"चपराणा राजवंश" के अवतरणों में अंतर

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== परिचय ==
गुर्जरों में 'चपराणा" गोत्र है जो चाप राजवंश के ही वंशज है चपराणा का अर्थ '''चाप(धनुष) + राणा(राजा) = धनुषधारी राजा''' निकलता है। इनके चलाए बाण अचूक कहे जाते थे और अपनी तीरअंदाजी के लिए पूरे विश्व में मशूहर थे। इनके तीर दूर तक अचूक थे। ये घोड़े पर खडे होकर, पीछे मुडकर, एक हाथ से या कहें कि हर प्रकार से तीर चलाने में सक्षम थे। गुर्जरों का चपराणा गोत्र, गुर्जरों के ही सैनिकों मेें बडा हिस्सा तीरंदाजों का था जो चाप से सम्बन्ध को गहरा करता है।
गुर्जरों को दुनिया का सबसे अच्छा घुड़सवार और धनुर्धर माना जाता था।<ref>{{cite journal |first=Vincent A. |last=Smith |title=`White Hun' Coin of Vyagrahamukha of the Chapa (Gurjara) Dynasty of Bhinmal |journal=Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland |date=October 1907 |pp=923–928 |DOI=10.1017/S0035869X00036868 |JSTOR=25210490|url=https://zenodo.org/record/2131068/files/article.pdf }}</ref>
 
==इतिहास==
सातवीं शताब्दी में भीनमाल से गुर्जरदेश (आधुनिक राजस्थान गुजरात गुर्जरत्रा) पर शासन करने वाले राजा [[व्याघ्रमुख]] गुर्जर चाप वंश के थे।{{sfn|भगवत शरण उपाध्याय, भारतीय संस्कृति के स्त्रोत, नई दिल्ली, 1991}}। उसका सिक्का हूणों के सिक्कों की नकल है, इसलिए इसे वी॰ए॰ स्मिथ द्वारा 'राजा व्याघ्रमुख चपराणा' के हूण सिक्के के रूप में कहा गया।{{sfn|वी॰ऐ॰स्मिथ, व्हाइट हूण कोइन ऑफ़ व्याघ्रमुख ऑफ़ दी चप (गुर्जर) डायनेस्टी ऑफ़ भीनमाल}} मध्यप्रदेश के चंबल संभाग में चपराणा और हूण गुर्जर पाग-पटल भाई के रूप में जाने जाते हैं। वनराज चावड़ा, जिन्होंने अनिलवाड़ा शहर की स्थापना की थी, पंवार और पंवार गुर्जरहूण मूल के गुजराती थे। इस प्रकार चाप, चपराना, चावड़ा, चपोटक, छावडा, छावडी भी गुर्जरहूण मूल के हैं।{{sfn|विन्सेंट ए. स्मिथ, दी ऑक्सफोर्ड हिस्टरी ऑफ इंडिया, चोथा संस्करण, दिल्ली}} होर्नले ने इन्हें चावड़ाहूण मूल का गुर्जर बताया है।{{sfn|ऐ.आर.रडोल्फ होर्नले, “The Gurjara clans, some problems of ancient Indian History” No. III. JRAS, 1905, pp 1-32}}
 
आठवीं शताब्दी के आरम्भ में गुर्जारत्रगुर्जर-प्रतिहार उज्जैन के शासक थे। नाग भट प्रथम ने उज्जैन में गुर्जरों के इस नवीन राजवंश की नींव रखी थी। संभवतः इस समय गुर्जरत्रगुर्जर प्रतिहार भीनमाल के चप/चावडा वंशीय गुर्जर के सामंत थे।{{sfn|बी. एन. पुरी. हिस्ट्री ऑफ गुर्जर-प्रतिहार, नई दिल्ली, 1986}}
 
नक्षत्र विज्ञानी ब्रह्मगुप्त की पुस्तक ब्रह्मस्फुत सिधांत के अनुसार भीनमाल चाप वंश के व्याघ्रमुख का शासन था। 51 व्याघ्रमुख का एक सिक्का प्राप्त हुआ है, इस पर भी ‘सासानी’ ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण है। वी॰ए॰ स्मिथ ने इस सिक्के की पहचान श्वेत हूणों के सिक्के के रूप में की थी तथा इस विषय पर एक शोध पत्र लिखा जिसका शीर्षक है “व्हाइट हूण कोइन ऑफ़ व्याघ्रमुख ऑफ़ दी चप (गुर्जर) डायनेस्टी ऑफ़ भीनमाल”