"शिशु": अवतरणों में अंतर

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(कुंडली में किस ग्रह के बैठने से असाध्य रोग पनपते हैं -amrutam)
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क्या बच्चा गर्भ आते ही ग्रहों का असर शुरू हो जाता है।
गर्भस्थ शिशु और ग्रह के प्रभाव के बारे में किस ज्योतिषी ने विस्तार से लिखा है?
 
बच्चों को बीमारी से केसे बचाएं?
 
ग्रहों के प्रकोप से केसे बचें?..
 
गर्भस्थ शिशु पर हर माह ग्रहों की निगाह...
ग्रहों का शुभाउशुभ असर पृथ्वी के प्रत्येक
प्राणी पर पड़ता है, यह निर्विवाद सत्य है।
समस्त प्राणियों में मानव सर्वश्रेष्ठ है।
 
भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने इसी कारण
अपने गोचर में ग्रह गणना तथा अनुभव
द्वारा जातक के जन्म से मृत्यु तक अनेक रहस्यों को उजागर करने की भड़क कोशिश की गई।
 
त्रिकाल दर्शियों ने जगत के कल्याण के लिए
ज्योतिष विज्ञान द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास
किया कि ये ग्रह अपने नैसर्गिक प्रभामण्डल जनित रश्मि प्रसारण गुण-धर्म, रूप-रंग स्वभाव आदि शिशुपिण्ड पर गर्भावस्था से ही दिखाते हैं।
 
गर्भस्थ शिशु पर किस महीने किस
ग्रह का प्रभाव रहता है,...
१. प्रथम मास का स्वामी मंगल
प्रभाव - कलल (समिश्रण) शुक्र डिम्बाणु
२. द्वितीय मास का स्वामी शुक्र
कारक -पेशी (अण्डा) प्रारूप- पिण्ड!
३. तृतीय मास का स्वामी बृहस्पति
अवयव - लिंगादि रचना
४. चतुर्थ मास का स्वामी सूर्य
हड्डी, नस व जोड़ों की नस
५. पंचम मास का स्वामी चंद्रमा
चमड़ी - पृष्ठावरण रचना
६. षष्टम मास का स्वामी शनि
रूधिर, रोम, नखादि
७. सप्तम मास का स्वामी चंद्रमा
चित्त में चैतन्यता प्राण रचना
८. अष्टम मास का स्वामी लग्नेश
ओज, भूख, प्यास और स्वादगति
९. नवम मास का स्वामी चंद्रमा
बाहर निकलने की इच्छा
१०. दशम मास का स्वामी सूर्य
और दशम मास तक जातक
 
ध्यान देवें...शिशु पेट में आने से लेकर जन्म तक
बच्चे पर चंद्रमा यानि मन का प्रभाव सर्वाधिक होने से जातक जिंदगी भर मन के अधीन रहकर भटकता रहता है।
जीवन समस्त अवयवों से परिपूर्ण होकर सूर्य के स्वामित्व में गर्भ से बाहर आता है।
अतः जन्म से मरण तक जीव ग्रहों के चक्रव्यूह में रहता है। इन्हीं ग्रहों के शुभाऽशुभ प्रभाव के कारण इस जगत में नाना प्रकार के रूप-रंग, गुण-स्वभाव दिखाई पड़ते हैं।
साथ ही उत्तम स्वास्थ्य का तथा रोग का होना
ग्रहों की शुभाशुभ स्थिति पर अवलम्बित है।
आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ तीन विकारों की न्यूनाधिक रचना गति प्रमाण पर वर्णित है और इसी आधार पर ही कुशल वैद्यक (चिकित्सक) नाड़ी परीक्षण करते ही अपना निदान निश्चित करते हैं।
 
प्रवीण वैद्य आयुर्वेद के अनुसार रोग का निदान
रोगी की जिह्वा, नेत्र, त्वचा, मल-मूत्र व नाड़ी आदि अष्टविधि के आधार पर करते हैं।
 
