ऋग्वेद मैं कवि ऋषि का वर्णन है जब ब्रह्मा ने अपने वीर्य को अग्नि कुण्ड में डाला तो तीन पुत्र पैदा हुए भृगु , अंगिरा, और कवि । कवि को मां सरस्वती ने अपना स्तन पान करा कर अपना पुत्र बनाया । इस कारण सरस्वती पुत्र व ब्रह्मपुत्र कहलाये । कवि ऋषि ही आगे चलकर ब्रह्मभट्ट हुए । कवि ऋषि के प्रपौत्र अथर्वा ऋषि के नाम पर अथर्ववेद का नाम रखा गया । और आगे चलकर रेणू ऋषि ब्रह्मभट्ट ने अपनी पुत्री रेणुका को जमदाग्नि ऋषि से विवाह कर दिया रेणुका ने भगवान परशुराम जी को जन्म दिया । परशुराम जी ने चाहमान ऋषि ब्रह्मभट्ट जी से मल्लयुद्ध की शिक्षा प्राप्त की । भृगु ऋषि ओर अंगिरा ऋषि को ब्राह्मणी ने अपनाया इससे वो ब्राह्मण कहलाये । सरस्वती पुत्र ब्रह्मभट्ट कहलाये । सरस्वती जी को ब्रह्मा की पुत्री का दर्जा मिला है इस कारण ब्रह्मभट्ट ब्राह्मणों के मान्य व पूज्य और श्रेष्ठ है ।

 ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण सब ब्राह्मण के गुरु है

इन ब्रह्मभट्ट ब्राह्मणो के प्रभाव और वेद मे अग्रजन्मा का सम्मान इन्ही भट्ट ब्राह्मणौ को हि प्राप्त है परमार्थ निकेतन ऋषिकेश मे 125साल पुराना स्कंद पुराण रख्खा है जिसके पन्ने छूने मे फटते है उस पुराण मे भट्टोपाख्यन दिया है जिसमे सूत मागध और वंदी ऋषियो का उल्लेख विस्तृत रूप से दिया है नारद युधिष्ठीर संवाद यह बात का प्रमाण गीताप्रेस का श्रीभद्भागवत के सेकेन्ड पार्ट के पिछे से 25वा नम्बर पैराग्राफ में मागध कि तुलना सप्त ऋषियो मे है इस पुराण मे सत्यनारायण कि कथा भी दिया हुआ है जिसे पढे । भट्ट ब्राह्मणो के छवि को गिराने का काम नकली उपाधि लगा कर बने सवालख्खी व हाडा क्षत्रिय लोगो ने समाज को गुमराह किया है यही लोग रामचरितमानश दिखा कर अपने दादा को हि बदनाम कर दिया ! और येही लोग नानाप्रकार के किताब छाप कर भट्ट ब्राहमणो को भाट बना कर बदनाम करते गये । यदि भट्ट ही भाट है तो तुलशी अपने मानश मे आर्यभट्ट कुमारिल भट्ट बाण भट्ट जगद्धर भट्ट.लक्ष्मण भट्ट महाप्रभू गोपाल भट्ट .केशवभट्ट को क्यो भूला दिये । इनके साथ भी कुछ चाटुकार अनेक प्रकार के किताब छपा कर इन महान वैदिक सत्य सनातन धर्म के ब्राह्मण जो अग्रजन्मा है उसे बदनाम कर डाले। सारे भारत के ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण व अंतराष्ट्रिय ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण इक हो कर इन नकली बने उपाधि लगा कर बने पंडितो से पूछे कि तुम्हारी उत्पत्ती कहा लिखा है इनकी उत्पत्ती