माता शाकम्भरी देवी को समर्पित इस मंदिर को सकराय माता के नाम से जाना जाता है।यह मंदिर राजस्थान के सीकर जिले मे उदयपुरवाटी कस्बे से सौलह किमी दक्षिण पश्चिम मे अरावली पर्वत श्रृंखला की मालकेतू पहाडियों के पास है।पास ही शंकर गंगा नदी बहती है।मंदिर के आसपास रावण कुंड, आत्ममुनि का आश्रम, कोट बांध आदि दर्शनीय स्थल है।यह मंदिर शेखावाटी अंचल के प्रसिद्ध मंदिरों मे से एक है। शाकम्भरी देवी का एक अन्य प्रसिद्ध मंदिर उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के पर्वतीय क्षेत्र मे भी है जो शाकम्भरी शक्तिपीठ है जिसको शताक्षी देवी, शाकम्भरी देवी का का सिद्ध स्थान माना जाता है। दूसरा मंदिर राजस्थान के ही साम्भर मे स्थित सांभर पीठ है।

शाकम्भरी देवी
शाकम्भरी माता राजस्थान
शाकुम्भरी देवी मंदिर
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शाकम्भरी देवी
धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धताहिंदू धर्म
देवताब्रह्माणी(सरस्वती), रूद्राणी(काली)
त्यौहारनवरात्र दुर्गा अष्टमी, चतुर्दशी, पौष पुर्णिमा, शाकम्भरी नवरात्र
अवस्थिति जानकारी
अवस्थितिसीकर
राज्यराजस्थान
देशभारत

शाकम्भरी देवी अवतार की कथासंपादित करें

एक बार दुर्गमासुर नामक महापराक्रमी दैत्य ने ब्रह्मा जी से वरदान लेकर तीनों लोको मे उत्पात मचा दिया। यज्ञादि क्रियाएँ बंद होने के कारण त्रिलोकी मे हाहाकार मच गया। इस तरह सौ वर्ष तक वर्षा न होने के कारण अन्न-जल के अभाव में भयंकर सूखा पड़ा और प्राणी मरने लगे।तब देवता और ऋषियों ने हिमालय पर्वत की शिवालिक पर्वत शृंखला मे माता भगवती की आराधना की। तब आदिशक्ति माँ भवानी माता आयोनिजा देवी के रूप मे अवतरित हुई, उनके सौ नेत्र थे। उन्होंने अश्रु वृष्टि की और इस तरह पूरी धरती में जल का प्रवाह हो गया। देवी सौ नयनों के कारण शताक्षी कहलाई । फिर माँ ने अपने अंगों से शाक उत्पन्न किये और शाकम्भरी माता के नाम से जगत प्रसिद्ध हुई। अंत में शाकम्भरी देवी ने दुर्गम दैत्य का वध कर दिया और उनको दुर्गा देवी के नाम से भी जाना जाने लगा।

 
मंदिर मे माता ब्रह्माणी और रूद्राणी के श्रीविग्रह
 
शक्तिपीठ शाकम्भरी देवी सहारनपुर उत्तर प्रदेश
 
शाकम्भरी माता साम्भर राजस्थान

मंदिर का इतिहाससंपादित करें

सकराय स्थित माँ शाकम्भरी का भव्य मंदिर राजस्थान के प्राचीन मंदिरों मे से एक है। यह मंदिर मूल रूप से शंकरा अथवा शक्रा देवी का है । इस मंदिर की स्थापना शाकम्भरी देवी के रूप मे नही हुई थी किंतु राजस्थान मे माँ शाकम्भरी की बढ़ती लोकप्रियता से इस शंकरा देवी को शाकम्भरा देवी और शाकम्भरी देवी के नाम से जाना जाने लगा। मंदिर मे लगे प्राचीन शिलालेखों मे भी शंकरा देवी का वर्णन है शाकम्भरी देवी का नही है। वस्तुत ग्यारहवीं शताब्दी के काल मे शंकरा अथवा शक्रा माता को यहाँ शाकम्भरी कहा जाने लगा। मंदिर मे ब्रह्माणी और रूद्राणी के दो विग्रह है जिनको शाकम्भरी माता और काली माता का विग्रह माना जाता है। ब्रह्माणी को यहाँ शाकम्भरी माता कहते हैं वास्तव मे ब्रह्माणी माता सरस्वती का ही एक नाम है। रूद्राणी को काली कहा जाता है जो रूद्र की शक्ति पार्वती है। मंदिर मे दोनों मूर्तियां महिषासुर मर्दिनी देवी की है।