"धार्मिक अध्ययन": अवतरणों में अंतर

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'''धार्मिक अध्ययन''' उन्हें कहते जो धर्म के बारे में पढ़ाई होती है। धार्मिक अध्ययन , जिसे धर्म के अध्ययन के रूप में जाना जाता है , एक धार्मिक क्षेत्र है जो धार्मिक मान्यताओं, व्यवहारों और संस्थानों में शोध करने के लिए समर्पित है। यह धर्म का वर्णन, तुलना, व्याख्या, और धर्म को समझाता है, व्यवस्थित, ऐतिहासिक रूप से आधारित, और पार सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर जोर देता है।
जबकि धर्मविज्ञान उत्थान या अलौकिक शक्तियों (जैसे देवताओं) की प्रकृति को समझने का प्रयास करता है, धार्मिक अध्ययन किसी भी धार्मिक धार्मिक दृष्टिकोण से धार्मिक व्यवहार और विश्वास का अध्ययन करने की कोशिश करता है। धार्मिक अध्ययन मानव विज्ञान, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शन और धर्म के इतिहास समेत कई विषयों और उनकी पद्धतियों पर आकर्षित होते हैं।
धार्मिक अध्ययन 1 9वीं शताब्दी में हुआ, जब बाइबल का विद्वान और ऐतिहासिक विश्लेषण बढ़ गया था, और हिंदू और बौद्ध ग्रंथों का पहली बार यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद किया जा रहा था। शुरुआती प्रभावशाली विद्वानों में नीदरलैंड में इंग्लैंड में फ्रेडरिक मैक्स मुल्लेर और कॉर्नेलियस पी। टाइल शामिल थे। आज विश्वव्यापी विद्वानों द्वारा धार्मिक अध्ययन का अभ्यास किया जाता है। अपने प्रारंभिक वर्षों में, इसे तुलनात्मक धर्म या धर्म विज्ञान के रूप में जाना जाता था, और संयुक्त राज्य अमेरिका में, वे लोग हैं जो आज भी धर्म के इतिहास के रूप में क्षेत्र को जानते हैं (सामान्य रूप से शिकागो विश्वविद्यालय के लिए प्रासंगिक पद्धतियों से जुड़े, और विशेष रूप से 1 9 50 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 1 9 80 के दशक के अंत तक मिर्सी एलीएड)।
"धर्म" शब्द का जन्म लैटिन संज्ञा "धर्मियो" से हुआ था, जिसे तीन क्रियाओं में से एक से नामांकित किया गया था: "पुनर्जन्म" (लगातार ईमानदारी से पालन करने के लिए); "धर्म" (खुद को बांधने के लिए [पीछे]); और "reeligere" (फिर से चुनने के लिए)। इन तीन अलग-अलग संभावित अर्थों के कारण, अकेले एक व्युत्पत्ति विश्लेषण धर्म को परिभाषित करने की अस्पष्टता को हल नहीं करता है, क्योंकि प्रत्येक क्रिया से धर्म की अलग समझ हो जाती है। मध्ययुगीन काल के दौरान, "धार्मिक" शब्द का उपयोग किसी ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए किया जाता था जो एक मठवासी क्रम (एक "धार्मिक") में शामिल हो गया था।
धार्मिक अध्ययन विद्वान वाल्टर कैप्स ने अनुशासन के उद्देश्य को "प्रशिक्षण और अभ्यास ... को धर्म के विषय के बारे में पूछताछ निर्देशित करने और आयोजित करने के लिए" प्रदान किया। साथ ही, कैप्स ने कहा कि इसका दूसरा उद्देश्य धर्म के विषय को समझने के लिए निर्धारित तरीके और पूछताछ की तकनीक का उपयोग करना था। धार्मिक अध्ययन विद्वान रॉबर्ट ए सेगल ने अनुशासन को "एक विषय वस्तु" के रूप में वर्णित किया जो "कई दृष्टिकोणों के लिए खुला" है, और इस प्रकार इसे "अनुशासनात्मक स्थिति के योग्य होने के लिए एक विशिष्ट विधि या विशिष्ट स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है।"
क्षेत्र में परिचालन करने वाले विभिन्न विद्वानों के पास अलग-अलग हितों और इरादे हैं; उदाहरण के लिए कुछ धर्म की रक्षा करना चाहते हैं, जबकि अन्य इसे समझाने की कोशिश करते हैं, और अन्य धर्म को एक उदाहरण के रूप में उपयोग करना चाहते हैं जिसके साथ स्वयं का सिद्धांत साबित करना है। धार्मिक अध्ययन के कुछ विद्वान मुख्य रूप से धर्म का अध्ययन करने में रुचि रखते हैं, जिनके वे संबंधित हैं।
