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-- नया सदस्य सन्देश (वार्ता) 18:25, 1 अप्रैल 2018 (UTC)

पठन कौशल (भाषा कौषल)संपादित करें

पठन या वाचन कौशल भाषा का मूल स्वरूप उच्चारित रूप है। लिखित भाषा के ध्वन्यात्मक पाठ को मौखिक पठन कहते हैं। बिना अर्थ ग्रहण किए गए पठन को पठन नहीं कहा जा सकता। पठन की क्रिया में अर्थ ग्रहण करना आवश्यक होता है।

महत्व (१) शिक्षा प्राप्ति में सहायक (२) ज्ञान उपार्जन का साधन (३) विशिष्टता और नवीनता (४) सामाजिक विकास (५) लोकतांत्रिक गुणों का विकास (६) मनोरंजन (७) राजनीतिक विकास (८) बौद्धिक विकास (९) साहित्यिक विकास (१०) सांस्कृतिक विकास

उद्देश्य १) आरोह अवरोह का अभ्यास २) उचित स्थान का ज्ञान ३) उच्चारण का ज्ञान ४) भाव समझना और समझाना ५) ध्वनि बल निर्गम स्वर आदि का सम्यक ज्ञान ६) शुद्ध तथा स्पष्ट उच्चारण ७) मधुरता तथा प्रभाव उत्पादकता

पठन कौशल विधियां १) शब्द तत्व पर आधारित विधियां १.१) वर्ण बोध विधि १.२) ध्वनि साम्य विधि २) स्वर उच्चारण विधि ३) देखो और कहो ४) वाक्य विधि ५) कहानी विधि ६) अनुकरण विधि ७) संपर्क विधि

पढ़ने में त्रुटि का ज्ञान १) अटक-अटक कर पढ़ना २) अनुचित मुद्रा ३) वाचन में गति का अभाव ४) अशुद्ध उच्चारण ५) दृष्टि दोष से वर्णन न दिखना ६) पाठ्य सामग्री का कठिन होना ७) संयुक्ताक्षर की छपाई में त्रुटि ८) भावानुकूल आरोह-अवरोह का अभाव ९) वचन संबंधित मार्गदर्शन का अभाव १०) अध्यापक का व्यवहार Ashish Dave (वार्ता) 07:11, 16 अगस्त 2019 (UTC)

काव्य शिक्षणसंपादित करें

कविता शिक्षण के सामान्य उद्देश्य १) स्वर प्रवाह, भाव अनुसार कविता पाठ क्षमता वृद्धि। २) छात्रों को कविता के प्रति आकर्षित करना। ३) कवि कर्म / कविता के माध्यम से सांस्कृतिक तथा पौराणिक ता धार्मिकता सामाजिकता की अनुभूति धार्मिकता सामाजिकता की अनुभूति करवाना। ४) कवि के भावों को समझने की शक्ति उत्पन्न करना। ५) अर्थ ग्रहण व भावानुभूति करने योग्य बनाना। ६) विभिन्न विभिन्न का विषय काव्य शैलियों से परिचय कराना। ७) कल्पना शक्ति में वृद्धि करना। ८) साहित्य रचना के प्रति रुचि उत्पन्न करना। ९) कविता के माध्यम से चित्त वृत्तियों का परिमार्जन करना और उच्च आदर्शों का निर्माण करना।

काव्य शिक्षण के विशिष्ट उद्देश्य १) कवि विशेष के भाव विचार या या शैली के चमत्कार का आनंद प्राप्त करना। २) कवि संदेशों को छात्रों तक पहुंचाना। ३) कविता में निहित जीवन आलोचना को स्पष्ट करना। ४) विशिष्ट शैली से परिचय कराना।

काव्य शिक्षण के मुख्य सिद्धांत १) सस्वर प्रस्तुतीकरण का सिद्धांत २) समवेत स्वर में प्रस्तुतीकरण का सिद्धांत ३) अध्यापक की क्षमता का का क्षमता का का सिद्धांत ४ अध्यापक की संलग्नता का सिद्धांत ५) स्तरानुसार काव्यांश चयन का सिद्धान्त ६) भाव कल्पना, विचार सौंदर्य का सिद्धांत ७) समभाव कविता पाठ का सिद्धांत

काव्य शिक्षण विधियां १) गीत विधि २) अभिनय विधि ३) अर्थबोध विधि ४) व्याख्यान विधि ५) व्यास विधि ६) तुलना विधि ७) समीक्षा विधि ८)विश्लेषण विधि ९) खंडान्वस विधि १०) समीक्षा प्रणाली समीक्षा का तात्पर्य होता है कविता की आलोचना तथा मूल्यांकन करना। यह तीन प्रकार से की जाती है। १) ऐतिहासिक समीक्षा प्रणाली २) सैद्धांतिक समीक्षा प्रणाली ३) व्यवहारिक समीक्षा प्रणाली ११) विश्लेषण प्रणाली ११.१) रसात्मक विश्लेषण प्रणाली ११.२) भावात्मक विश्लेषण प्रणाली

कविता के प्रति रुचि बढ़ाने के साधन १) कविता का प्रभावशाली पठन,२) कविताओं का कंठस्थीकरण ३) कविताओं का संग्रह ४) कवि जयंती ५) कवि सम्मेलन ६) कवि गोष्ठी ७) समस्या पूर्ति ८) कवि दरबार ९) सुभाषित प्रतियोगिता १०) कविता पाठ प्रतियोगिता

