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अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास।
रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 2
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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अलग नगर के कोलाहल से, अलग पुरी-पुरजन से,
गूँज रही थी मात्र कर्ण की धन्वा की टंकार।
 
रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 3
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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फिरा कर्ण, त्यों 'साधु-साधु' कह उठे सकल नर-नारी,
अधम जातियों से थर-थर काँपते तुम्हारे प्राण,
 
छल से माँग लिया करते हो अंगूठे का दान।
 
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