धर्म के विद्वानों ने तर्क दिया है कि इस विषय का अध्ययन व्यक्तियों के लिए उपयोगी है क्योंकि यह उन्हें ज्ञान प्रदान करेगा जो एक तेजी से वैश्वीकृत दुनिया के भीतर अंतर-व्यक्तिगत और व्यावसायिक संदर्भों में प्रासंगिक है। यह भी तर्क दिया गया है कि धर्म का अध्ययन सांप्रदायिक तनाव और धार्मिक हिंसा की सराहना और समझने में उपयोगी है।
धर्म के उद्देश्य और अनुभवजन्य अध्ययन का सामान्य नाम। जर्मन में Religionswissenschaft। आधुनिक व्यक्तिगत विज्ञान के शासन के रूप में, स्थापना 1 9वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में और धार्मिक मनोविज्ञान विभाग, धार्मिक समाजशास्त्र, तुलनात्मक धर्म अध्ययन, धार्मिक इतिहास, धार्मिक मानव विज्ञान आदि से परे एक विशिष्ट धर्म के धर्म के दृष्टिकोण से हुई है। इसे अक्सर धर्मशास्त्र के सार और सामान्यता को लक्षित करने वाले धर्मशास्त्र , शिक्षण और धार्मिक दर्शन से अलग किया जाता है ।
→ मल्लर भी देखें
 
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काठगढ़ महाशिवरात्रि पर विशेष
[[श्रेणी:धार्मिक अध्ययन|*]]
विश्वभर में काठगढ़ शिवशक्ति महादेव का शिवलिंग अद्भुत,अलौकिक व विश्व की दिव्य शक्तियों का केन्द्रीय स्थल है शिवशक्ति शिवलिंग दर्शन करते मन नहीं भरता
(स्वतन्त्रत लेखक/पत्रकार राम प्रकाश ज्योतिषी )
शिवरात्रि के पावन पर्व पर काठगढ़ में शिवशक्ति स्वयं यहां प्रत्यक्ष अपनी अनुभूतियों का आभास करवाते हैं । असंख्य श्रद्धालु शिव लिंग के उपर जल अभिषेक करके वह अपनी श्रद्धा अनुसार पूजा अर्चना करके शिव पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ।
विश्व स्तर पर भगवान शिव शंकर के असंख्य शिव लिंग व शिव मन्दिर है । जो स्वयं ही अलौकिक शक्तियों से सुसज्जित व साक्षात भोलेनाथ महादेव का ज्योति स्वरूप है । विश्वभर में काठगढ़ महादेव का शिवलिंग अद्भुत, अलौकिक व विश्व की दिव्य शक्तियों का केन्द्रीय स्थल है । इस शिवलिंग के दो भाग हैं जो एक साथ है । एक शिव व दूसरा शाक्ति माता पार्वती का प्रतीक है । इस दिव्य स्थल पर पहुंचते ही दिव्य शक्तियों का अनुभूति होने लगती है। काठगढ़ शिवशक्ति शिवलिंग लिंग के दर्शन करते ही बरवस मन शिव भक्ति में रमने लगता है । शिव भगतजनो के लिए यह स्थल साक्षात् शिवशक्ति का प्रत्यक्ष दर्शन व अनुभूति का ध्यान स्थल है । चाहे राजा हो या रंक जो भी इनके साक्षात दर्शन करने आते हैं शिवशक्ति उन्हें अपने शरण में ले लेती है । काठगढ़ शिवशक्ति शिव लिंग के दर्शन मात्र से तीनों जन्मों के पापों का नाश हो जाता है। भोलेभंडारी सभी सांसारिक दैविक भौतिक दैहिक संतापो का नाश कर देते हैं ।
संतो, महात्माओं व ऋषियों के कथन अनुसार इस शिवलिंग का संबन्ध सृष्टि की उत्पत्ति से है । वैसे इसे अर्धनारीश्वर शिवलिंग भी कहा जाता है ।हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा में स्थित काठगढ़ महादेव का मंदिर विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां दो भागों में बंटा ‌शिवलिंग हैं।माना जाता है कि मां पार्वती और भगवान शिव के दोनों भागों के बीच का अंतर घटता बढ़ता रहता है। यह अंतर ग्रहों व नक्षत्रों के परिवर्तित होने के अनुसार ही बदलता रहता ।
विशेषता :- सर्दियों में यह दो पाषाण वाला शिवलिंग धीरे धीरे एक हो जाता है और गर्मियों में धीरे धीरे अलग हो जाता है अनुमानित तीन इंच का अन्तर रहता है । यह प्रकृति का नियम सृष्टि के सर्जन से चल रहा है ।
