"वशिष्ठ": अवतरणों में अंतर

626 बाइट्स जोड़े गए ,  5 माह पहले
आजकल जिस नगर को अदन कहते हैं यही नगर उन दिनों विशिष्ठों का प्रमुख नगर था, तथा उसका नाम आदित्य नगर था। संस्कृत में आदित्य सूर्य को कहते हैं और अरबी भाषा में आद सूर्य को कहते हैं। सिरियन, अरबी सूर्य के उपासक थे। वास्तव में वे वशिष्ठ के बंशधर थे।
((देवलोक))
टैग: Reverted मोबाइल संपादन मोबाइल वेब संपादन
(आजकल जिस नगर को अदन कहते हैं यही नगर उन दिनों विशिष्ठों का प्रमुख नगर था, तथा उसका नाम आदित्य नगर था। संस्कृत में आदित्य सूर्य को कहते हैं और अरबी भाषा में आद सूर्य को कहते हैं। सिरियन, अरबी सूर्य के उपासक थे। वास्तव में वे वशिष्ठ के बंशधर थे।)
टैग: Reverted मोबाइल संपादन मोबाइल वेब संपादन
वशिष्ठ ब्रम्हा के मानस पुत्र थे। त्रिकाल दर्शी तथा बहुत ज्ञान वान ऋषि थे। विश्वामित्र ने इनके 100 पुत्रों को मार दिया था, फिर भी इन्होंने विश्वामित्र को माफ कर दिया। सूर्य वंशी राजा इनकी आज्ञा के बिना कोई धार्मिक कार्य नही करते थे। त्रेता के अंत मे ये ब्रम्हा लोक चले गए थे ।
आकाश में चमकते सात तारों के समूह में पंक्ति के एक स्थान पर वशिष्ठ को स्थित माना जाता है। वशिष्ठ का विवाह [[दक्ष प्रजापति]] और [[प्रसूति]] की पुत्री उर्जा से हुआ था।
वशिष्ठ ऋषि का दुसरा नाम मैत्रावरुण भी प्रसिद्ध था। इनका जन्म देवभूमि इलावर्त में हुआ था। वशिष्ठ ने अग्नि-होत्र की स्थापना और यज्ञ की प्रतिष्ठा स्थापित किये। नारद और इन्द्र देव से नाराज होकर उन्होंने इलावर्त(देवलोक) त्याग दिया और कुछ समय के लिए शाक द्वीप चले आए। उन दिनों अरब का नाम शाक द्वीप था। वशिष्ठ के वंशज मग, मुनि, मौनी प्रसिद्ध हुए। कुश द्वीप अफ्रीका में भी मुनिवंशी लोग जाकर बस गए। शाक द्वीप अरब में ऋषि वशिष्ठ ने बडे बड़े यज्ञ किये थे। उनके यज्ञों के धुंए और सुगंध से दिशाएं व्याप्त रहती थीं। वशिष्ठों ने अपनी यज्ञ विधि से अरब के साबा आदि धर्मक्षेत्रों की यज्ञ होम की सुगन्धित वायु मिस्र देश तक पहुँचती थी। मिल्टन ने अपने काव्य में अरब की सुंगधित वायु से सागरों के महकने का उल्लेख किया है। आद में उन्होने सूर्यमंदिर की स्थापना की थी। आजकल जिस नगर को अदन कहते हैं यही नगर उन दिनों विशिष्ठों का प्रमुख नगर था, तथा उसका नाम आदित्य नगर था। संस्कृत में आदित्य सूर्य को कहते हैं और अरबी भाषा में आद सूर्य को कहते हैं। सिरियन, अरबी सूर्य के उपासक थे। वास्तव में वे वशिष्ठ के बंशधर थे। वशिष्ठ फिर भारत चले आए और सुदास के कुल गुरु और मन्त्री बने। बाद में सुदास ने भी नाराज होकर वे सूर्यवंशियों के कुल गुरु हुए। सबसे पहले वे कौशल कल्माषपाद के पुरोहित बने उसके बाद अधोध्या नरेश दशरथ जी के कुल गुरु बने। विश्वामित्र ऋषि ने वशिष्ठ ऋषि के रक्षित राज्य पर एक अक्षौहिणी सेना लेकर आक्रमण किया था, परन्तु वशिष्ठ ऋषि से वे हार गए। उन्होंने वशिष्ठ ऋषि को यह प्रलोभन दिया कि यदि आप यह राज्य मेरे हवाले कर दे तो मैं आपको सोने से सुसज्जित चौदह सौ हाथी, स्वर्ण से मढ़े हुए आठ सौ रथ, ग्यारह हजार अश्व और एक लाख गाय दूँगा, इसके अतिरिक्त प्रभूत स्वर्ण भी दूँगा। परन्तु ऋषि स्वीकार नहीं किया। इस युद्ध में पल्हवों, हिरातों, किरातों, काम्बोजों, वर्वरों और यवनों ने ऋषि वशिष्ठ की सहायता के लिए युद्ध किया था। इस युद्ध में ऋषि विश्वामित्र के सभी पुत्र परिजन मारे गए जिसमें सिर्फ एक पुत्र जीवित बचा था।
[[चित्र:Dipper.jpg|thumb|right|500px| दूसरे (दाहिने से) वशिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती को दिखाया गया है। अंग्रेज़ी में सप्तर्षि तारसमूह को ''बिग डिपर'' या ''ग्रेट बियर'' (बड़ा भालू) कहते हैं और वशिष्ठ-अरुंधती को ''अल्कोर-मिज़र'' कहते हैं।]]
 
गुमनाम सदस्य