पुराण-कथा-शास्त्र वह सरलतम माध्यम माना जा सकता है जिसके द्वारा प्रारंभिक मानव ने अपने धार्मिक विचारों को प्रकट किया। वैदिक धर्म को प्रकृतिपरक कहा गया है, क्योंकि, दूसरे शब्दों में, इस धर्म में मुख्य रूप से प्राकृतिक शक्तियों एवं घटनाओं की पूजा की जाती थी, हालाँकि यह पूर्णत: सही नहीं है। वैदिक धर्म एवं परिणामत: वैदिक पुराण-कथा शास्त्र एक विकास की परंपरा में है और उनका अध्ययन वैदिक लोगों के सांस्कृतिक इतिहासानुक्रम से संबंधित करके ही किया जा सकता है। अपने सांस्कृतिक इतिहासानुक्रम से संबंधित करके ही किया जा सकता है। अपने सांस्कृतिक जीवन के प्रारंभिक काल में वैदिक आर्य, या उनके पूर्वज, प्रकृति के अंग के रूप में उसके अधिकाधिक समीप थे। इस काल में वे प्रकृति की विशालता एवं समृद्धि तथा चमत्कार से पूर्णत: अभिभूत थे। अपनी इस सरल भावुकता में उन्होंने धार्मिक भावना का पुट देना चाहा जिसे फलस्वरूप दैवीय माता पिता के पौराणिक रूप "द्यावापृथिवी" की भावना आई। उन लोगों ने यह भी अनुभव किया कि प्रकृति यद्यपि विशाल है, तथापि अनियोजित एवं अनियमित नहीं। इसका नियंत्रण कुछ निश्चित विधानों से होता है। यह विशृंखल नहीं बल्कि व्यवस्थित है। इस ज्ञान से ऋत (ब्रह्माड संबंधी नियमों) एव वरुण (ब्रह्मांड संबंधी नियमों के नियम) के पौराणिक रूपों का उद्भवन हुआ। वरुण असुर थे अर्थात् उनके पास असु नामक चमत्कारिक शक्ति थी और अपनी माया से उसने इस संसार को बाँध रखा था एवं इसके छोटे बड़े विभिन्न प्रकार के कार्यों के नियामक थे। उन्होने इस प्रकार सम्राट पद प्राप्त किया। दैवीय आचारशास्त्र (और विस्तृत रूप में मानवीय नैतिकता) की इस पौराणिक जटिलता में मित्र, अदिति एवं आदित्य भी थे। इस दैवीय पुराणकथा के साथ ही साथ अग्नि के देवत्व का भी विलास हुआ जो वैदिक धार्मिक कार्यों का एकमात्र आधार थी। साथ ही साथ यज्ञीय पेय सोम के देवत्व का भी विकास हुआ। अग्नि जो वैयक्त देवों में सर्वाधिक दृष्टिगम्य थी, आर्यों के गृहस्थ जीवन का केंद्र एवं मनुष्यों और देवताओं के बीच संबध स्थापित करनेवाली भी मानी गई।

सामान्य सिद्धांत के रूप में यह स्वीकृत किया जा सकता है कि किन्हीं विशेश लोगों के धर्म एवं पुराण-कथा-शास्त्र की प्रकृति इस बात पर निर्भर करती है कि वे किस प्रकार का जीवन व्यतीत करते हैं। वरुण का सार्वभौम धर्म एवं अग्नि और सोम का यज्ञीय धर्म आर्यों के पूर्वजों की आवश्यकता की पूर्ति कर देता था जब वे अपना जीवन प्रकृति के साथ बिताते थे एवं प्रारंभिक प्रकार के यज्ञीय का पालन करते थे। किंतु वल्ख (जहाँ वे काफी दिनों तक रहे) से आगे सप्तसिंधु में आने पर इन लोगों को अनेक प्रतिद्वंद्वी जातियों से (जो बाद में सामूहिक रूप से ऋग्वेद में बृत्र या दास कही गई हैं) भिड़ना पड़ा। अत: उनकी धार्मिक प्रवृत्ति ने एक नए देवता को जन्म दिया जो उनके युद्ध संबंधी साहस को बढ़ावा दे सके। उसका नाम युद्धदेवता इंद्र था। वैदिक पुराणा-कथा-शास्त्र की विकसनशील प्रवृत्ति इंद्र के व्यक्तित्व के विकास में स्पष्ट दिखाई देती है। मूलत: इंद्र एक मानवनायक था जो सोम से उत्तेजित होकर वैदिक आर्यों का नेतृत्व करते हुए सप्तसिंधु पहुँचा। इतिहास क्रमश: पुराण-कथा-शास्त्र में परिवर्तित हो गया और मानवनायक एक राष्ट्रीय युद्धदेवता बन गया। इस प्रकार के पौराणिकीकरण में बाद में इंद्र पर अन्य कई विशेषताओं का आरोपण किया गया। इंद्र वर्षा का देवता माना जाता था जिसने अपने बज्र से मेघासुर वृत्र को मारकर स्वर्ग के जल को मुक्त किया। प्राचीन कथाओं के अहिसंहारक वीर से भी उसका तादात्म्य किया गया। चूँकि, ऋग्वेद का एक वृहद् अंश विजय एवं उपनिवेश बनाने की समय से सबंधित है, यह स्वाभाविक ही था कि वैदिक पुराण-कथाशास्त्र इंद्र की कथाओं से अभिभूत हो। मरुतों, अश्विनों एवं ऋतुओं के पौराणिक रूपों में अनुमानत: ऐतिहासिक घटनाओं के पौराणिकीकरण ही कारण हैं। वैदिक पुराण-कथा-शस्त्र के विकास में एक महत्वपूर्ण बात "सौरीकरण" की है, अर्थात् सौर देवताओं के संबंधित पौराणिक व्यक्ति जो मूलत: सौर देवता से बिल्कुल ही संबंधित नहीं थे। वैदिक पुराण-कथा-शास्त्र का प्रमुख सौर देवता सूर्य था। किंतु कई कारणों से सौर गुण का समावेश दूसरे देवताओं में भी किया गया, जैसे विष्णु (जो मूलत: उर्वरता का देवता था), पूषन (जो पशुपालन का देवता था) और मित्र एवं सवित् (दोनों ही वरुण से संबंधित थे)। इस संबंध में इस बात का संकेत किया जा सकता है कि पौरोहित्यपूर्ण धर्म में विष्णु एवं पूषन जैसे देवताओं को ऊँचा स्थान दने का एक साधन था उनको जान बूझकर, यद्यपि बनावटी रूप से, इंद्र या अग्नि अथवा सोम से सबंधित करना। इस संदर्भ में यह उल्लेख है कि उषा प्रकृति देवी के रूप में सूर्य जैसी है, बिल्कुल पारदर्शक, यद्यपि वैदिक कवियों ने उसके मानवीय सौंदर्य के विशद वर्णन किए हैं।

