"भट्टिकाव्य": अवतरणों में अंतर

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भट्टि ने स्वयं अपनी रचना का गौरव प्रकट करते हुए कहा है कि यह मेरी रचना व्याकरण के ज्ञान से हीन पाठकों के लिए नहीं है। यह काव्य टीका के सहारे ही समझा जा सकता है। यह मेधावी विद्वान के मनोविनोद के लिए रचा गया है, तथा सुबोध छात्र को प्रायोगिक पद्धति से व्याकरण के दुरूह नियमों से अवगत कराने के लिए।
 
भट्टिकाव्य की प्रौढ़ता ने उसे कठिन होते हुए भी जनप्रिय एवं मान्य बनाया है। प्राचीन पठनपाठन की परिपाटी में भट्टिकाव्य को सुप्रसिद्ध [[पंचमहाकाव्यपञ्चमहाकाव्य]] ([[रघुवंश]], [[कुमारसंभव]], [[किरातार्जुनीय]], [[शिशुपाल वध|शिशुपालवध]], [[नैषधीयचरित|नैषधचरित]]) के समान स्थान दिया गया है। लगभग 14 टीकाएँ जयमंगला, [[मल्लिनाथ]] की सर्वपथीन एवं जीवानन्द कृत हैं। माधवीयधातुवृत्ति में [[आदि शंकराचार्य]] द्वारा भट्टिकाव्य पर प्रणीत टीका का उल्लेख मिलता है।
 
आरम्भ के तीन श्लोक देखें-