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व्यंजना शब्द शक्ति – जब किसी शब्द के अभिप्रेत अर्थ का बोध न तो मुख्यार्थ से होता है और न ही लक्ष्यार्थ से , अपितु कथन के संदर्भ के अनुसार अलग – अलग अर्थ से या व्यंग्यार्थ से प्रकट होता हो वहाँ वह शब्द व्यंजक कहलाता है , उसके द्वारा प्रकट होने वाला अर्थ व्यंग्यार्थ या ध्वन्यार्थ कहलाता है तथा उस शब्द की शक्ति को व्यंजना शब्द शक्ति कहते हैं | जैसे – सूरज डूब गया | इस वाक्य का वाच्यार्थ या मुख्यार्थ एक ही रहने पर भी अलग – अलग भावार्थ लगा लिए जाने के कारण यहाँ व्यंजना शब्द शक्ति मानी जाती है | इस शब्द शक्ति को ध्वन्यार्थ इसलिए कहा जाता है कि इसमें अर्थ ध्वनित होता है | जैसे घंटे पर चोट लगने पर जोर जोर की टंकार होती है , उसके बाद उसमें से मंद – मंद झंकार निकलती है जो देर तक गूँजती रहती है | उसी प्रकार इस शब्द शक्ति में भी शब्द से पहले मुख्यार्थ का बोध होता है उसके बाद वक्ता , श्रोता और संदर्भ भेद से अन्य अनेक अर्थ ध्वनित होते हैं | जैसे – पुजारी ने कहा, “अरे ! संध्या हो गई |” व्यंजना, शब्दशक्ति का एक प्रकार है।

प्रकारसंपादित करें

व्यंजना के दो भेद हैं- शाब्दी व्यंजना और आर्थी व्यंजना।1 शाब्दी व्यंजना – जहाँ शब्द विशेष के कारण व्यंग्यार्थ का बोध होता है और वह शब्द हटा देने पर व्यंग्यार्थ समाप्त हो जाता है , वहाँ शाब्दी व्यंजना होती है | जैसे – चिरजीवौ जोरी जुरै , क्यों न सनेह गंभीर | को घटि ए वृषभानुजा , वे हलधर के वीर || यहाँ वृषभानुजा , हलधर के वीर शब्दों के कारण व्यंजना सौन्दर्य है | इनके दो – दो अर्थ हैं – राधा , गाय तथा श्रीकृष्ण , बैल | यदि वृषभानुजा , हलधर के वीर शब्दों को हटाकर उनके स्थान पर अन्य पर्यायवाची शब्द रख दिया जाए तो व्यंजना समाप्त हो जाएगी | शाब्दी व्यंजना के भेद - 1 अभिधामूला शाब्दी व्यंजना – जहाँ एक ही शब्द के अनेक अर्थ होते हैं , वहाँ किस अर्थ विशेष को ग्रहण किया जाए , इसका निर्णय अभिधामूला शाब्दी व्यंजना करती है | अभिधामूला शाब्दी व्यंजना में शब्द का पर्याय रख देने से व्यंजना का लोप हो जाता है तथा व्यंग्यार्थ का बोध मुख्यार्थ के माध्यम से होता है | जैसे – सोहत नाग न मद बिना , तान बिना नहीं राग | यहाँ नाग और राग दोनों शब्द अनेकार्थी हैं परन्तु ‘वियोग’ कारण से इनका अर्थ नियंत्रित कर दिया गया है | इसलिए यहाँ पर ‘नाग’ का अर्थ हाथी और ‘राग’ का अर्थ रागिनी | अब यदि यहाँ नाग का पर्यायवाची भुजंग रख दिया जाए तो यह व्यंग्यार्थी हो जाएगा | 2. लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना – जहाँ किसी शब्द के लाक्षणिक अर्थ से उसके व्यंग्यार्थ पर पहुँचा जाए और शब्द का पर्याय रख देने से व्यंजना का लोप हो जाए , वहाँ लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना होती है | जैसे - आप तो निरे वैशाखनंदन हैं | 2 आर्थी व्यंजना – जब व्यंजना किसी शब्द विशेष पर आधारित न होकर अर्थ पर आधारित होती है , तो वहाँ आर्थी व्यंजना मानी जाती है | जैसे - अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी | आँचल में है दूध और आँखों में पानी || यहाँ नीचे वाली पंक्ति से नारी के दो गुणों की व्यंजना होती है – उनका ममत्व भाव एवं कष्ट सहने की क्षमता | यहाँ व्यंग्यार्थ शब्द से नहीं अपितु अर्थ से है |

शाब्दी व्यंजनासंपादित करें

शाब्दी व्यंजना के दो भेद होते हैं- एक अभिधामूला और दूसरी लक्षणामूला।

अभिधामूला शाब्दी व्यंजनासंपादित करें

संयोग आदि के द्वारा अनेकार्थ शब्द के प्रकृष्णतोपयोगी एकार्थ के नियंत्रित हो जाने पर जिस शक्ति द्वारा अन्यार्थ का ज्ञान होता है वह शाब्दी व्यंजना है।

