सृष्टि जिसमें हम रह रहे हैं इसकी सर्वप्रथम उत्पत्ति जिस तरह हुई, तथा विकसित होते हुए वर्तमान स्थिति तक पहूँची और इसमें जो कुछ रचनाएं मौजूद है, इसे सुचारू रखने वाली जो शक्तियां हैं इन सबको मिलाकर सृष्टि रचना कहते हैं।[1]

वैज्ञानिकों के मतानुसार सृष्टि की रचना एक सर्वव्यापी विस्फोट के साथ हुई, जिसे वह बिग-बैंग की संज्ञा देते हैं।[2] इसके कारण ब्रह्माण्ड अब भी विस्तार पा रहा है।[3]

सृष्टि रचना का सर्व धर्मग्रंथों में भी वर्णन मिलता है। पुराण, गीता, बाइबल, कुरानगुरु ग्रंथ साहेब में सृष्टि रचना को वर्णित किया है। एक तरह से इन सभी धर्मग्रंथों में वर्णित सृष्टि रचना को एक दूसरे का पूरक भी माना जा सकता है।[4]

वेदों के अनुसार सृष्टि रचनासंपादित करें

वेदों के अनुसार सृष्टि की आदि में सत्, असत्, वायु, प्रकाश आदि कुछ नहीं था, उस समय भी वह था जो इन सबके बिना भी रह सकता है। उसी ने अपनी मौज से वे सभी रचनाएं की जिन्हें हम देख रहे हैं और वे भी जिन्हें हम देख नहीं पाते।[5]

महर्षि दयानंद ने वेदों को आधार बनाते हुए सृष्टि रचना को अपनी लिखित पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में उल्लेखित करने का प्रयास किया है। वह लिखते हैं कि जब सृष्टि का समय आता है तब परमात्मा उन परमसूक्ष्म पदार्थों को इकट्ठा करता है। उस को प्रथम अवस्था में जो परमसूक्ष्म प्रकृतिरूप कारण से कुछ स्थूल होता (बनता) है उस का नाम महत्तत्व और जो उस से कुछ स्थूल होता उस का नाम अहकांर से भिन्न-भिन्न पांच सूक्ष्मभूत श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, घ्राण तथा पांच ज्ञानेन्द्रियां वाक, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा, ये पांच कर्म-इन्द्रियां हैं और ग्यारहवां मन कुछ स्थूल उत्पन्न होता है। और उन पंचतन्मात्राओं से अनेक स्थूलावस्थाओं को प्राप्त होते हुए क्रम से पांच स्थूलभूत जिन को हम लोग प्रत्यक्ष देखते हैंए उत्पन्न होते हैं। उन से नाना प्रकार की ओषधियांए वृक्ष आदिए उन से अन्नए अन्न से वीर्य और वीर्य से शरीर होता है। परन्तु आदि सृष्टि मैथुनी नहीं होती क्योंकि जब स्त्री पुरुषों के शरीर परमात्मा बना कर उन में जीवों का संयोग कर देता है तदनन्तर मैथुनी सृष्टि चलती है। है।[6]

राधास्वामी पंथ के सन्तों के व धन-धन सतगुरू पंथ के सन्त के विचारसंपादित करें

‘‘पहले सतपुरुष निराकार था, फिर इजहार (आकार) में आया तो ऊपर के तीन निर्मलमण्डल (सतलोक, अलखलोक, अगमलोक) बन गया तथा प्रकाश तथा मण्डलों का नाद(धुनि) बन गया।[7]

‘‘प्रथम धूंधूकार था। उसमें पुरुष सुन्न समाध में थे। जब कुछ रचना नहीं हुई थी। फिरजब मौज हुई तब शब्द प्रकट हुआ और उससे सब रचना हुई, पहले सतलोक और फिरसतपुरुष की कला से तीन लोक और सब विस्त्तार हुआ।[8]

