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अपनी बात : चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई।

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कर्मण्येवाधिकारस्ते

  • कर्मक्षेत्र और अधिकारक्षेत्र को परस्पर सीमित और संयमित करने वाला गीता का यह श्लोकांश, जो प्रकारांतर से इनकी सहजिविता का भी संकेतक है, मुझे बेहद पसंद है। स्वयं को समझकर और समझाकर देख चुका हूँ कि अनासक्त मैं हो नहीं सकता। दुखों का भय मुझे दुखी नहीं कर सकता। पुनर्जन्म में मेरी कोई आस्था नहीं है इसलिए वर्तमान का दायित्व अज्ञेय अतीत पर थोपकर अनंत भविष्य को स्वप्निल बनाने की कोशिशें भी मेरे चिंता के दायरे में शामिल नहीं है। मेरे कर्तव्य और अधिकार क्षेत्र की सीमाएं ज्ञान क्षेत्र की सीमाओं ने निर्धारित की है। भूत, प्रेत, परी, जिन्न सबसे दोस्ती का इरादा है। वरना जबतक स्पष्ट रूप से महसूस न कर लूँ तबतक ईश्वर का अस्तित्व भी स्वीकार नहीं। अज्ञान को ईश्वर बनाकर पूजना मेरे वश में नहीं।
  • मुझे उछलता-कूदता, शरारतें करता बचपन, हँसती-खिलखिलाती, सपने सजाती लड़कियाँ और समझदारी भरी बातें करते लोग बेहद पसंद हैं। रंग-रूप, धन-दौलत, जाति-धर्म, आदि के आधार पर कर्तव्य तय करना मुझे पसंद नहीं।
  • मैं तबतक अपने परिचितों का सम्मान करता हूँ जबतक वह स्वयं को अनादर के सर्वथा उपयुक्त सिद्ध न कर दे और इस योग्यता का निर्धारण सिर्फ मेरे प्रति किये गये व्यवहार से नहीं बल्कि अन्यों के प्रति किये जाने वाले व्यवहार से भी होता है। किसी पर उँगली उठाते वक्त बाकी तीन उँगलियों पर मेरी हमेशा नजर होती है शायद इसीलिए मैं शिकायत नहीं करता, फ़ैसले लेता हूँ। तटस्थ रहने की मेरी आदत नहीं है।
  • मेरी निजी आकांक्षाएँ बहुत छोटी हैं किंतु सामाजिक सपने बहुत बड़े। एक ऐसी भाषा मेरी मातृभाषा है जिसके बोलने वाले बहुत गरीब हैं। एक ऐसी संस्कृति मुझे विरासत में मिली है जिसमें अच्छा चाहे जितना भी हो बुरा इतना है जो अच्छे को उभरने नहीं देता। स्वयं को सही और दूसरों को गलत मानने की इतनी गहरी आदत है कि दूसरों को सही समझकर कुछ सीखने की बात सिर्फ बातों और किताबों तक सिमट जाती है। इतना संतोष ज़रूर है कि मुझे सीमाओं की पहचान है और सामर्थ्य का ज्ञान भी।
संकल्प चरैवेती-चरैवेती का फ़ैज़ के सुबहे आज़ादी [[]]नज़्म की आखिरी पंक्तियों के रूप में-

अभी गरानी-ए-शब में कमी नहीं आई

निज़ाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई

चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई