मुख्य मेनू खोलें

शिवकुमार मिश्र (3 सितम्बर, 1930 — 21 जून, 2013) हिन्दी साहित्य के प्रतिबद्ध मार्क्सवादी आलोचक थे। मुख्यतः सैद्धांतिक आलोचना के क्षेत्र में गतिशील रहने के बावजूद व्यावहारिक आलोचना से भी उनका जुड़ाव बना रहा है। गहन विवेचन में भी सहज संप्रेषणीयता उनके लेखन की आद्यन्त विशेषता रही है।

शिवकुमार मिश्र

जीवन परिचयसंपादित करें

डाॅ० शिवकुमार मिश्र का जन्म वस्तुतः 3 सितम्बर 1930 ई० को कानपुर जिले के एक गाँव में हुआ था। मैट्रिक के प्रमाण-पत्र में उनकी जन्म-तिथि 2 फरवरी 1931 ई० है[1] जिसे लम्बे समय तक उनकी जन्म-तिथि के रूप में मान्यता प्राप्त रही है।

उनकी एम.ए. तक की शिक्षा कानपुर में ही हुई। पीएच.डी. तथा डी.लिट. सागर विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश से।

डाॅ० मिश्र सन् 1959 से 1977 तक सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में व्याख्याता तथा रीडर रहे। सन् 1977 से 1991 तक गुजरात के वल्लभ विद्यानगर स्थित सरदार पटेल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष रहे। 21 जून 2013 ई० को अहमदाबाद में ही उनका पार्थिव शरीरान्त हुआ।[2]

रचनात्मक परिचयसंपादित करें

डाॅ० मिश्र प्रतिबद्ध मार्क्सवादी समीक्षक के रूप में विख्यात रहे हैं। प्रतिबद्धता के बावजूद विवादों से प्रायः दूर रहते हुए ही उन्होंने अपना लेखन कार्य एक निष्ठावान साधक की तरह किया है। हिन्दी साहित्य के मध्यकाल पर भी उनकी गहरी पकड़ थी; और उसके विवेचन-मूल्यांकन में भी उनकी आधुनिक गवेषक दृष्टि की प्रखरता बनी रही है। यही कारण है कि वे भक्ति-आन्दोलन को महान् मानते हुए भी उसे केवल महिमान्वित ही नहीं करते, वरन् उसके अंतर्विरोध और उसकी रीतिवादी परिणति को भी स्पष्ट करते हैं तथा मध्यकालीन संतों और भक्तों के सन्दर्भ में स्त्री-अस्मिता के सवालों से जूझते हुए सूरदास के प्रसंग में बाजार और बाजारवाद के विमर्श तक भी पहुँचते हैं।

मध्यकाल की विशेषज्ञता के बावजूद मिश्र जी का मुख्य प्रकार्य आधुनिक काल के विविध साहित्यरूपों के सन्दर्भ में ही रहा है। मिश्र जी को मुख्यतः सैद्धान्तिक आलोचना से सम्बद्ध माना जाता रहा है। वे सैद्धान्तिक आलोचना पर केन्द्रित रहे भी हैं, परन्तु व्यावहारिक आलोचना से उनका जुड़ाव भी हमेशा बना रहा है। उनकी पुस्तकें इसका साक्ष्य स्वयं प्रस्तुत करती हैं। उनकी आरम्भिक दो पुस्तकें व्यावहारिक आलोचना की ही थी। लेकिन ये दोनों पुस्तकें मुख्यतः उच्चस्तरीय छात्रों को ध्यान में रखकर लिखी गयी थी। बाद में सैद्धान्तिक लेखन के साथ भी अधिकांश पुस्तकों में व्यावहारिक विवेचन भी मिलते हैं। भक्ति काव्य के अतिरिक्त आधुनिक काल में यदि निबन्धों को छोड़ भी दें तब भी उनकी तीन पुस्तकें तो प्रेमचन्द पर ही केन्द्रित हैं। 'आधुनिक कविता और युग-दृष्टि' में जहाँ निराला, पन्त, महादेवी, नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं पर केन्द्रित आलेख उनकी आलोचनात्मक क्षमता के प्रमाण उपस्थित करते हैं, वहीं 'साहित्य और सामाजिक सन्दर्भ' में सैद्धान्तिक विमर्शों के बीच वे प्रेमचन्द के द्वारा युग-प्रवर्तन के साथ हरिशंकर परसाई के विचारों से अपनी सहमति-असहमति की चर्चा करना भी नहीं भूलते हैं। इसी प्रकार 'आलोचना के प्रगतिशील सरोकार' में सैद्धान्तिक विवेचन के साथ अनेक उपन्यासों का उनका विवेचन उनके सरोकारों का स्वच्छ साक्ष्य उपस्थापित करता है। प्रेमचन्द की कहानियों पर केन्द्रित उनकी पुस्तक कथा-समीक्षा में एक नये और विशिष्ट ढंग के आरम्भ का प्रतिष्ठापन सिद्ध हुई है।