मुखर मनोहर श्याम रंग बरसत मुद अनुरूप।
झूमत मतवारो झमकि बनमाली रसरूप ॥

यहाँ 'वनमाली' शब्द मेघ और श्रीकृष्ण दोनों का बोधक है। इसमें एक अर्थ के साथ दूसरे अर्थ का भी बोध हो जाता है। ध्यान दें कि यहाँ श्लेष नहीं। क्योंकि रूढ़ वाच्यार्थ ही इसमें प्रधान है। अन्य अर्थ का आभास-मात्र है। श्लेष में शब्द के दोनों अर्थ अभीष्ट होते है- समान रूप से उस पर कवि का ध्यान रहता है। अनेकार्थ शब्द के किसी एक ही अर्थ के साथ प्रसिद्ध अर्थ भी होते हैं। जैसे-

शंख-चक्र-युत हरि कहे, होत विष्णु को ज्ञान।

'हरि' के सूर्य, सिंह, वानर आदि अनेक अर्थ हैं; कितु शंख-चक्र-युत कहने से यहाँ विष्णु का ही ज्ञान होता है।

लक्षणामूला शाब्दी व्यंजनासंपादित करें

जिस प्रयोजन के लिए लक्षणा का आश्रय लिया जाता है वह प्रयोजन जिस शक्ति द्वारा प्रतीत होता है उसे लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना कहते हैं।

आर्थी व्यंजनासंपादित करें

जो शब्दशक्ति वक्ता (कहने वाला), बोद्धव्य (जिससे बात की जाए), वाक्य, अन्य-संनिधि, वाच्य (वक्तव्य), प्रस्ताव (प्रकरण), देश काल, चेष्टा आदि की विशेषता के कारण व्यंग्यार्थ की प्रतीति कराती है वह आर्थी व्यंजना कही जाती है। इस व्यंजना से सूचित व्यंग्य अर्थजनित होने से अर्थ होता है। अर्थात किसी शब्द-विशेष पर अवलम्बित नहीं रहता। जैसे- प्रस्ताववैशिष्टयोत्पन्नवाच्यसंभवा- में जहाँ प्रस्ताव से अर्थात प्रकरणवश वक्ता के कथन में व्यंग्यार्थ का बोध हो, वहाँ प्रस्ताव वैशिष्टयोत्पन्न आर्थी व्यंजना होती है।

स्वयं सुसजिजत करके क्षण में, प्रियतम को प्राणी के प्रण में,
हमीं भेज देती है रण में क्षात्र-धर्म के नाते। --- मैथिलीशरण गुप्त

इस पद्य से यह व्यंग्यार्थ निकलता है कि वे कहकर भी जाते तो हम उनके इस पुण्य से कार्य में बाधक नहीं होती। उनका चुपचाप चला जाना उचित नहीं था। यहाँ प्रस्ताव या प्रकरण बुद्धदेव के गृहत्याग का है। यह प्रस्ताव न होने से यह व्यंग्य नहीं निकलता। इसी प्रकार देशवैशिष्टयोत्पन्नवाच्यसंभवा- में जहाँ स्थान की विशेषता के कारण व्यंग्यार्थ प्रकट हो वहाँ यह भेद होता है। जैसे-

ये गिरी सोर्इ जहाँ मधुरी मदमत मयूरन की धुनि छार्इ।
या बन में कमनीय मृगीन की लोल कलोलनि डोलन भार्इ।।
सोहे सरितट धारि धनी जल मृच्छन को नभ नीव निकार्इ।
वंजुल मंजु लतान की चारू चुभीली जहाँ सुखमा सरसार्इ।। -- सत्यनारायण कविरत्न

यहाँ रामचन्द्रजी के अपने वनवास के समय की सुख-स्मृतियाँ व्यंजित होती हैं जो देश-विशेषता से ही प्रकट है। इन पृथक-पृथक विशेषताओं से वर्णन के अनुसार भी व्यंग्य सूचित होता है। शब्द शक्तियों का तुलनात्मक अध्ययन - अभिधा लक्षणा व्यंजना अभिधा में केवल मुख्य अर्थ या लोक प्रसिद्ध अर्थ प्रकट होता है | लक्षणा में शब्द के मुख्यार्थ से हटकर उसी के लक्षण के आधार पर अन्य अर्थ निकाला जाता है | मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ से भिन्न कोई अन्य अर्थ प्रकट होता है | इसका अर्थ निश्चित होता है कोई कल्पना का प्रयोग नहीं होता है | अर्थ निश्चित नहीं होता है , परन्तु अर्थ की दिशा निश्चित होती है अर्थात् लक्षण के आधार पर अर्थ निकाला जाता है | प्रसंग के आधार पर अर्थ का स्वरूप तय होता है | कल्पना का सहारा लेना पड़ता है | इसके लिए किसी अन्य शक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती | लक्ष्यार्थ निकालने में अभिधा शक्ति की आवश्यकता पड़ती है | अभिधा व लक्षणा दोनों की आवश्यकता पड़ती है | इसमें पाठक या श्रोता वास्तविक अर्थ ग्रहण करता है | मुख्यार्थ से परे लक्षणानुसार अपनी कल्पना और तर्क से अभीष्ट अर्थ तक पहुँचता है | इसमें संकेत भर होता है | बाकी समस्त अर्थ पाठक या श्रोता प्रसंग के आधार पर ग्रहण करता है |

इन्हें भी देखेंसंपादित करें