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संगमकाल (तमिल : சங்ககாலம், संगकालम्) दक्षिण भारत के प्राचीन इतिहास का एक कालखण्ड है। यह कालखण्ड ईसापूर्व तीसरी शताब्दी से लेकर चौथी शताब्दी तक पसरा हुआ है। यह नाम 'संगम साहित्य' के नाम पर पड़ा है। संगम युग मतलब जब मनुष्य परिकल्पना की दुनिया से वास्तविक दुनिया में ध्यान जाने का मार्ग है इसमें कुछ परिकल्पना प्रचीन सभ्यता साम्रज्य व लोग है ।

जैसे बहुत कुछ परिकल्पना आज से पांच सौ वर्षों तक की पूर्व की है जहां भी प्रकृति नियम का उल्लंघन हुआ जिसे चमत्कार कहना चाहिए वहां परिकल्पना के दुनिया का अंश या कथा है । जैसे चोल साम्राज्य एक परिकल्पना की दुनिया की कहानी है क्योंकि इसमें लक्ष्मी माता भृगू ऋषि के द्वारा विष्णु के अपमान करने के बाद चोला साम्रज्य की भूमि पर गई थी और चोला राजा को ब्राम्हा विष्णु व बालाजी ने दर्शन दिये जब भगवान ही परिकल्पना है तो वे भी मनुष्य परिकल्पना है। चोला समय का मौर्य साम्राज्य भी परिकल्पना का राजा आशोका भी है फिर अशोका के पहले के सभी राजा जैसे सिकंदर चंगेज खान एक परिकल्पना है जैसे विक्रमादित्य राजा भोज तो सीध देवी देवता के संपर्क में रहते थे जो खुद एक परिकल्पना है । गुरूनानक भी एक परिकल्पना है क्योंकि इन्हों ने कलयुग से बात किया जो एक खुद ही परिकल्पना है फिर गुरूनानक के चमत्कार है तथा कथा सामान्य नहीं है । संत थामस भी परिकल्पना की दुनिया का इंसान है क्योंकि कोई भी मनुष्य भौतिक नियम का उल्लंघन नही कर सकता है इसे सिध्द हो जाता है की ईसाई धर्म वास्तविक समय पर सदैव से भारत में है तो मुस्लिम भी है कहा जाऐ जो भारत में मुस्लिम ईसाई है उनकी मातृभूमि भी भारत ही है ना की इस्लामिक देश की भूमि । तुलसीदास भी एक परिकल्पना है क्योंकि इन्होंने राम हनुमान से मिला जो परिकल्पना के दुनिया के भगवान है अगर तुलसीदास का जन्म समय पांच छैः सौ वर्ष पहले हुआ है इसी समय ताज महल भी बना है अर्थात ताज महल का कभी निर्माण नही हुआ जैसे मिस्र के पिरामिड का नहीं क्योंकि मिस्र के पिरामिड में लिखा है की जब से सृष्टि है तब से वह पिरामिड है मतलब वास्तविक दुनिया में सदैव से था क्योंकि मिस्र के राजा की अजीब सभ्यता थी वे अपने मां बाप भाई बहन दादी दादा बेटी से भी शादी कर लेते थे जबकी ऐसा हो ही नहीं सकता मानव समाज में इसलिए मिस्र की भी सभ्यता परिकल्पना है मिस्र की सभ्यता परिकल्पना तो माया इंका सिन्धु सुमेरू बेबीलोन पीली घाटी सभ्यता सब एक परिकल्पना की दुनिया की सभ्यता है उसी ताज महल भी के राजा रानी एक कहनी के पात्र है अकबर भी नहीं था बीरबल भी नही था ना बाबर था ना अगर बाबर नहीं था तो प्रचीन अयोध्या का राम मंदिर कभी राम मंदिर था ही नहीं वास्तविक दुनिया में वह आदि आनादि काल से मज्जिद था अगर उस मज्जिद पर राम मंदिर बनने की कोशिश भी की गई तो भारत में मुस्लिम साम्रज्य बन जाऐगा क्योंकि की विधि के विधान पर कोई हस्तक्षेप नही कर सकता है इसे पहले भारत में ईसाई प्रचीन स्थानों को हटाने की कोशिश में ब्रिटिश साम्राज्य आ गया । ऐसे ही परिकल्पना के दुनिया के सभी धर्मो के अधिकांश मंदिर मज्जिद चर्च गुरूद्वारा मूर्तियां व लोगो के मृत्यु शरीर है और उन्हें की कथा भी है ।

वास्तविक दुनिया के लोग वास्कोडिगमा ब्रिटिश शासक ही रहे होगे उसके पहले का वास्तविक इतिहास समाप्त हो जाता है परिकल्पना की दुनिया की ही कहनी रहती है इस दुनिया में ।

इस विश्व का परम् सत्य शायद ही समझ पूरा आ सकता है बिना चेतना जागृत किये लोगो को इसलिए वे अपने धर्म अनुसार ही इसे सत्य मनाते है या फिर धर्म पर विश्वास नही तो विज्ञान का नियम को मनाते है ।

लेकिन प्रचीन प्रर्थना स्थलों व परमात्मा की भक्ति पूजा पाठ विधि आवश्य ही लोगों का मन को शांति देती है तथा जिसे स्वाथ्य व जीवन में सफलता प्राप्त होती है उन मे सकारात्मक ऊर्जा है और परमात्मा स्वयं के भीतर है अपने धर्म के स्वरूप की व्याख्या के रूप में वहां सब सुनता समझता है हम उसके अंश आत्मा है या फिर उनके रचना है इसलिए परमात्मा पर सब कुछ जानकार भी श्रध्दा रखनी चाहिए वही परम् सत्य है हम तो उसके रचना के भौतिक स्वरूप है परमात्मा है वहां था वहां सदैव रहता है उसके ही कारण विश्व व्यप्त व अस्तित्व में है ।

परिकल्पना की दुनिया की सभ्यता मिस्र है तो उसके फेरू भी परिकल्पना है तो मूसा की भी कथा एक परिकल्पना है तो यशु भी परिकल्पना है और मोहम्मद भी ये सभी धर्म के कथा पात्र भी परिकल्पना है इसलिए ये भी प्रचीन धर्म है क्योंकि परमात्मा किसी को दर्शन देता नही उस परमात्मा को समझना व परिकल्पना करना पड़ता है जैसे यशु ने देखा मूसा ने यहूवा को देखा मोहम्मद ने आल्लाहा को इसी तरहां इब्राहीम भी एक कथा तो मनु भी कथा तो मनु का पुत्र ऋषभनाथ भी परिकल्पना है तो महावीर भी तो बुध्द भी तो कालिदास सूरदास नावनाथ बौध्दिधर्मा चीनी यात्री मीरा बाई कर्मा माता आदि शंकराचार्य वल्लभाचार्य ऐसे कई परिकल्पना के मनुष्य है परन्तु उन्हें मात्र चेतना जागृत होने पर ही जाना जा सकता है ।

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