"कृष्णप्रसाद भट्टराई" के अवतरणों में अंतर

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[[File:Krishna p Bhattarai.jpg|thumb|right|200px|<b>२०६६सन वर्षमे२०१० मे अस्पतालसे घर लौटते क्रममे कृष्णप्रसाद भट्टराई</b>]]
[[File:Krishna Bhattari.jpg|thumb|right|200px|कृष्णप्रसाद भट्टराईका मृत शरीर ]]
'''कृष्ण प्रसाद भट्टराई''' नेपालका बरिष्ठ प्रजातन्त्रवादी नेता थे। ये [[नेपालके संसद | नेपालके पहले संसद]]के पहले [[सभामुख]] तथा [[बहुदलीय व्यवस्थाको पुनर्स्थापना]] पश्चातके पहले प्रधानमन्त्री थे। वि.सं. २००३ मे [[नेपाली कांग्रेस]] गठन गर्दा देखि नै राजनीतिमा संलग्न हुए भट्टराई २००७ सालको सशस्त्र क्रान्तिमा जनकपुर―उदयपुर कब्जा गर्ने मुक्ति सेनाको कमाण्डरके रूपमे काम किये थे। ये वि.सं. २०१५ सालमे [[संसद]]के छोटे सदनके प्रतिनिधि सभाके सभामुख हुए थे।
 
कृष्णप्रसाद भट्टराईका जन्म पिता संकटाप्रसाद और माता ललितादेवीके छोटे लडकेके रूपमे वि.सं. १९८१ पौष कृष्ण द्वादशीके दिन भारत मे बनारसमे हुवा था।
भट्टराई वि.सं. २०४६ के जनआन्दोलन के बाद गठित अन्तरिम मन्त्रीपरिषदमा पहलि बार प्रधानमन्त्री बने थे। [[नेपाल अधिराज्यका संविधान २०४७]] (१९२४-२०११) निर्माण कर लागू करवाने और बहुदलीय प्रतिस्पर्धाके आधारमे संसदीय चुनाव करानेके महत्त्वपूर्ण दायित्त्व ये सफलता पूर्वक बहन कर रहे थे। पर जब वे प्रधानमन्त्री थे और यिनके नेत्रित्व मे २०४८ के आम निर्वाचनमे ये खुद काठमाण्डौंसे पराजित हुये थे। उसके वाद जब ये [[आम निर्वाचन, २०५६|२०५६ के आम निर्वाचन]]मे विजयी हुये तब ये पुनः प्रधानमन्त्री बने थे। <ref>Keshab Poudel: Symbol of Simplicity. Spotlight: Kathmandu, Nepal</ref>
गोर्खा दरबारमे पुरोहित यज्ञेश्वर भट्टराईके बेटे पति भट्टराई [[पृथ्वीनारायण शाह]]के साथ काठमाडौं आकर दरबारमे हि पुरोहित बनके बैठे रहे। यिनके सन्तति परम्परामे क्रमशः विष्णुहरि, कृष्णलाल, मेदिनीधर, कमलकान्त, विश्वनाथ होते हुये पिछले पुस्तेमे संकटाप्रसाद हुये। संकटाप्रसादके चार भाइ लडके― बटुकप्रसाद, नारायणप्रसाद, गोपालप्रसाद और कृष्णप्रसाद थे। ये चार मध्येके छोटे बेटे कृष्णप्रसाद भट्टराई थे।
 
भट्टराई वि.सं. २०४६ के जनआन्दोलन के बाद गठित अन्तरिम मन्त्रीपरिषदमा पहलि बार प्रधानमन्त्री बने थे। [[नेपाल अधिराज्यका संविधान २०४७]] (१९२४-२०११) निर्माण कर लागू करवाने और बहुदलीय प्रतिस्पर्धाके आधारमे संसदीय चुनाव करानेके महत्त्वपूर्ण दायित्त्व ये सफलता पूर्वक बहन कर रहे थे। पर जब वे प्रधानमन्त्री थे और यिनके नेत्रित्व मे २०४८ के आम निर्वाचनमे ये खुद काठमाण्डौंसे पराजित हुये थे। उसके वाद जब ये [[आम निर्वाचन, २०५६|२०५६ के आम निर्वाचन]]मे विजयी हुये तब ये पुनः प्रधानमन्त्री बने थे। <ref>Keshab Poudel: Symbol of Simplicity. Spotlight: Kathmandu, Nepal</ref>
आजीवन अविवाहित रहे ओर सन्त प्रवृत्तिके होने के कारणसे कुछ लोग यिनको '''सन्त नेता''' कहकर भि सम्वोधन करते हैं। राजनीतिक बृत्तमे तो यिनको बुलानेका नाम किशुनजी है।
 
