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हिंदुओं की जाति व्यवस्था के अंतर्गत वैश्य वर्णाश्रम का तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस वर्ग में मुख्य रूप से भारतीय समाज का बनिया समुदाय शामिल है।

अर्थ की दृष्टि से इस शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है जिसका मूल अर्थ "बसना" होता है। मनु के मनुस्मृति के अनुसार वैश्यों की उत्पत्ति ब्रम्हा के उदर यानि पेट से हुई है।यह प्रतीकात्मक लाक्षणिकता मे दार्शनिक अभिगृहीत सिद्धांतों की भावाभिव्यक्ति है। कर्म सिद्धांत वर्गीकरण मे पोषण के कार्यों से जुड़े गतिविधियों के व्युत्पत्ति को पेट से उत्पन्न होना कला के रूप प्रतीक का समावेशन ऐसा सरलीकरण है जिसका बोध सभी को आसानी से हो जाता है। वर्ण का वर्गीकरण कर्म का वर्गीकरण है,न कि मनुष्य का वर्गीकरण।वसुधैव कुटुम्बकम् मे परिवार के दूसरी तीसरी अथवा किसी भी ईकाई को मनुष्य की लक्ष्य तक के उद्विकास से वंचित करने की धारणा हिन्दुत्व मे वर्जित है।विश से सामान्य जन समुदाय,और इसी से वैश्य।

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