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(नया पृष्ठ: '''अकलंक''' ( 720 - 780 ई) , जैन न्यायशास्त्र के अनेक मौलिक ग्रंथ...)
 
 
इन सभी ग्रंथों में जैन संमत अनेकांतवाद के आधार पर [[प्रमाण]] और [[प्रमेय]] की विवेचना की गई है और जैनों के अनेकांतवाद को सदृढ़ भूमि पर सुस्थित किया गया है।
 
==बाहरी कड़ियाँ==
*[http://books.google.co.in/books?id=1KYxaYLo7GMC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=false तत्वार्तवार्तिक (या राजवार्तिक)] (गूगल पुस्तक ; मूल रचयिता - भट्ट अकलंक ; व्याख्याता - महेन्द्र जैन)
 
[[श्रेणी:भारतीय दर्शन]]