"विधिक व्यक्तित्व": अवतरणों में अंतर

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[[इंग्लिश विधि]] के संस्थाओं को संघात (ऐग्रीगेट) संस्थान तथा एकक (सोल) संस्थान में वर्गीकृत किया है। संघात संस्थान सहजीवी व्यक्तियों द्वारा निर्मित संस्था है और एकक संस्थान, उत्तराधिकारी व्यक्तियों का संयोजित क्रम है। पहले प्रकार के संस्थान का एक उदाहरण जाइंट स्टाक कंपनी है और दूसरे प्रकार का पार्सन। एकक संस्थान की अपेक्षा संघात संस्थान को अधिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। एकक संस्थान का संबोध (यूरोप के) महाद्वीपीय विधि में स्थान न पा सका यद्यपि उसके द्वारा अन्य दो प्रकार के संस्थानों को मान्यता दी गई जो एंग्लो सेक्सन विधि द्वारा मान्य नहीं है।
 
भारत के व्यापारिक संस्थानों के, जिनमें सहकारी समितियों को छोड़कर बैंकिग, बीमा और वित्तीय संस्थान सम्मिलित हैं, संयोजन (इन्कारपॉरेशन), नियामन (रेगुलेशन) और समापन (वाइंडिंग अप) की शक्तियाँ संसद् में निहित हैं। इसी प्रकार अन्य संस्थानों की स्थापना भी जिनका कार्यक्षेत्र एक से अधिक राज्यों में फैला हो, संसद द्वारा ही होती है। उपर्युक्त संस्थानों के अतिरिक्त अन्य संस्थान राज्यों द्वारा भी स्थापित किए जा सकते हैं। राष्ट्रपति और राज्यपाल के अध्यादेशों द्वारा भी संस्थान स्थापित किए जा सतेसकते हैं।
 
विधिक व्यक्तित्व की प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए कई दार्शनिक सिद्धांत प्रस्तावित किए गए हैं। सेविनी और सामंड ने कल्पना (फिक्शन) सिद्धांत प्रतिपादित किया। उनका कहना था कि मानव के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं में व्यक्तित्व की उपस्थिति कल्पना मात्र है। समूह में अस्तित्व की वास्तविकता होती है किंतु दार्शनिक दृष्टि से उसमें वास्तविक व्यक्तित्व नहीं होता। इस प्रकार केवल कल्पना स्वरूप ही राज्य, संस्थान, संस्थाएँ, प्रतिमाएँ इत्यादि अधिकारभोक्ता बने।
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