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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 1
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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शीतल, विरल एक कानून शोभित अधित्यका के ऊपर,
लौह-दण्ड पर जड़ित पड़ा हो, मानो, अर्ध अंशुमाली।
 
रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 2
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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श्रद्धा बढ़ती अजिन-दर्भ पर, परशु देख मन डरता है,
 
पड़ती मुनि की थकी देह पर और थकान मिटाती है।
 
रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 3
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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कर्ण मुग्ध हो भक्ति-भाव में मग्न हुआ-सा जाता है,
क्या विचित्र रचना समाज की? गिरा ज्ञान ब्राह्मण-घर में,
 
मोती बरसा वैश्य-वेश्म में, पड़ा खड्‌ग क्षत्रिय-कर में।
 
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