बाइबल के अनुसार सृष्टि रचनासंपादित करें

""केवल एक ही ईश्वर है जिसने काल के प्रारंभ में, किसी भी उपादान का सहारा न लेकर, अपनी सर्वशक्तिमान् इच्छाशक्ति मात्र द्वारा विश्व की सृष्टि की है। बाद में ईश्वर ने प्रथम मनुष्य आदम और उसकी पत्नी हव्वा की सृष्टि की और इन्हीं दोनों से मनुष्य जाति का प्रवर्तन हुआ। शैतान की प्रेरणा से आदम और हव्वा ने ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया, जिससे संसार में पाप, विषयवासना तथा मृत्यु का प्रवेश हुआ (द्र."आदिपाप")। ईश्वर ने उस पाप का परिणाम दूर करने की प्रतिज्ञा की और अपनी इस प्रतिज्ञा के अनुसार संसार को एक मुक्तिदाता प्रदान करने के उद्देश्य से उसने अब्राहम को यहूदी जाति का प्रवर्तक बना दिया।""[9]

ईश्वर ने छ: दिन में सृष्टि रची और सातवें दिन तख्त पर विराजमान हुए।[10][11]

अनुराग सागर में सृष्टि रचना की जानकारीसंपादित करें

कबीर साहेब रचित अनुराग सागर में सृष्टि रचना की जानकारी बखूबी दी गई है।[12] कबीर सागर के अनुराग सागर अध्याय में दी गई जानकारी में उन सभी जानकारियों का समावेश हो जाता है जो अन्य धर्मग्रंथों सहित तमाम स्रोतों से उपलब्ध होती है जो एक पूर्णता का एहसास कराती है।

संत रामपाल द्वारा सृष्टि रचना / सृष्टि उत्पत्ति की जानकारीसंपादित करें

संत रामपाल के अनुसार परमेश्वर ने सुक्ष्म वेद अर्थात् कबिर्वाणी में अपने द्वारा रची सृष्टी का ज्ञान स्वयं ही बताया है जो निम्नलिखित है।

सर्व प्रथम केवल एक स्थान 'अनामी (अनामय) लोक' था। जिसे अकह लोक भी कहा जाता है, पूर्ण परमात्मा उस अनामी लोक में अकेला रहता था। उस परमात्मा का वास्तविक नाम कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर है। सभी आत्माऐं उस पूर्ण धनी के शरीर में समाई हुई थी। इसी कविर्देव का उपमात्मक ( पदवी का) नाम अनामी पुरुष है ।अनामी पुरुष के रोम कूप का प्रकाश संख सूर्यों की रोशनी से भी अधिक है।

  विशेष :- जैसे किसी देश के आदरणीय प्रधान मंत्री जी का शरीर का नाम तो अन्य होता है तथा पद का उपमात्मक (पदवी का) नाम प्रधानमंत्री होता है। कई बार प्रधानमंत्री जी अपने पास कई विभाग भी रख लेते हैं। तब जिस भी विभाग के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हैं तो उस समय उसी पद को लिखते हैं। जैसे गृहमंत्रालय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करेगें तो अपने को गृह मंत्री लिखेगें वहाँ उसी व्यक्ति के हस्ताक्षर की शक्ति कम होती है।

इसी प्रकार कबीर परमेश्वर (कविर्देव) की रोशनी में अंतर भिन्न-२ लोकों में होता जाता है। ठीक इसी प्रकार पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ने नीचे के तीन और लोकों (अगमलोक, अलख लोक, सतलोक) की रचना शब्द (वचन) से की। यही पूर्णब्रह्म परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ही अगम लोक में प्रकट हुआ तथा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) अगम लोक का भी स्वामी है तथा वहाँ इनका उपमात्मक (पदवी का) नाम अगम पुरुष अर्थात् अगम प्रभु है । इसी अगम प्रभु का मानव सदृश शरीर बहुत तेजोमय है जिसके एक रोम कूप की रोशनी खरब सूर्य की रोशनी से भी अधिक है। यह पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबिर देव-कबीर परमेश्वर ) अलख लोक में प्रकट हुआ तथा स्वयं ही अलख लोक का भी स्वामी है तथा उपमात्मक ( पदवी का) नाम अलख पुरुष भी इसी परमेश्वर का है तथा इस पूर्ण प्रभु का मानव सदृश शरीर तेजोमय (स्वयोति) स्वयं प्रकाशित है। एक रोम कूप की रोशनी अरब सूर्यो के प्रकाश से भी ज्यादा है। यही पूर्ण प्रभु सतलोक में प्रकट हुआ तथा सतलोक का भी अधिपति यही है। इसलिए इसी का उपमात्मक (पदवी का) नाम सतपुरुष (अविनाशी प्रभु) है। इसी का नाम अकालमूर्ति - शब्द स्वरूपी राम - पूर्ण ब्रह्म , परम अक्षर ब्रह्म आदि हैं। इसी सतपुरुष कविर्देव (कबीर प्रभु) का मानव सदृश शरीर तेजोमय है। जिसके एक रोमकूप का प्रकाश करोड़ सूर्यों तथा इतने ही चन्द्रमाओं के प्रकाश से भी अधिक है। इस कविर्देव (कबीर प्रभु) ने सतपुरुष रूप में प्रकट होकर सतलोक में विराजमान होकर प्रथम सतलोक में अन्य रचना की। एक शब्द (वचन) से सोलह द्वीपों की रचना की। फिर सोलह शब्दों से सोलह पुत्रों की उत्पत्ति की। एक मानसरोवर की रचना की जिसमें अमृत भरा।

