"विधिक व्यक्तित्व": अवतरणों में अंतर

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रियायत (कंसेशन) सिद्धांत कल्पना सिद्धांत का ही एक भिन्न रूप है और कल्पना सिद्धांत के कई प्रतिपादर्को ने भी इसका समर्थन किया है। इसकी यह मान्यता है कि विधिक व्यक्तित्व का उदय विधि के माध्यम से ही होता है। इसलिए संस्थान को विधिक व्यक्तित्व राज्य की विधि द्वारा ही प्राप्त होता है, स्वतंत्र रूप से नहीं।
 
कोष्ठक (ब्रैकेट) सिद्धांत के अनुसार संस्थान के सदस्य अधिकार और कर्तव्य के भोक्ता है, किंतु सुविधा के लिए संस्थान के संदर्भ में ये अधिकार कर्तव्य समझे जाते हैं। इस प्रकार सभी सदस्यों के अधिकरअधिकार कर्तव्यों के संस्थान "कोष्ठक" में रख दिया जाता है। किंतु वस्तुस्थिति के ठीक बोध के लिए यह आवश्यक है कि इस कोष्ठक को हटाया जाए। हिस्सेदारों और कंपनी के सारूप्य को अस्वीकार कर यह सिद्धांत न्यायालयों को समूह का पर्दा हटाकर वास्तविक हितों को देखने की शक्ति प्रदान करता है। स्वेक फॅ मॉर्गन के सिद्धांत के अनुसार भी केवल मानव ही व्यक्तित्व रखते हैं। इस सिद्धांत का समर्थन बेकर और ब्रिज ने भी किया। यह सिद्धांत एक प्रकार से रियासत और कल्पना सिद्धांतों की स्थिति को ही प्रतिपादित करता है। इस सिद्धांत की यह मान्यता है कि व्यक्तित्व किसी समूह के सदस्यों को नहीं दिया जाता वरन् यह किसी उद्देश्य और कार्य को प्राप्त होता है।
 
यथार्थवादी अथवा आंगिक (आंर्गैनिक) सिद्धांत अन्य सब सिद्धांतों से विचारोत्तेजक है। इसे गियर्के ने प्रवर्तित किया। मेरलेंड इसका समर्थक था। यह सिद्धांत इस बात पर जोर देता है कि सामूहिक व्यक्तित्व भी उतना ही वास्तविक है जितना सामान्य प्राणियों का। सामूहिक व्यक्तित्व न तो कल्पना है और न ही यह राज्यप्रदत रियायत। यह इस बात को भी अस्वीकार करता है कि संस्थान के सदस्य अधिकारकर्तव्यों के वाहक हैं। संस्थान स्वयं में वास्तविक व्यक्ति है। इसकी उत्पत्ति वैयक्तिक अनुबंधों के आधिक्य से नहीं होती वरन् वह विधिक व्यक्तित्व की रचना के निमित्त किए गए सामूहिक एकवाही प्रयास से होती है। यह सामूहिक प्रयास वैयक्तिक इच्छाशक्तियों को संघात स्वरूप प्रदान करता है जिससे सामूहिक व्यक्ति का उदय होता है। इसमें कार्य करने की योग्यता एवं निजी इच्दाशक्ति होती है। इस सारी प्रक्रिया का विश्लेषण करते समय, लगता है गियर्कें रूसो की वैयक्तिक इच्छाशक्ति और सामान्य इच्छाशक्ति के संबंधों से प्रभावित हुआ है। गियर्कें शरीर से समूह की उपमा देते हुए यह स्वीकार करता है कि समूह भी वास्तविक मस्तिष्क, वास्तविक इच्छाशक्ति और राज्य की वास्तविक शक्ति रखता है।
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