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*इसी प्रकार एक दिन गुरु द्रोण ने अर्जुन की सतर्कता और योग्यता की परीक्षा लेने के लिये एक आभासी मगरमच्छ का निर्माण किया की वह उनपर हमला कर रहा है। सभी शिष्य घबरा गये पर अर्जुन ने अपने धनुर कौशल से उस आभासी मगरमच्छ का वध कर दिया, और तब गुरु द्रोण ने प्रसन्न होकर अर्जुन को [[ब्रह्मास्त्र]] का ज्ञान दिया।
 
===एकलव्य की कहानी===
[[चित्र:एकलव्य.jpeg|thumb|right|250px|गुरु द्रोण को गुरुदक्षिणा में अपना अंगुठा भेंट करता एकलव्य।]]
एक बार निषाद कुमार एकलव्य गुरु द्रोण के पास आया और उनसे उसे अपना शिष्य बनाने का आग्रह किया। किंतु द्रोण ने ये कहकर उसे अपना शिष्य नहीं बनाया की वह क्षत्रिय भी नहीं है और राजपुत्र भी, पर उसे ये वरदान दिया की वो यदि उनका स्मरण करके अस्त्र विद्या सीखेगा तो उसे अपने आप ज्ञान आता जायेगा। एकलव्य गुरु द्रोण की मिट्टी की मुर्ति बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा और इस प्रकार एकलव्य बहुत बडा़ धनुर्धर बन गया। एक दिन जब एकलव्य अभ्यास कर रहा था तो एक कूकर (कुत्ता) भौकने लग जिससे उसका ध्यान भंग हो रहा था। इसपर उसने बडी़ कुशलता से बाणों द्वारा बिना हानि पहुँचाए कूकर का मुख बंद कर दिया। जब वह कूकर वहाँ से भाग रहा था तो द्रोण और उनके शिष्यों ने उसे देखा और सोच मे पड़ गये की कौन इतनी कुशलता से कूकर का मुख बंद कर सकता है। तब वे खोजते हुए एकलव्य के पास पहुँचे। वह वहाँ गुरु द्रोण कि मुर्ति के आगे अभ्यास कर रहा था। त द्रोण द्वारा अपने सबसे प्रिय शिष्य अर्जुन का स्थान छिनता देखकर उन्होंने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में उसके दाएँ हाथ का अंगूठा माँग लिया और एकलव्य ने हर्षपुर्वक अपना अंगूठा काट कर अपने गुरु को भेंट कर दिया।
 
==स्रोत==
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