सोलह पुत्रों के नाम हैं :- (1) "कूर्म", (2)"ज्ञानी", (3) "विवेक", (4) "तेज", (5) "सहज", (6) "सन्तोष", (7)"सुरति", (8) "आनन्द", ( 9 ) "क्षमा ", (10) "निष्काम", (11) 'जलरंगी' (12)"अचिन्त", (13) "प्रेम", (14 ) "दयाल", (15) "धैर्य" ( 16) "योग संतायन" अर्थात "योगजीत"।

सतपुरुष कविर्देव ने अपने पुत्र अचिन्त को सत्यलोक की अन्य रचना का भार सौंपा तथा शक्ति प्रदान की। अचिन्त ने अक्षर पुरुष (परब्रह्म) की शब्द से उत्पत्ति की तथा कहा कि मेरी मदद करना। अक्षर पुरुष स्नान करने मानसरोवर पर गया, वहाँ आनन्द आया तथा सो गया। लम्बे समय तक बाहर नहीं आया।

तब अचिन्त की प्रार्थना पर अक्षर पुरुष को नींद से जगाने के लिए कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ने उसी मानसरोवर से कुछ अमृत जल लेकर एक अण्डा बनाया तथा उस अण्डे में एक आत्मा प्रवेश की तथा अण्डे को मानसरोवर के अमृत जल में छोड़ा। अण्डे की गड़गड़ाहट से अक्षर पुरुष की निंद्रा भंग हुई। उसने अण्डे को क्रोध से देखा जिस कारण से अण्डे के दो भाग हो गए। उसमें से ज्योति निरजन ( क्षर पुरुष) निकला जो आगे चलकर 'काल' कहलाया। इसका वास्तविक नाम "कैल" है। ज्योति निरंजन और अक्षर पुरुष को परमात्मा ने अचिंत के लोक में रहने को कहा।[13]

तब परमात्मा ने स्वयं सृष्टि रचना की। अपने शरीर से स्त्री-पुरुष को अपनी ही आकृति में उत्पन्न किया।

ज्योति निरंजन की इच्छा हुई कि 16 भाइयों की तरह उन्हें भी अलग लोक मिलना चाहिए तथा उसमें रचनाएं करने हेतु सामग्री और साथ रहने के लिए आत्माएं चाहिए। तब ज्योति निरंजन ने एक पैर पर खड़े होकर किया । तब परमात्मा ने उन्हें 21 ब्रह्मांड और रचना के लिए तीन गुण और पांच तत्व प्रदान किए। लेकिन आत्मा के लिए शर्त रखी कि जो आत्मा अपनी इच्छा से जाना चाहे जा सकता है। और आत्माओं को भी सचेत कर दिया लेकिन कुछ आत्माओं ने ज्योति निरंजन के साथ जाने की इच्छा जताई। तब परमात्मा ने सर्वप्रथम इच्छा जताने वाली आत्मा को स्त्री रूप दिया जो दुर्गा कहलाती है और अन्य सभी आत्माओं को उसमें प्रवेश कर दिया। तथा शब्द से सृष्टि उत्पन्न करने की शक्ति देकर ज्योति निरंजन के साथ भेज दिया।

