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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 7
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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'हाय, कर्ण, तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ?
बिना उठाये पाँव शत्रु को कर्ण नहीं पा सकता था।
 
रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 8
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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किन्तु, पाँव के हिलते ही गुरुवर की नींद उचट जाती,
ब्राह्मण है या और किसी अभिजन का पुत्र बली है तू?
 
रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 9
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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'सहनशीलता को अपनाकर ब्राह्मण कभी न जीता है,
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