"भक्ति": अवतरणों में अंतर

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amrutam अमृतम पत्रिका, ग्वालियर
 
भक्ति क्या है?.
 
क्या श्रीकृष्ण भक्ति की वजह से बढ़ गए थे? ..
 
भक्ति के क्या फायदे हैं?..
 
भक्ति कैसे करें?..
 
माँ यशोदा ने कब भक्ति की थी?..
 
राधा की भक्ति क्या है।
मीरा ने किसकी भक्ति की थी?..
 
भक्ति का बंधन….दृढ़ भक्ति के बन्धन में भगवान स्वयं ही बंध जाते है। इसमें ना जिद्द करनी पड़ती है और ना ही क्रोध। भक्ति के लिए पूर्ण आस्था चाहिए।
भक्ति हेतु अभ्यास के प्रति दृढ़ता रखनी पड़ती है, धैर्य रखना पड़ता है, इसमें निरन्तर, चिन्तन, ध्यान अजपा-जप का अभ्यास करते रहना चाहिए। जब तक निश्चित तथ्य तक न पहुँच जाय, तब तक इसे टूटने देना नहीं चाहिए कि कहीं ये अभ्यास टूट नहीं जाये।
गोपियों की शिकायत पर जब मैया यशोदा भगवान श्री कृष्ण को पकड़ने दौड़ी तो कान्हा यहाँ से वहाँ वहाँ से कहाँ कहाँ दौड़ने लगे।
माँ यशोदा की पकड़ में कन्हैया जब बहुत समय तक नहीं आये, तो मैय्या थक हारकर और पसीने से लथपथ होकर बैठ गयीं।
बड़े-बड़े सिद्ध महर्षि, त्रिकालदर्शी, ऋषिमुनि, महामुनि और योगी जिसको अनुभव में नहीं ला सके और अनेकों जन्म बिता दिए। उसी परम परमेश्वर रूपी कान्हा को मैय्या पकड़ना चाहती है।
थक हारकर जब माँ ने सोचा कि अब इसे नहीं पकड़ सकती हूँ, तो बैठ गयी और चुपचाप शान्त देखने लगी। बहुत परेशानी के पश्चात मैय्या का मन भगवान में एकाग्र हो गया, तो श्री कृष्ण स्वयं ही माँ के पास चले आये और अपना हाथ मैय्या के हाथों में थमा दिया, तो माँ यशोदा ने सोचा कि मैंने कान्हा को पकड़ लिया, भगवान पकड़ में आ गये, तो विचार किया कि इसे बांध देती हूँ।
कान्हा चोरी के समय ऊखल के ऊपर खड़े थे, मैय्या ने सोचा इसी से बाँध दूँ, तो रस्सी खोजने लगी लेकिन रस्सी दिखाई नहीं पड़ी। जो सिर में बालों को गूथनें की जो वेणी डोरी थी, उसी को बाँधने लगी। पर वह दो अंगूल छोटी पड़ गई ।
मैय्या ने गोपियों से कहा कि जाओं रस्सी ले आओं गोपियां रस्सी ले आई पर सब रस्सी जोड़ देने पर भी दो अंगूल छोटी पड़ गई, तब गोपियां बोली- यशोदा रानी कन्हैया को छोड़ दो इनके भाग में बन्धन लिखा ही नहीं है। मैय्या भी जिद्द पर आ गई और बोली आज इसे मैं बाँध के ही रहूँगी। यही भक्ति का बंधन है!
ऊखल किसे कहते हैं…उखल का एक मतलब संत महात्मा भी मान सकते हैं जो एकदम खाली है और परोपकारी है!
असंत जन अर्थात लोभी लालची सांसारिक जन उन्हें मुसल बन कुटते रहते हैं तब भी वे शांत ही रहते हैं स्वयं को दुख देकर भी दूसरों को सुख पहुंचाते रहते हैं।
भगवान श्री कृष्ण ने जब माता को बहुत ही थकी हुई देखा तो कान्हा ने सोचा कि अब भक्ति के बंधन में बंध जाना चाहिए मां ने उन्हें उखल से बांध दिया अतः कान्हा नहीं सोचा की मां यशोदा कई जन्मों से मेरी भक्ति में लीन है!
यमलार्जुन के पेड़ की कहानी…पुरानी भक्त हैं इनसे बंध ही जाना चाहिए परमेश्वर कभी किसी से बंधता नहीं है और यदि विशेष भक्ति वश किसी वक्त के हाथों बंध भी जाते हैं, तो किसी ना किसी का उपकार ही करते हैं!
भगवान श्रीकृष्ण ने जिस स्थान पर कान्हा को बांधा गया वहीं यमलार्जुन वृक्ष थे उनके रूप में कुबेर के पुत्रों का उद्धार होना था।
बालक कृष्ण ने सोचा कि इस उखल के साथ क्यों ना इनका भी उद्धार कर दूं कुबेर के दोनों पुत्रों कुबेर और मणिग्रीव को देवर्षि नारद ने इसी स्थान पर कान्हा द्वारा शपोद्धार का वरदान दिया था कि द्वापर में श्रीकृष्ण तुम्हें श्राप मुक्त करेंगे जब तक तुम दोनों वृक्ष बन कर उस समय तक उनकी प्रतीक्षा करो उन दोनों कुबेर पुत्रों के उद्धार हेतु भगवान उखल के साथ ही दोनों वृक्षों के बीच से निकले तो ऊपर फस गया और यमलार्जुन वृक्ष तड़ तड़कर गिर पड़े।