भट्टराईको गान्धीवादी सन्त नेता माना जाता था और ये दृढ अठोट और संकल्पके धनी व्यक्तित्व माना जाता था। ये स्पष्टवक्ता और सिद्धान्तनिष्ठ नेताके रूपमे भी जाना जाता है। हरदम मुस्कुराते रहने वाले भट्टराईका सेन्स अफ ह्युमर उच्च रहता था। गम्भीर समस्याओको हल्के रूपमे लेकर पचानेके क्षमता यिनमे रहता था। पदमे बैठते समय व्यक्तिगत लाभमे नापडनेके कारण यिनको स्वच्छ छवि वाले नेताके रूपमे लिया जाता है।
 
==युवावस्था==
कृष्णप्रसाद भट्टराईका जन्म पिता संकटाप्रसाद और माता ललितादेवीके छोटे लडकेके रूपमे वि.सं. १९८१ पौष कृष्ण द्वादशीके दिन भारत मे बनारसमे हुवा था।
 
गोर्खा दरबारमे पुरोहित यज्ञेश्वर भट्टराईके बेटे पति भट्टराई [[पृथ्वीनारायण शाह]]के साथ काठमाडौं आकर दरबारमे हि पुरोहित बनके बैठे रहे। यिनके सन्तति परम्परामे क्रमशः विष्णुहरि, कृष्णलाल, मेदिनीधर, कमलकान्त, विश्वनाथ होते हुये पिछले पुस्तेमे संकटाप्रसाद हुये। संकटाप्रसादके चार भाइ लडके― बटुकप्रसाद, नारायणप्रसाद, गोपालप्रसाद और कृष्णप्रसाद थे। ये चार मध्येके छोटे बेटे कृष्णप्रसाद भट्टराई थे।
 
==राजनीतिक जीवन==
 
राणा प्रधानमन्त्री वीर समशेरके वक्रदृष्टिमे पडे हुये पं. विश्वनाथ भट्टराई सपरिवार बनारस निर्वासनमे जानेके बाद ये वहिंसे बिहारके रामनगर राज्यके राजाके पुरोहित बन्ने पहुँचे। उनके बेटे संकटाप्रसाद भि तिनौ रामनगर रामराजाके पुरोहित थे। यिनके चारौ भाइ बेटे तो बनारसमे बैठके अध्ययन करते थे। वहींसे ये चारौ जन भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलनमे सक्रिय हुये थे। बडे भैयाओके प्रभावसे छोटे कृष्णप्रसाद राजनीतिमे और आगे पहुँचे।
राजतन्त्रबारे मे तो उनका अलग मत रहता था। जनआन्दोलनके बाद भि ये तत्कालमे राजा हटानेके पक्षमे नहीं थे। यद्यपि गणतन्त्रके स्थापना पश्चात् ये इस विषयमे मौन हि रहे।
 
==व्यक्तिगत जीवन==
आजीवन अविवाहित रहे ओर सन्त प्रवृत्तिके होने के कारणसे कुछ लोग यिनको '''सन्त नेता''' कहकर भि सम्वोधन करते हैं। राजनीतिक बृत्तमे तो यिनको बुलानेका नाम किशुनजी है।
 
 
==मृत्यु==
 
हालहिमे यिनका 'मेरो म' नामका आत्मबृत्तान्त पुस्तकाकारमे प्रकाशित हुवा है । <ref>मेरो म: कृष्णप्रसाद भट्टराई</ref>२०६७ फागुन २० गते शुक्रबार रात ११ बजे और २६ मिनटमे काठमाडौंके नर्भिक अस्पतालमे कृष्णप्रसाद भट्टराईका मृत्यु हुवा ।
==सन्दर्भ सामग्री==
<References/>
 
{{नेपालके प्रधानमन्त्री}}
 
 
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