काठगढ़ शिव मन्दिर का शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार ब्रह्मा व विष्णु भगवान के मध्य बड़प्पन को लेकर युद्ध हुआ था। भगवान शिव इस युद्ध को देख रहे थे। युद्ध को शांत करने के लिए भगवान शिव महाग्नि तुल्य स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। इसी महाग्नि तुल्य स्तंभ को काठगढ़ में विराजमान महादेव का शिवलिंग स्वरूप माना जाता है। इसे अर्द्धनारीश्वर शिवलिंग भी कहा जाता है। आदिकाल से स्वयंभू प्रकट सात फुट से अधिक ऊंचा, छह फुट तीन इंच की परिधि में भूरे रंग के रेतीले पाषाण रूप में यह शिवलिंग ब्यास व छौंछ खड्ड के संगम के नजदीक टीले पर विराजमान है। यह शिवलिंग दो भागों में विभाजित है। छोटे भाग को मां पार्वती तथा ऊंचे भाग को भगवान शिव के रूप में माना जाता है। मान्यता अनुसार मां पार्वती और भगवान शिव के इस अर्द्धनारीश्वर के मध्य का हिस्सा नक्षत्रों के अनुरूप घटता-बढ़ता रहता है और शिवरात्रि पर दोनों का मिलन हो जाता है
इतिहास में वर्णन है कि सिख राजा रणजीत सिंह ने इस जगह की महानता को देखकर यहां मंदिर भी बनवाया था। काठगढ़ मंदिर के सौंदर्यीकरण के बारे में कथा मिलती है कि महाराजा रणजीत सिंह को यह धाम अत्‍यंत प्रिय था। उन्‍होंने अपने शासनकाल के दौरान मंदिर का विस्‍तार किया। उनकी काठगढ़ मंदिर के प्रति इतनी अगाध आस्‍था थी कि वह प्रत्‍येक शुभ कार्य में मंदिर के समीप ही स्थित कुएं का जल प्रयोग करते थे। इतिहास का मुख्य अध्याय यूनानी राजा सिकंदर से भी जुड़ा है। कहा जाता है- 326 ई. पूर्व जब सिकंदर भारत में तबाही मचाते हुए आगे बढ़ रहा था तो एक यही मंदिर था जहां से उसकी सेनाएं आगे नहीं बढ़ पाई थी। लाख के बावजूद जब सिकंदर आगे नहीं बढ़ पाया तो इस जगह की महानता को समझा। बाद में यहां उसने यूनानी कला से लबरेज चबूतरे भी बनवाए। आज भी मंदिर परिसर में यूनानी कला की कृतियां देखने को मिल जाएंगी।मंदिर परिसर में आज भी यूनानी कलाकृतियां देखने को मिल जाएंगी। सेना आगे बढ़ती देख सिकंदर हताश हो गया था। उसी को दर्शाता एक बुत यहां लगाया गया है। किंवदंती है कि पहले यहां गुज्जर रहते थे। उन्होंने इस पत्थर को तोड़ना चाहा। नहीं टूटा। उस समय के राजे को पता चला तो उसने सैनिक भेज पत्थर लेकर आने को कहा। मान्यता है- खुदाई करते मकौड़े यहां प्रकट हुए। जिन्होंने शिवलिंग की रक्षा की। आज भी यहां मकौड़ों की भारी संख्या देखने को मिलती है।
मंदिर में स्‍थापित शिवलिंग अष्‍टकोणीय है जो अष्ट दिशाओं के वोध का प्रतीक है। शिव के रूप में पूजे जाने वाले शिवलिंग की ऊंचाई तो 8 फुट है वहीं माता पार्वती के रूप में पूजे जाने वाले हिस्‍से की ऊंचाई 6 फुट है।
पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार काठगढ़ मंदिर मर्यादा पुरुषोत्‍तम श्री राम के अनुज भ्राता भरत को अत्‍यंत प्रिय था। यही नहीं इसे उनकी आराध्‍य स्‍थली भी कहा जाता है। कथानकों के अनुसार भरत जी जब भी अपने ननिहाल कैकेय देश जाते तो इस मंदिर के दर्शन जरूर करते। इसके अलावा जब कभी उन्‍हें मौका मिलता तो भी इस स्‍थान पर भोलेनाथ और माता पार्वती की पूजा करने आते थे।
पठानकोट से 20 किलोमीटर दूर है काठगढ़ मन्दिर ।दिल्ली, चंडीगढ़, हरिद्वार, जम्मू कश्मीर, शिमला,चंवा, जालन्धर, अमृतसर से वाया तलवाड़ा पंजाब, वाया जसूर हिमाचल,वाया पठानकोट हवाई मार्ग, परिवहन, रेल मार्ग इस स्थल तक पहुंच सकते हैं ।
महाशिवरात्रि
आमतौर पर शिव रात्रि का व्रत हर माह आता है जिसे हम मासिक शिवरात्रि कहते है, लेकिन माघ के महीने में कृष्णा पक्ष की चतुर्दर्शी तिथि को महाशिवरात्री मनाई जाती है।
1 मार्च 2022 महाशिवरात्रि का मुहूर्त ।
निशीथ काल पूजा मुहूर्त – सुबह 12 बजकर 8 मिनट से लेकर 12 बजकर 58 मिनट तक। जिसकी समय सीमा करीब 50 मिनट की रहेगी।
महाशिवरात्रि पारणा मुहूर्त – सुबह 6 बजकर 45 मिनट, दिन 2 मार्च।
चतुर्दर्शी तिथि प्रारम्भ- 1 मार्च 2022 को सुबह 3 बजकर 16 मिनट पर।
चतुर्दर्शी तिथि समाप्त- 2 मार्च 2022 को सुबह 1 बजे।
 
 
 
 
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