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इसका स्थायी भाव निर्वेद (उदासीनता) होता है इस रस में तत्व ज्ञान कि प्राप्ति अथवा संसार से वैराग्य होने पर, परमात्मा के वास्तविक रूप का ज्ञान होने पर मन को जो शान्ति मिलती है वहाँ शान्त रस कि उत्पत्ति होती है जहाँ न दुःख होता है, न द्वेष होता है मन सांसारिक कार्यों से मुक्त हो जाता है मनुष्य वैराग्य प्राप्त कर लेता है शान्त रस कहा जाता है

उदाहरण :

जब मै था तब हरि नाहिं अब हरि है मै नाहिं

सब अँधियारा मिट गया जब दीपक देख्या माहिं


देखी मैंने आज जरा

हो जावेगी क्या ऐसी मेरी ही यशोधरा

हाय! मिलेगा मिट्टी में वह वर्ण सुवर्ण खरा

सुख जावेगा मेरा उपवन जो है आज हरा


लम्बा मारग दूरि घर विकट पंथ बहुमार

कहौ संतो क्युँ पाइए दुर्लभ हरि दीदार