ज्योति निरंजन ने दुर्गा (जो ज्योति निरंजन की छोटी बहन भी लगती थी )का निखरा हुआ रूप देखकर दुर्गा के ना चाहते हुए भी दुष्कर्म करना चाहा। तब परमात्मा ने ज्योति निरंजन को 21 ब्रह्मांड और दुर्गा सहित सतलोक से बाहर निकाल दिया। इस बात से नाराज़ होकर ज्योति निरंजन ने साथ आई आत्माओं को दुखी करना प्रारंभ कर दिया। तथा तीन गुणों को ब्रह्मा विष्णु महेश में प्रविष्ट कर आत्माओं को जाल में फंसाकर रखने लगा।[14]

यह देखकर परमात्मा बार-बार यहां आकर स्वसमवेद के रूप में अपना ज्ञान देकर आत्माओं को पुनः अपने निजी लोक जो सुखमय है जाने की राह बताते हैं । जो आत्मा इस ज्ञान को समझ जाते हैं वे सही मार्ग पाकर सतलोक को चले जाते हैं तथा ज्योति निरंजन के जाल से मुक्ति पा जाते हैं। इसी को पूर्ण मोक्ष कहा जाता है।[15]

मधुपरमहंस जी के अनुसार सृष्टि रचनासंपादित करें

आरम्भ में परम-पुरुष गुप्त थे, उनका न कोई साथी था, न संगी। एक समय उनकी मौज हुई और उन्होंने अंश उत्पन्न किये। सबसे पहले उन्होंने एक शब्द पुकारा और अद्भुत श्वेत प्रकाश उत्पन्न किया और स्वयं उस प्रकाश में समा गये। इस प्रकार प्रकाश जीवित हो गया। यही प्रकाश अमरलोक कहलाया अर्थात सत्पुरुष ही अमरलोक है।

फिर उन्होंने अपने में से प्रकाश को छिटका जो छोटी छोटी बिंदुएं बन गई। यही बिंदुएं वापस प्रकाशमय नहीं हुई और जीव कहलाई, जो प्रकाश अर्थात अमरलोक अर्थात सत्पुरुष में विचरण करने लगीं जैसे मछलियां समुद्र में।

फिर सत्पुरुष ने शब्दों से पुत्र उत्पन्न किए अर्थात वे शब्द बोल रहे थे और पुत्र उत्पन्न हो रहे थे।[16]

संदर्भसंपादित करें

  1. "क्या है सृष्टि, इसकी रचना कैसे हुई."
  2. "Big Bang: How the Universe was created". www.bbc.com (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2021-01-15.
  3. BBC, News. "News". BBC news.
  4. "सृष्टि रचना के मूल तत्व".
  5. "universe | किसे कहते हैं सृष्टि?". hindi.webdunia.com. अभिगमन तिथि 2021-02-16.
  6. आर्य, मनमोहन. "यह सृष्टि किसने कब व क्यों बनाई".
  7. जीवन चरित्रा परम संत बाबा जयमल सिंह जी महाराज. सृष्टि की रचना. नई दिल्ली: सावन कृपाल पब्लिकेशन. पपृ॰ 102–103.
  8. सारवचन. सृष्टि की रचना. दयालबाग, आगरा: राधा स्वामी सत्संग सभा. पृ॰ 8.
  9. उत्पत्ति पुस्तक.
  10. "बाइबिल से जानिए कैसे की ईश्वर ने सृष्टि की रचना..." hindi.webdunia.com. अभिगमन तिथि 2021-01-31.
  11. "14. बाईबल तथा पवित्र कुरान शरीफ में सृष्टी रचना का प्रमाण | Jagat Guru Rampal Ji". www.jagatgururampalji.org. अभिगमन तिथि 2021-01-31.
  12. "कबीर की रचना है अनुराग सागर".
  13. "सृष्टि की रचना कैसे हुई? (Srishti ki Rachna in Hindi) | Spiritual Leader Saint Rampal Ji Maharaj". अभिगमन तिथि 2021-02-01.
  14. "Hinduism: Genesis Creation | हिंदू धर्म : सृष्टि उत्पत्ति का क्रम". hindi.webdunia.com. अभिगमन तिथि 2021-02-01.
  15. "सृष्टी रचना | Jagat Guru Rampal Ji". www.jagatgururampalji.org. अभिगमन तिथि 2021-02-02.
  16. अनुराग सागर की वाणी (2011). साहिब कहते हैं. Deepawali printers, sodal read, pritnagar Jalandhar: Deepawali printers, sodal read, pritnagar Jalandhar. पपृ॰ 23, 24, 25.

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें