"शून्यता": अवतरणों में अंतर

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==नागार्जुन का शुन्यवाद==
[[नागार्जुन (प्राचीन दार्शनिक)|नागार्जुन]] की दृष्टि में मूल तत्व शून्य के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। ध्यान देने की बात यह है कि यह शून्य कोई निषेधात्मक वस्तु नहीं है जिसका अपलाप किया जा सके। किसी भी पदार्थ का स्वरूपनिर्णय करने में चार ही कोटियों का प्रयोग संभाव्य है - '''अस्ति''' (विद्यमान है), '''नास्ति''' (विद्यमान नहीं है), '''तदुभयम्''' (एक साथ ही अस्ति नास्ति दोनों) तथा '''नोभयम्''' (अस्ति नास्ति दोनों कल्पनाओं का निषेध)। परमार्थ इन चारों कोटियों से मुक्त होता है और इसीलिए उसके अभिधान के लिए "शून्य" शब्द का प्रयोग हम करते हैं। नागार्जुन के शब्दों में
*'''अस्ति''' (विद्यमान है),
*'''नास्ति''' (विद्यमान नहीं है),
*'''तदुभयम्''' (एक साथ ही अस्ति नास्ति दोनों) तथा
*'''नोभयम्''' (अस्ति नास्ति दोनों कल्पनाओं का निषेध)।
 
परमार्थ इन चारों कोटियों से मुक्त होता है और इसीलिए उसके अभिधान के लिए "शून्य" शब्द का प्रयोग हम करते हैं। नागार्जुन के शब्दों में
 
न सन् नासन् न सदसत् न चाप्यनुभयात्मकम्।