उसी तरह कुशल ज्योतिषज्ञ सम्पूर्ण ज्योतिष
शास्त्र के अनुसार रोगी को न देखते हुए भी
केवल उसकी जन्म कुण्डली लग्न-लग्नेश भाव,
राशि, लग्न, ग्रह, युति, दृष्टि योग आदि से रोग निदान, शरीर के किस भाव पर पड़ रहा है, यह सहज विदित कर लेते हैं।
 
यथा ग्रहों का मौलिक गुणधर्म
(१) वात के कार- शनि, राहु, केतु
(२) पित्त के कारक सूर्य, मंगल
(३) कफ के कारक चंद्रमा एवं बृहस्पति
(४) वात - कफात्मक यानि कफ युक्त वात
विकार के कारक चंद्र, शुक्र
(५) त्रिक्षेषात्मक बुध -
(६) द्वंद्वज - विभिन्न ग्रहानुसार प्रतिफल निर्णय।
 
मानव प्रकृति प्रतिफल सूत्र...
वात प्रकृति...
अल्पकेश: कृशो रूक्षो वाचलाश्चलमानसः। आकाशचारी स्वप्नेषु वातप्रकृतिको नरः॥
 
पित्त प्रकति...
अकाले पलितैर्व्याप्तो धीमान्स्वेदी च रोषणः।
स्वप्नेषु ज्योतिषां द्रष्टा पित्तप्रकृतिको नरः।।
 
कफ प्रकृति...
गम्भीर बुद्धिः स्थूलांनः स्निग्धकेशो महाबलः।
स्वप्ने जलाशयालोकी श्लेष्म प्रकृतिको नरः॥
 
मिश्र प्रकृति....
ज्ञात्वा मिश्राचिरैश्च द्वित्रिदोषोल्वणा नराः।
 
रोगों की उत्पत्ति विशेषतः अशुभ ग्रहों के होने
से, कुण्डली के किस भाव में अशुभ ग्रह पड़ा है
तथा किस भाव से पीड़ा या रोग होना निश्चित है,
यह नीचे लिखे अनुसार जाना जा सकता है -
प्रथम भाव से -...
मुख, दांत, गला, जीभ, मस्तक में पीड़ा।
 
द्वितीय भाव से ...मुख व दाहिना नेत्र!
तृतीय भाव से...कान, गर्दन व हाथ।
चतुर्थ भाव से - पेट, कंधा, छाती।
पंचम भाव से...कमर के उपर का भाग व - जांघ।
षष्ठ भाव से-... दाहिना पांव व गुह्य भाग।
सप्तम भाव से- ...नाभि स्थल व पेट का मध्य भाग। अष्टम भाव से ..बायां पांव व गुह्य भाग व पुट्ठे।
नवम भाव से ...कमर के बीच का भाग
दशम भाव से... पेट व कंधा
एकादश भाव से ...- बांया हाथ, कान और गर्दन। द्वादश भाव से... बांयीं आंख व पैर का तलुवा!
 
उपर लिखे हुए द्वादश भाव में से किसी भी भाव
में यदि पाप ग्रह स्थित हो या उन ग्रहों की युति, प्रतियुति, दृष्टि आदि का अवलोकन कर शरीर के उसी भाग में पीड़ा व रोग का होना निश्चित किया जाता है।
 
जन्मकुंडली के अनुसार रोगों की जानकारी...
जन्मस्थ ग्रहों के बलाबल व कुण्डली में उनकी
स्थिति के अनुसार अल्पकाल और दीर्घकाल के
रोगों का पता लगाया जाता है।
 