प्रेम से धारा बने राधा :----धारा को उलट दो, राधा बन जाएगी। पर क्या यह इतना सरल है। शायद नहीं, क्योकिं धारा तो सतत प्रवाहमान रहती हैं। उसके संग बहना सरल है। उसके विपरीत बहना कठिन है।
धारा यानी भक्ति की धारा। ज्ञान गंगा भी कह सकते हैं। गंगावतरण भागीरथ प्रयास से ही संभव हुआ था।
भक्ति धारा का अवतरण भी चित्त वृत्ति को निर्मल करने के बाद ही होता है। मन चंगा होगा तभी तो कठौती में गंगा के दर्शन होगे।
गंगा नीर के समान मन निर्मल होना चाहिए। भक्ति की धारा यानी मानस गंगा का प्रवाह कल-कल, छल-छल गति से सभी बाधाओं को पार कर परम आत्मा में मिल जाता है। आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता है।
प्रेम की प्रार्थना :--धारा को राधा बनाने के लिए प्रेम आवश्यक है। ऐसा प्रेम जो अनंत जो रोम-रोम को संत बना दे। एसा प्रेम जो दिव्य हो, अलोकिक हो।
हम प्रेम तो करते हैं, पर उसे निभा नहीं पाते आज प्रेम किया, विवाह भी कर लिया पर कल विवाद हो गया। मनभेद, मतभेद हो गया।संबंध समाप्त।
तुम तुम्हारे, हम हमारे इस तर्ज पर प्रेम समाप्त हो जाता है। यह सांसारिक प्रेम है। स्वार्थ आधारित है। ये टिक नहीं सकता है।
प्रेम वह होता है, जो जन्म जन्मांतर तक साथ न छोड़े। हम भगवान से प्रेम करते है उसमें भी स्वार्थ रहता है।
मनोकामना पूरी हो। सुख-शांति बनी रहे, सुख संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का हम प्रार्थना करते हैं। मेरा दोष क्षण में दूर हो। यह कैसा प्रेम है। इस प्रेम में याचना ही याचना है।
भगवान जिससे प्रेम करते है। उसका साथ कभी नहीं छोड़ते हैं। भक्त जैसा नचाए वैसा नाचते है। कोई भेदभाव नहीं करते।
प्रेम अलौकिक होना चाहिए। धारा को राधा बनाने के लिये प्रेम के साथ समर्पण भी आवश्यक है।
ऐसा समर्पण जो तन मन का हो। हम कहते तो हैं- तन-मन-धन सब कुछ तेरा, पर मानते अपना है। कौन अपना धन किसी को देना चाहेगा। दान देते हैं, पर चाहते हैं उसका प्रचार हो।
गुप्तदान देने में क्या मजा जंगल में मोर नाचा किसने देखा। पर भगवान जो देते है छप्पर फाड़ के देते है इतना कि आँचल में ही न समाए।
झोली छोटी पड़ जाती है। बिन माँगे मोती मिलते है। यह तब संभव होता है, जब निष्काम भाव से भक्ति हो जाए।
संपूर्ण समर्पण ऐसा कि अस्तित्व ही खत्म हो जाए। वैसा… जैसा नदी सागर से मिलने पर होता है।
प्रेम दीवानी मीरा का समर्पण भाव ऐसा रहा कि मेरे तो गिरधर गोपाल दूजा न कोई।
राधा का प्रेम ऐसा कि कृष्णमय हो गई । भक्ति का, धारा का लक्ष्य राधा बनने में ही निहित है। ऐसी राधा जिसके नाम स्मरण से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
{{निबंध|date=मार्च 2022}}
'''भक्ति''' शब्द की व्युत्पत्ति 'भज्' [[धातु (संस्कृत के क्रिया शब्द)|धातु]] से हुई है, जिसका अर्थ 'सेवा करना' या 'भजना' है, अर्थात् श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इष्ट देवता के प्रति आसक्ति। <ref>Flood, Gavin D. (2003). [https://books.google.com/?id=qSfneQ0YYY8C&pg=PA185 The Blackwell Companion to Hinduism.] Wiley-Blackwell. p. 185. ISBN 978-0-631-21535-6.</ref><ref>Cutler, Norman (1987). [https://books.google.com/?id=veSItWingx8C&pg=PA1 Songs of Experience]. Indiana University Press. p. 1. ISBN 978-0-253-35334-4.</ref>
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