न्यायमूर्ति शारदा चरण मित्र (१७ दिसम्बर १८४८ - १९१७) बंगाल के ऐसे मनीषी थे जिन्होने भारत जैसे विशाल बहुभाषा-भाषी और बहुजातीय राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के उद्देश्य से ‘एक लिपि विस्तार परिषद‘ की स्थापना की थी और परिषद की ओर से 1907 में ‘देवनागर‘ नामक मासिक पत्र निकाला था जो बीच में कुछ व्यवधान के बावजूद उनके जीवन पर्यन्त अर्थात्‌ सन्‌ 1917 तक निकलता रहा।

जीवनीसंपादित करें

जस्टिस शारदा चरण मित्र का जन्म सत्रह दिसम्बर 1848 को कलकत्ता में हुआ था। जब वे मात्र 6 वर्ष की आयु के थे तभी उनकी मां चल बसीं और जब वे आठवीं में पढ़ रहे थे तभी उनके पिता दिवंगत हो गए। 1870 ई0 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए किया और उसी वर्ष केवल एक माह बाद उन्होंने एमए की परीक्षा भी दे दी और इन दोनों परीक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षण ग्रहण करने के बाद 21 वर्ष की आयु में ही वे प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता में अंग्रेजी के प्राध्यापक बन गए। बाद में बीएल की उपाधि प्राप्त की और कुछ दिन तक कलकत्ता हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश के पद पर प्रतिष्ठित हुए। इस पद पर वे 1904 से 1908 तक रहे। इसके पूर्व में 1878 से 1880 तक कलकत्ता नगर निगम के पार्षद, 1884 से 1890 तक बंगाल टेक्स्ट बुक कमेटी के सदस्य, 1885 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कला संकाय के अधिष्ठाता (डीन) नियुक्त हुए। 1884 में उन्होंने कलकत्ता आर्य विद्यालय की नींव डाली। वे कलकत्ता के प्रतिष्ठित बंगीय साहित्य परिषद के उपाध्यक्ष और बाद में अध्यक्ष रहे।

हिन्दी एवं देवनागरी की सेवासंपादित करें

जस्टिस शारदा चरण मित्र कोई बहुत बड़े कवि, कथाकार या आलोचक नहीं थे, परन्तु वे एक महान राष्ट्रभक्त, मनीषी एवं चिंतक अवश्य थे। राष्ट्रीय चेतना ने उन्हें ‘एक लिपि विस्तार परिषद‘ के गठन की ओर प्रेरित किया। अंग्रेजी के विद्वान व कलकत्ता हाईकोर्ट के जज होने के बावजूद उन्होंने हिंदीदेवनागरी लिपि के प्रसार के लिए जो उद्यम किया वह आज भी मील का पत्थर बना हुआ है।

'देवनागर' के प्रवेशांक में उसके उद्देश्यों के बारे में इस तरह प्रकाश डाला गया-

जगद्विख्यात भारतवर्ष ऐसे महाप्रदेश में जहाँ जाति-पांति, रीति-नीति, मत आदि के अनेक भेद दृष्टिगोचर हो रहे हैं, भाव की एकता रहते भी भिन्न-भिन्न भाषाओं के कारण एक प्रांतवासियों के विचारों से दूसरे प्रांतवालों का उपकार नहीं होता। इसमें संदेह नहीं कि भाषा का मुख्य उद्देश्य अपने भावों को दूसरे पर प्रकट करना है, इससे परमार्थ ही नहीं समझना चाहिए, अर्थात मनुष्य को अपना विचार दूसरे पर इसलिए प्रकट करना पड़ता है कि इससे दूसरे का भी लाभ हो किंतु स्वार्थ साधन के लिए भी भाषा की बड़ी आवश्यकता है। इस समय भारत में अनेक भाषाओं का प्रचार होने के कारण प्रांतिक भाषाओं से सर्वसाधारण का लाभ नहीं हो सकता। भाषाओं को शीघ्र एक कर देना तो परमावश्यक होने पर भी दुस्साध्य सा प्रतीत होता है। इस पत्र का मुख्य उद्देश्य है भारत में एक लिपि का प्रचार बढ़ाना और वह एक लिपि देवनागराक्षर है। देवनागर का व्यवहार चलाने में किसी प्रांत के निवासी का अपनी लिपि व भाषा के साथ स्नेह कम नहीं पड़ सकता। हाँ, यह अवश्य है कि अपने परिचित मंडल को बढ़ाना पड़ेगा। पहले इस पत्र को पढ़ने में पाठकों को बड़ी नीरसता जान पड़ेगी किंतु इस दूरदर्शिता, उपयोगिता तथा आवश्यकता का विचार कर सहृदय पाठकगण अनंत भविष्यत के गर्भ में पड़े हुए पचास वर्ष के अनंतर उत्पन्न होने के शुभ फल की आशा से इस क्षुद्र भेंट को अंगीकार करेंगे।[1]

सन्दर्भसंपादित करें

  1. हिंदी पत्रकारिताः जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण-भूमि, कृष्ण बिहारी मिश्र, भारतीय ज्ञानपीठ, संस्करण-2004, पृष्ठ-321

इन्हें भी देखेंसंपादित करें