ग्रह गोचर के अनुसार भी व्यक्ति न्यूनाधिक
रोगी होता है यह ग्रहों की गोचर स्थिति के अनुसार पता चलता है कि कौन सा ग्रह किस भाव में कितने समय के आगमन तथा उसके शुभाऽशुभ प्रभाव से ग्रसित हैं। यथा
सूर्य - एक मास।
चन्द्रमा सवा दो दिन।
मंगल डेढ मास।
बुध एक मास।
बृहस्पति तेरह मास।
शुक्र अट्ठाईस दिन।
शनि - ढाई वर्ष एवं
राहु-केतु का गतिक्रम डेढ वर्ष लगभग
नैसर्गिक गति नियामक से बन पाता है।
परन्तु किस ग्रह से कौन सा रोग उत्पन्न होता
है और उसका परिणाम शरीर पर कितना बुरा होगा, यह जानना आवश्यक है -
(१) सूर्य हृदय का भाग, मस्तक का मुख के पास पीड़ा, रक्तस्त्राव, नेत्र पीड़ा, दृष्टि दोष, हृदय रोग,
मूर्छा, बुखार, पित्त, पीठ व पैरों में दर्द आदि।
(२) चन्द्रमा - पेट में विकार, छाती में तकलीफ, जलोदर, सर्दी का बुखार, स्त्री प्रदर रोग, आर्तव दोष, अपस्मार, मृगी, सहन शक्ति आदि।
(३) बुध - मस्तिष्क विकार, गला व गर्दन में पीड़ा, गण्डमाला, मज्जातन्तु की दुर्व्यवस्था, वाणी दोष, मानसिक व्यथा, सिरदर्द, गुह्य रोग, नपुंसकता आदि। (४) बृहस्पति- लीवर की बीमारी, रक्त संचय, दन्तरोग, घाव, कफ, नजला, जुकाम, खांसी, गुल्म रोग आदि। (५) शुक्र वीर्यदोष, गर्मी, बादी, मूत्र विषय रोग, मधुमेह एवं रतिजन्य अन्य रोग।
(६) मंगल - रक्तनाश, फोड़े, फुंसी, मुहांसे, खुजली, नाक का रोग, गुहा रोग, चीरफाड़, रक्तदोष, पित्त, अंड वृद्धि, व्रणरोग, अग्निपीड़ा आदि।
(७) शनि- संधिवात (जोड़ों का दर्द, गठिया), अर्धांग वायु, वायु विकार, क्षयरोग (टी.बी.), खांसी, दमा, दाढ का दर्द, अपचन, वात विकार, नपुंसकता, दीर्घकालीन रोग आदि।
(८) राहु देवी प्रकोप, अपस्मार, ॐ प्रेत-पिशाच पीड़ा, अरूचि, दुष्ट विचार, शराब आदि नशा करना व आत्महत्या की प्रवृत्ति।
(९) केतु - शत्रु का कपट, अपने से निम्न व्यक्तियों द्वारा पीड़ा, नि:संतान रहना तथा शारीरिक विकास में न्यूनता कमजोरी मानसिक विभ्रमता।
 
असाध्य रोग जैसे -मधुमेह, वातरोग, उच्च या रक्तचाप, कर्कट रोग यानि केंसर आदि विकारों के कारक शनि, राहु केतु हैं। इनकी शांति के लिए amrutam Rahukey oil के दीपक शनिवार को अपनी उम्र के मुताबिक सूर्यास्त के बाद 7 शनिवार तक जलाने से असाध्य रोग नष्ट हो जाते हैं।
 
मानसिक विकार एवम डिप्रेशन के कारक केतु ग्रह हैं। ये शंखपुष्पी, जटामांसी, ब्राह्मी, हरित्कि, मालकांगनी, स्मृतिसागर रस आदि के सेवन से दूर होते हैं।
केतु की शांति के लिए amrutam
Brainkey Gold Malt का तीन महीने एस3वीएन करना हितकारी रहता है।
 
अध्यात्मिक इलाज...
शरीर में जिस धातु विकार का अधिपति जो ग्रह
हो उसका जप, होम, दान आदि करने से मनुष्य
रोग, शोक व भय से मुक्त होकर यश, बल व सुख
को प्राप्त होता है।
 
कहा जाता है कि मंत्र, तीर्थ, सदगुरु, कुलदेवता, ज्योतिषी, औषधि तथा संत में। जिसकी जैसी
भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि मिलती है।
 
यथाशास्त्रीयसूत्रम् -
मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे भेषजे च तथा गुरौ!
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी॥
 
अमृतम के संस्थापक और अमृतम पत्रिका के
प्रधान संपादक का यह वीडियो आपकी उन्नति में सहायक होगा।
[[File:A grand mother with a baby.jpg|thumb|एक शिशु अपनी दादी के साथ]]
[[File:New Born Male Baby.jpg|thumb|30 मिनट पहले जन्मा एक भारतीय नवजात शिशु]]