में बसे उनको ढूसर बोला गया जिनमें ब्राह्मणों के साथ अन्य जातियों के परिवार भी ढूसर ही कहलाते हैं । उनसे आठ पीढ़ी पहले उनके पूर्वज श्री शोभादास जी की भक्ति से प्रसन्न होकर युगल सरकार जी ने आठ पीढ़ी बाद की चरणदास जी के जन्म का वरदान दिया था । अतः सन्त चरणादास जी को भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है ।
चरण दास जी का जन्म् सन् 1706 ई0 में [[राजस्थान]] के [[अलवर जिला]] ([[मेवाड़]] क्षेत्र) के डेहरा ग्राम में हुआ था। बचपन में इनकी माता का देहान्त हो गया था। इनके पिता ने भी इस समय गृहत्याग दिया था। इस कारण चरणदास जी को उनके नाना जो कि [[दिल्ली]] में निवास करते थे, अपने साथ दिल्ली ले कर आ गये। इस समय चरणदास जी मात्र 7 वर्ष के थे। इस काल में भारत अनेकों सामाजिक कुरीतियों का शिकार था। ऊँच-नीच जाति-पांति का विकृत स्वरूप था। जनता मनसबदारों से त्रस्त थी। समाज में समाजिक मूल्यों का पतन हो चुका था। तांत्रिक बौद्धों के प्रभाव अभी जीवित बने हुऐ थे। छोटे-छोटे राजा आपस में लड़कर पाश्चात्य राजसत्ता के समक्ष अपना सब कुछ गवाँ रहे थे। अषतोष असुरक्षा सांस्कृतिक धार्मिक शून्यता फैलती जा रही थी। ऐसे समय में चरणदास जी [[कृष्ण]]-भक्ति की सशक्त डोर लिए जीवन के लक्ष्य साधन हेतु [[अष्टांग योग]] की साधना का प्रचार करने लगे। 79 वर्ष की अवस्था में सन् 1785 ई0 में चरणदास जी [[समाधि]]स्थ हुए। एक ही स्थान पर जीवनपर्यन्त इनकी योगसाधना चलती रही। आज भी [[जामा मस्जिद, दिल्ली|जामा मस्जिद]] के पास इनका आखाड़ा इनके बताये अनुशासनों के अनुसार सक्रिय है। हजारों योग अनुयायी आज भी इनके बताये मार्ग पर साधनाशील है।
 
सन्त चरणदास को पांच वर्ष की अल्पायु में ही गांव के बाहर नदी के किनारे भगवान वेदव्यास ने दर्शन दिये थे । अल्पायु में ही वे तार्थयात्रा के लिये निकल पड़े और शुकताल में श्रीगंगाजी के तट पर शुकदेव मुनि ने दर्शन देकर गुरुदीक्षा प्रदान की । उसके बाद वे पुरानी दिल्ली में आकर रहने लगे और 14 वर्ष तक भक्ति और तप किया । फिर वे श्रीवृन्दावन में चले गये जहां श्रीराधा-कृष्ण युगल सरकार ने उन्हें दर्शन दिये ।
 
सन्त चरणदास पुनः दिल्ली आकर रहने लगे और अपनी भक्ति और तप से मानवमात्र के दुखों को दूर करने लगे । उनकी ख्याति सुनकर दिल्ली के तत्कालीन बादशाह मुहम्मदाशाह उनके पास आने लगे और उनका शिष्यत्व ग्रहण किया । सन्त चरणदास ने छः महीने पहले ही ईरान से नादिरशाह के दिल्ली पर आक्रमण की भविष्यवाणी मुहम्मदशाह को लिखित रुप दी थी । नादिरशाह का भी दिल्ली लूटने के दौरान सन्त जी से आमना-सामना हुआ । सन्तजी के तेज के समाने नादिरशाह नतमस्तक हो गया और उनके कहने पर दिल्ली छोड़कर ईरान को लौट गया ।
 
सन्त चरणदास जी [[कृष्ण]]-भक्ति की सशक्त डोर लिए जीवन के लक्ष्य साधन हेतु [[अष्टांग योग]] की साधना का प्रचार करने लगे । 79 वर्ष की अवस्था में सन् 1739 विक्रमी अथवा 1782 ई0 में चरणदास जी [[समाधि]]स्थ हुए। आज भी [[जामा मस्जिद, दिल्ली|जामा मस्जिद]] के पास इनका आखाड़ा इनके बताये अनुशासनों के अनुसार सक्रिय है। हजारों योग अनुयायी आज भी इनके बताये मार्ग पर साधनाशील है । उनके वैष्णव मत के शुकसम्प्रदाय की सौ से अधिक गद्दिया पूरे भारतवर्ष में कार्यरत हैं ।
 
==कृतियाँ==
:काम क्रोध मद लोभ अरू राखै ना अभिमान।
:रहै दीनताई लिये, लगै न माया बान॥ 17
:
सन्त चरणदास की वाणी निम्नलिखित 17 ग्रन्थों में विस्तृत है जिनका प्रकाशन श्री खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, मुम्बई ने भक्तिसागरादि 17 ग्रन्थ के नाम से प्रकाशित किया है ।
 
 
1. ब्रजचरित्र 2. अमरलोक अखण्डधाम वर्णन 3. अष्टाङ्गयोग 4. षट्कर्म हठयोग वर्णन 5. योगसन्देश सागर 6. ज्ञानस्वरोदय 7. हंसोपनिषद 8. धर्मजहाज 9. सर्वोपनिषद 10. T तत्वयोगोपनिषद 11. योगशिखोपनिषद 12. तेजबिन्दु उपनिषद 13. भक्ति पदार्थ 14. मनविकृत करण गुटकासार 15. श्रीब्रह्मज्ञानसार 16. शब्द वर्णन 17. भक्तिसागर वर्णन.
 
==सन्दर्भ==
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