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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 10
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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'छल से पाना मान जगत् में किल्विष है, मल ही तो है,
पर तुझ-सा जिज्ञासु आज तक कभी नहीं मैंने पाया।
 
रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 11
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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'तू ने जीत लिया था मुझको निज पवित्रता के बल से,
है यह मेरा शाप, समय पर उसे भूल तू जायेगा।
 
रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 12
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कवि: रामधारी सिंह "दिनकर"
 
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कर्ण विकल हो खड़ा हुआ कह, 'हाय! किया यह क्या गुरुवर?
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