यजुर्वेद के 31वे अध्याय के पुरुष शुक्त मे लिखा है पर यह कैसे माने कि यह वही लोग है जिसकी तुलना इसमे है । और ब्रह्मभट्ट व्राह्मणो के मूल पुरुष कवि ऋषि के मूल सोम को कहा गया है कि आऔ पवित्र प्रदायक सोम आओ ब्राह्मण राज ब्राह्मणो में अपनी दीप्ति से चमकने वाले कविराज आओ यह सम्पूर्ण विप्रमंडल तुम्हारे स्वागत मे आरती का दिपक लिये खडा है। सामवेद व ऋग्वेद 2व9मे अध्याय मे देखे ।महाभारत के अनुशासन पर्व 85 मे बरुण यग्य हुआ जिसमे ब्रह्मा जी ने अपनी विर्य कि आहुति यग्य कुंड मे डाला तब उस यग्य से तीन पुरुष पैदा हुये प्रथम भृगु 2.अंगिरा3.कवि ऋषि पैदा हुवे है भृगु को वरुन ने पुत्र बनाया अंगिरा को अग्नि देव ने अपना पूत्र बनाया और कवि ऋषि को ब्रह्मा जी ने अपना पुत्र बनाया इसलिये ये ब्रह्मपुत्र भी कहलाते है फिर भृगु के सांत पुत्र हुवे अंगिरा के आठ पुत्र हुवे और कवि ऋषि के भी 8 पुत्र हुवे जिसमे कवि,काब्य,उश्ना,धृष्णु,बुद्धिमान, शुक्राचार्य,बिरजा इन्ही का नाम काशी धर्मग्य उग्र हुआ जो प्रजापति भी कहलाये भगवान जलेश्वर शिव ने भृगु व कवि ऋषि को बाद मे पुत्र रुप में स्विकार किया इसलिये ये बारुण भी कहलाते हैये वारुण ही शिव है. गीतात्वबिवेचनी कोड नं दो के पेज नं 480 मे देखे शुक्राचार्य का ही नाम उश्ना है कवि व काब्य है । इन्ही के पुत्र शंड व अर्मक है जो गुरुबृहस्पति के पूत्र कच को मृत्युशंजिवनी बिद्धा सिखाया था। कच को शुक्राचार्य सोमरस मे डालकर पि जाते है और बाद मे वमन कर जीवित करते है,मारकंण्डेयपुराण चाक्षुष मनवंतर मे काब्य ,व बिरजा कवि ऋषि के पुत्र है जिसकी तुलना सप्त ऋषियो में किया गया है । पद्धमपुराण पातालखंड एकलिंग क्षेत्र महात्य श्लोक 40मे लिखा है कि भट्ट ब्राह्मणो को दान देने से भयहरण करने वाले तुम हुये इसलिये भटहर यैसापुर का नाम होगा।इसपुर मे भट्टब्राह्मण हरि के समान निवास करेगे।महाभारत के कोडनं 36के पेज नं 5159,5192 मे लिखा है कि भृगुपुत्र उश्ना देवर्षि बडे तपस्वी थे कवि ऋषि का नाम हि भृगु हुआ है प्रमाण हर्षचरित्र मे दिया है क्यो कि ये किताब मुगल सलतनत मे मदरसो मे पढाया जाता था इसलिये ये लोग ईसे नही बदल पाये। कवि ऋषि के पुत्र उश्ना ऋग्वेद अष्टम मंडल के 84सेनवम मंडल के 87से 89सुक्तो के ऋषि कवि है जगद्धर भट्ट ने स्तुति कुसमांजली मे अग्रजन्मा का सम्मान भट्ट ब्राह्मणो को प्राप्त है।सामवेद पूरवार्ध के ऋषि का नाम उश्ना है जो कवि ऋषि का संतान है ब्रह्मवैव्रर्त पुराण के पेज नं 718,732 मे दिया है

कि रुकमणि द्वारा भटट ब्राह्मणो को 

मोती सोना दान दिया गया है पर क्षेपक भी किया गया है।ऋग्वेद मंडल 2सुक्त 43मंत्र 2 में कवि ऋषि को ब्रहमपुत्र कहा गया है मनुस्मृति मे कवि ऋषि को ब्राह्मण श्रैष्ठ कहा गया है। यहि कवि ऋषि सरस्वती पुत्र के रुप मे पैदा हुये है और सारस्वत ब्राह्मण कहलाये है। अब बाद मे लिखेगे। आप का पं सन्तोष शर्मा शास्त्री जी ओरियन्ट पेपर मिल्स अमलाई जिला सहडौल मध्य प्रदेश ।काशी का शास्त्र बाबा बिश्वनाथ कि कृपा। भट्ट ब्राह्मणौ को पंचमुखी वेदमाता ब्रह्म गायत्री का अनुशरण करना चाहिये सावित्री ही सरस्वती है।साकल्य मुनि वैष्पायन जी जातुकर्ण मुनि कौन है भट्टादित्य के संस्थापक नारद जी भी भट्ट है। महीसागर संगम को किसने बनाया था । कवि ऋषि का ईतिहास बिगाडने का काम हजारी प्रसाद दुवेदी ने बाण भट्ट की आत्म कथा लिख कर चतुराई से बाणभट्ट का बचपन का नाम दक्ष था और दुवेदी ने प्रचलित नाम बंड बना दिया.ये द्विवेदी लोग हि समाज को गंदा किये है।बाणभट्ट कवि ऋषि के पपौत्र च्यवन ऋषि से मूल माना है।कवि ऋषि की मां सरस्वती और भार्गवपुत्र अथर्वा दधीचि से सारस्वत कुल जेठानी अक्षमाला का पुत्र वात्सायन से वत्स गोत्र निकला।श्रीमद्भागवत के सातवे स्कंद का देवीपूजापटल उनातालिसवां अध्याय का सत्त्रहवा स्लोक में लिखा है कि भृगु के शाप से व राजा दधीचि के शाप के कारण तत्कालीन सर्वोत्म ब्राह्मण भी पद भ्रष्ट हो गये थे, बिश्वरुप का वध कर देने के बाद इन्द्र बहुत खुश हुआ तब बिश्व रुप कि पत्नी क्याधू अपने पसीना से वृत्तासूर नामक राक्षस पैदा कि जो ब्राह्मण पुत्र था्बृतासूर को मारने के लिये इन्द्र ब्रह्मा ,बिश्नु और महेश के पास गयेऔर कहा कि भगवन ब्रहमा बिश्नु और महेश के आशिर्वाद के कारण इसे कोई नही मार सकता इसका प्रभू कोई उपाय बताइये जिससे मेरा इन्द्रासन सुरक्षित रहे। यह बात सुन कर ब्रह्मा जी बोले कि तुम सरस्वती नदी के किनारे जाऔ वहा पर सतयुग से धर्म मार्ग पर चलते हुये !! ब्रहम भट्ट ब्राह्मण को ही शर्मा ब्राह्मण उपनाम के माध्यम से पुकारा जाने लगा और आज की जनरेशन के हिसाब से आपको बताए तो कई अन्य जातियां भी शर्मा का उपयोग करने लगी हैं जिससे भट्ट ब्राह्मण को पहचानना मुश्किल स होने लगा है

मैं आपको बता दूं तो अन्य ब्राह्मण भी शर्मा ब्राम्हण अपने आपको बताते हैं पूजन संकल्प करते वक्त सभी ब्राह्मण शर्मा ब्राह्मण ही हैं पर वह अपने अलग-अलग नामों से अपने आप को पुकारते हैं

(आज के वातावरण में कुछ जाति जैसे विश्वकर्मा बढ़ाई कुम्हार नाई नाउ इत्यादि अपने नाम के पीछे शर्मा उपनाम का उपयोग करते हैं जिसमें इनका कभी हक ही नहीं बनता कि यह शर्मा का उपयोग कर सकें यह लोग गलत तरीके से अपने आप को शर्मा बताते हैं इन्हें शर्मा का मतलब भी नहीं पता होता कि शर्मा माने होता क्या है इन्हीं लोगों की वजह से ब्राम्हण अपना फुल नाम ब्रह्मभट्ट बताता है)


सबसे पहले सभी भट्ट ब्राह्मण अपने आप को जाने और पहचाने कि आप हैं कौन ,आप ज्ञान के एक अथाह सागर है। जब यह जान जाएंगे तब कोई भी ब्राह्मण हो तिवारी शुक्ला मिश्रा पांडे चौबे पचवे आपसे तर्क में कुतर्क में हार जाएगा ।आप जब अपने बारे में जानेंगे तभी आप को ज्ञान होगा। अज्ञानी व्यक्ति किसी से वाक युद्ध नहीं कर सकता ।इसलिए आपको ब्रह्मभट्ट बनने के लिए ब्राह्मणों का पालन करना पड़ेगा। चमार पन से दूर ,रहना पड़ेगा ,शिखा रखनी पड़ेगी ,जनेऊ पहनना पड़ेगा ।यह सब सत्कर्म जब आप करेंगे निसंदेह आपको ऐसी कटु शब्दों का सामना फिर नहीं करना पड़ेगा। लेकिन जब आप चमारों के साथ बैठकर गांजा पियोगे शाम को मदिरा की दुकान से मदिरा पियोगे ,अपने कर्म के बारे में जानोगे नहीं। तो कोई तुमको ब्रह्मभट्ट या ब्राह्मण नहीं कहेगा। यह सब पालन नहीं करोगे तो आप शूद्र के समान हो ,इसलिए जागो और फिर से अपने ब्रह्म भट्ट की पुनर्स्थापना करो यह संकल्प लो कि हम ज्ञानी बनेंगे ,हम वीर बनेंगे हम अपने पंडित का पालन करेंगे ।जय हो ब्रह्मभट्ट समाज की।