भारत में प्राक् वैदिक अनार्यों के धर्म के प्रभावस्वरूप वैदिक आर्य धर्म में रुद्र के पौराणिक रूप का उद्भवन हुआ। इस देवता को मूल भारतीय शिव का आर्यीकृत रूप माना जा सकता है। किंतु जब शिव को वैदिक धर्म में रुद्र के रूप में अपना लिया गया तो उसके पूरे व्यक्तित्व के केवल एक भाग, मृत्यु एव संहार के देवता के रूप को ही महत्व दिया गया। दूसरी ओर यम मानव जाति का जनक था (प्रजापति को परवर्ती वैदिक पुराण-कथा-शास्त्र में महत्व प्राप्त हुआ) और मनव जाति के संरक्षण के लिए स्वमेव द्वारा यम मृत्यु के लिए पहला व्यक्ति भी हुआ। तदनंतर वह मानव जाति की उन सभी पीढ़ियों अर्थात् पितरों का स्वामी हुआ जो उसके बाद मृत्यु को प्राप्त हुई। प्रसंगवश इस बात का भी संकेत किया जा सकता है कि यम के साम्राज्य के वर्णनों में स्वर्ग का वर्णन भी प्राप्त होता है, किंतु प्रारंभि वैदिक पुराण-कथा-शास्त्र में नरक का ज्ञान था, ऐसा नहीं जान पड़ता। इसी प्रकार प्रारंभिक वैदिक पुराण-कथा-शास्त्र में गंधर्व एवं अप्सराएँ उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, हालाँकि ऋग्वेद के एक मंत्र में उर्वशी (दैवीय अप्सरा) और पुरुरवा (मानव राजा) की पौराणिक कथा का जिक्र है। लघु देवताओं में सूत्रों के स्वामी "ब्रह्मणस्पति" का विशेष महत्व है। इस संबंध में मनु, भृगु एवं अंगिरस जैसे पौराणिक ऋषियों का उल्लेख किया जा सकता है। वैदिक पुराण-कथा-शास्त्र मैं भूत-प्रेत-पूजा का शायद ही कोई संकेत हो किंतु दैवीय एवं अर्धदैवीय गुण कुछ पशुओं एव जड़ पदार्थों में आरोपित किए गए हैं।

वैदिक पुराण-कथा-शास्त्र के विषय में बताते हुए ब्राह्मणों में उल्लिखित अनेक पौराणिक कथाओं का उल्लेख भी किया जाना चाहिए, जैसे मनु एवं प्रलय, शुन शेप और वरुण, यद्यपि इनमें कई बातें किन्हीं दूसरी बातों के गैरवबर्धन या यज्ञ से संबंधित हैं। ब्राह्मणों में दो अत्यधिक प्रचलित पौराणिक अभिप्राय प्रजापति के तपस एवं देवासुरसंग्राम के हैं। उपनिषदों के अनेक दार्शनिक उपदेश भी इंद्र, विरोचन एवं उमा हैमवती की पौराणिक कथाओं के माध्यम से बताए गए हैं।