उनकी पुस्तकों को पढ़ने वाले उनकी विचारधारा के बारे में श्रीराम त्रिपाठी के इस कथन से अवश्य सहमत होंगे कि वे समाज के उस वर्ग के हितैषी थे, जो कर्मशील होने के बावजूद दबा-कुचला था। अन्याय और शोषण का शिकार था। गहन अध्येता होने के कारण वे समस्याओं के मूल तक पहुँचते थे। इसलिए रचना के मर्म के उद्घाटन में कामयाब होते थे। वर्ग विभाजित समाज से वर्ग भेद खत्म होने में मदद करने वाले साहित्य को ही मिश्र जी अर्थवान और श्रेष्ठ मानते थे[3]

वे वैयक्तिक राग-द्वेषों से मुक्त होकर लिखते थे; इसलिए उनका लेखन भी दुविधाग्रस्त नहीं है। आद्यन्त साफ-सुथरी तथा निर्णयात्मक भाषा-शैली उनकी पहचान रही है।[4]

प्रकाशित कृतियाँसंपादित करें

  1.  कामायनी और प्रसाद की कविता गंगा - 1954 (अप्राप्य)
  2.  वृन्दावनलाल वर्मा : उपन्यास और कला - 1956 (DLI पर उपलब्ध)
  3.  नया हिन्दी काव्य - 1962
  4.  आधुनिक कविता और युग-दृष्टि - 1966 (संशोधित-परिवर्धित संस्करण-2012, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली से)
  5.  प्रगतिवाद - 1966
  6.  मार्क्सवादी साहित्य-चिन्तन : इतिहास तथा सिद्धान्त - 1973
  7.  यथार्थवाद - 1975
  8.  साहित्य और सामाजिक सन्दर्भ - 1977 (संशोधित-परिवर्धित संस्करण-2012, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली से)
  9.  प्रेमचंद : विरासत का सवाल - 1981
  10.  दर्शन साहित्य और समाज - 1981
  11.  भक्तिकाव्य और लोकजीवन - 1983 (इस नाम से वाणी प्रकाशन से; संशोधित-परिवर्धित संस्करण-2010 में भक्ति-आन्दोलन और भक्ति-काव्य नाम से लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद से)
  12.  हिन्दी आलोचना की परम्परा और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल - 1986
  13.  आलोचना के प्रगतिशील आयाम - 1987 (संशोधित-परिवर्धित संस्करण-2012 में आलोचना के प्रगतिशील सरोकार नाम से प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली से)
  14. कहानीकार प्रेमचन्द : रचना दृष्टि और रचना शिल्प - 2002 (लोकभारती से)
  15.  मार्क्सवाद देवमूर्तियाँ नहीं गढ़ता - 2005
  16.  साहित्य : इतिहास और संस्कृति - 2010
  17. मार्क्सवाद और साहित्य
  18. हिन्दी साहित्य : संक्षिप्त इतिवृत्त
  19. प्रेमचन्द की विरासत और गोदान - 2011 (लोकभारती से)
  20. साम्प्रदायिकता और हिन्दी उपन्यास - 2015

इनमें से प्रकाशन के साथ उल्लिखित को छोड़कर अधिकांश अब वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित हैं।

सम्मानसंपादित करें

डॉ० मिश्र को उनकी पुस्तक 'मार्क्सवादी साहित्य-चिन्तन : इतिहास तथा सिद्धान्त' (1973) के लिए 1975 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार प्रदान किया गया था।

गोविन्दवल्लभ पन्त पुरस्कार से भी पुरस्कृत

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. 'प्रकाशित कृतियाँ' में उल्लिखित प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित तीनों पुस्तकों के फ्लैप पर दिये गये लेखक परिचय में द्रष्टव्य।
  2. कथादेश, जुलाई 2013, पृ.91.
  3. प्रगतिशील वसुधा, अंक-94, जनवरी-मार्च-2013, पृ.14.
  4. हिन्दी का गद्य-साहित्य, डाॅ० रामचन्द्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी; संस्करण-2016, पृ.143.