पद्य पाठ योजना १) सामान्य उद्देश्य २) विशिष्ट उद्देश्य २.१) संज्ञानात्मक उद्देश्य २.२) भावात्मक उद्देश्य २.३) क्रियात्मक उद्देश्य ३) सहायक उपकरण बोर्ड, पाठ्य पुस्तक, चॉक, डस्टर, संकेतिका आदि। ४) विशिष्ट उपकरण चित्र, चार्ट, ध्वनि उपकरण, दृश्य उपकरण, १) प्रस्तावना २) उद्देश्य ३) उद्देश्यकथन ४) प्रस्तुतीकरण ५) आदर्श वाचन प्रभावशाली बटन ६) अनुकरणवाचन ७) अशुद्धिसंशोधन ८) काठिन्य निवारण ९)बोध प्रश्न १०) छात्रध्यापक कथन/ शिक्षक सारांश ११) चित्र मॉडल / प्रदर्शन Ashish Dave (वार्ता) 16:55, 16 अगस्त 2019 (UTC)

देवार्चनसंपादित करें

"मंत्राधीनं च देवता" अर्थात् देवता मंत्र के अधीन होते हैं। वर्तमान समय में देखनें में आरहा है कि कुछ मंदिरों में चोला चढानें के लिए लोदगों का तांता लगा रहता है। कहीं कहीं तो एक दिन में कईं कईं बार भगवान को चोला चढता है। मेरी समझ से यह सही नहीं है। वास्तव में देवता को चोला एक सप्ताह में, एक पक्ष में, एक माह में या कम से कम एक बार किसी विशेष पर्व पर जिन देवता को सिंदूर चढता है उन देवता के श्रृंगार हो जावे इसलिए एक व्यवस्था बनाई हुई है। इसके साथ ही कुछ साधना व उपासना पद्धति के पक्ष भी जुडे हैं।

वास्तव में जिन देवता के सिंदूर चढता है, उन देवता का रोज पंचामृत पूजन जलाभिषेक आदि नहीं हो पाता। यह पूजन प्रायः सभी मंदिरों में रोज छोटी धातु (सोना, चांदी, तांबा, पीतल आदि) की प्रतिमा पर संपन्न किए जाते थे।

मुख्यरूप से देवता को प्रसन्न करने का कार्य साधना के द्वारा किया जाता था। देवता को प्रसन्न करने के लिए और स्वयं में दैवत्व लाने के लिए ध्यान, आसन, प्राणायाम, योग,त्राटक, मंत्र, यंत्र, स्तोत्र, सूक्त, पाठ, पुराण, पारायण, संपुट, देव पूजन, विविध अर्चना, हवन, यज्ञ आदि कर्म किया जाता था।

इन सब से देवता, ब्राह्मण, यजमान और स्थान सभी में चैतन्यता आती थी।

वर्तमान में केवल चोला चढओं बाकी किसी कार्य की आवश्यकता नहीं रही, चोला भी मात्र कृत्रीम साजो सृंगार से सजा देना मेकअप, डेकोरेशन मात्र रह गया है। जो तप, साधना आदि का पक्ष और विभिन्न अनुष्ठानादि कर्म लुप्त होते जा रहे हैं।

कईं लोग ऐसे भी कहते भी देखे गए हैं हमें किसी की आवश्यक्ता नहीं, हम को सब आता है, हम खुद ही कर लेंगें।

पर समझना होगा कि किसी तपस्वी साधक के द्वारा चढा चोला, भले ही वह देखने में आकर्षक न हो पर प्रभावकारी और फल दायक होता है।

एक बड़ी विडंबना यह है कि जिस दिन भगवान का पर्व होता है उस दिन लोगों को दिखाने के लिए एक दिन पहले ही भगवान को सुसज्जित कर दिया जाता है। श्रृंगार होने के कारण उस दिन न तो भगवान का स्नान होता है, न पंचामृत पूजन, न अभिषेक। उस दिन तो बस दर्शनार्थियों को तिलक लगाओ कलावा बांधो ओर प्रसाद वितरण का कार्य मात्र रहता है।

कुछ लोग चोला तो उसी दिन चढाते हैं। परंतु इतने विद्वान होते हैं कि पुजनादि कार्य को बिलकुल महत्व नहीं देते। कुछ तो भी अडंग-बडंग पूजा कराते हैं। उनके लिए समंत्र पूजन और मंत्रात्मक् अभीषेक, सूक्तों के शुद्ध पाठ, पाठ के आवर्तनों की संख्यादि का कोई महत्व नहीं होता।

यदि तप, साधना, मंत्र, यंत्रादि का महत्व न हो तो भगवान का डेकोरेशन तो कोई एरा गैरा भी भगवा लूंगी पहन कर, कर सकता है। तिलक, चोंटी, जनेऊ से ब्राह्मण या पुजारी बन सकता है, पर ब्राह्मणत्व, दैवत्व साधना,तप और शास्त्रों की सेवा से आता है।

नमो नारायण पं आशीष दवे Ashish Dave (वार्ता) 11:54, 8 अक्टूबर 2019 (UTC)