सैन्य मनोविज्ञान का उद्भव और विकास

सैन्य मनोविज्ञान का इतिहास बहुत पुराना है।

उद्भवसंपादित करें

अपने उदभव-काल से ही मानव निरन्तर संघर्ष करता रहा है। प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने के लिये उसने प्रकृति से संघर्ष किया , आत्म-रक्षा हेतु हिंसक पशुओं से संघर्ष किया , अपने कबीले , समाज , राज्य व देश की रक्षा हेतु आक्रमणकारी कबीले , समाज , राज्य व देश के विरुद्ध संघर्ष किया , तथा कभी-कभी स्वयं के अहंकार की तुष्टि के लिए एवं सम्पत्ति , नारी व राज्य-विस्तार के लोभ में दूसरों पर भी आक्रमण किया। इतना ही नहीं , विरोधी को शक्ति-हीन बनाने व स्वानुकूल परिस्थिति का निर्माण करने हेतु उसने मनोवैज्ञानिक अस्त्रों यथा --जन प्रवाद , प्रचार व मस्तिष्क-प्रक्षालन (brain washing) आदि का प्रयोग करना भी प्रारम्भ कर दिया । महाभारत से लेकर वर्तमान काल तक ऐसे अनेक दृष्टान्त द्रष्टव्य हैं ।

आचार्य शुक्र ने शुक्रनीति के चतुर्थ अध्याय के तीसवें श्लोक में शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश करते हुए कहा है कि “ शत्रु के सम्पूर्ण साधनों को हीन बना देना , शत्रु से अधिक बलशाली का आश्रय लेना एवं शत्रु से ही बलवालों को प्रबल बना देना चाहिए ।" इसके चौतीसवें श्लोक में विरोधी को नीति से अत्यधिक डराने तथा छत्तीसवें श्लोक में नीति को जानने वाले राजा को परामर्श दिया गया है कि राजा को हर एक उपाय से यही करना चाहिए कि उसके मित्र उदासीन तथा शत्रु राजा अपने से अधिक बलवान न होने पायें । उन्तालीसवें श्लोक में कहा गया है कि-शत्रु के प्रजा को साथ में करके या उनमें भेद डालकर शत्रु को पीड़ा पहुंचाना अपनी विजय का कारण होता है । ( लगता है " ऑपरेशन टोपाक " के माध्यम से पाकिस्तान कश्मीर में इसी नीति पर चल रहा है । )

इसी तरह, अर्थशास्त्र में आचार्य कौटिल्य ने आचार्य शुक्र की ही भांति मनोवैज्ञानिक युद्ध के अनेक स्वरूपों का उल्लेख किया है।

आधुनिक काल में इस विषय में पुस्तकाकार रूप सैन्य मनोविज्ञान में पहला केन्द्रित प्रयास हरबर्ट महोदय की 1897 में प्रकाशित पुस्तक "दि सायकोलाजी ऑफ दि टिल फील्ड" के रूप में ही उपलब्ध है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सैन्य मनोविज्ञानसंपादित करें

वास्तव में सैन्य मनोविज्ञान का उदभव प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उस समय हुआ जब बड़ी संख्या में सैनिकों द्वारा युद्धक्षेत्र छोड़कर भागने की समस्या के समाधान की आवश्यकता पड़ी । इस समस्या से निपटने के लिये एसे सैनिकों को युद्ध क्षेत्र से वापस बुलाने का निर्णय लिया गया जो कि मानसिक तनाव की स्थिति में युद्धभूमि से पलायन कर सकते थे । ऐसे सैनिकों की पहचान हेतु मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराये गये और इस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध के आरम्भ में पहली बार जर्मनी में छटनी की सैन्य-समस्या का समाधान करने के लिए मनोविज्ञान का आश्रय लिया गया । इसे ध्यान में रखते हुए सैन्य मनोविज्ञान के वर्तमान स्वरूप का उद्गम-स्थल जर्मनी माना जा सकता है ।

1917 में अमेरिका ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध क्षेत्र में उतरने का निर्णय लिया । इस समय सैनिकों के चयन की समस्या का समाधान करने के लिये " अमेरिकन सायकोलाजिकल एसोसियेशन " का भरपूर सहयोग मिला । इसके अध्यक्ष प्रो ० आर ० एम ० यर्कस को सेना में मेजर पद पर सम्मानित किया गया तथा उन्हें मनोवैज्ञानिक परीक्षण का दायित्व सौंपा गया । इस नियुक्ति के एक वर्ष के भीतर ही मिलिट्री मेडिकल आफिसर्स ट्रेनिंग कैम्प में " स्कूल ऑफ मिलिट्री सायकोलाजी " की स्थापना की गई । मनोवैज्ञानिकों की अनुशंसा पर विकसित बटालियनों ने परीक्षण के पश्चात् शारीरिक , मानसिक व नैतिक दृष्टि से अक्षम सैनिकों को कार्यमुक्त कर दिया । मनोवैज्ञानिकों की सम्पूर्ण सेना के मनोवैज्ञानिक परीक्षण की अनुमति दी गई । साथ ही युद्ध विभाग ने “ मनोवैज्ञानिक-सेवा " की स्थापना का निर्णय लिया । इससे मनोवैज्ञानिक परीक्षण योजना को बल मिला । कमीशन प्राप्त व गैर कमीशन प्राप्त सैन्य अधिकारियों व जवानों के चयन , वर्गीकरण एवं प्रशिक्षण को ध्यान में रखते हुए अनेक परीक्षण तैयार किये गये । मनोवैज्ञानिकों ने मानसिक दृष्टि से बीमार सैनिकों के उपचार में चिकित्सकों की सहायता की व सैन्यकर्मियों में यौद्धिक मानसिकता व नैतिक गुणों का विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया ।

प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के बीच सैन्य मनोविज्ञान का अमेरिका में अपेक्षित विकास न हो सका लेकिन विश्वविद्यालयों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण , तकनीक व सिद्धान्तों के निखार हेतु बराबर प्रयास किये जाते रहे , जो कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान काफी लाभदायक सिद्ध हुए ।

जर्मनी ने सैन्य मनोविज्ञान के महत्व को स्वीकार करते हुए , मनोवैज्ञानिक युद्ध के विभिन्न पक्षों पर कार्य को प्रोत्साहित किया । “ सम्पूर्ण युद्ध " के विचार ने सैन्य मनोविज्ञान को वास्तविक गति प्रदान किया । जर्मनी में " मिनिस्ट्री ऑफ प्रोपेगण्डा एण्ड सीक्रेट पुलिस " का गठन किया गया एवं चार डिवीजन गठित किये गये-

( 1 ) शोध ,
( 2 ) परीक्षण ,
( 3 ) प्रतिरक्षा मनोबल और
( 4 ) आक्रामक मनोबल ।

महायुद्धों के बीच के कालखण्ड में जर्मन मनोवैज्ञानिकों के नेतृत्व , चयन , शिक्षण , सैनिक-अधिकारी संबंध , होम सिकनेस , आत्महत्या , सेक्स , सनक का उपचार , कायरता तथा पलायन आदि की समस्याओं पर कार्य किया । बौद्धिक मनोविज्ञान में आक्रमण , मनोबल , भय , अकेलापन व आतंक को सम्मिलित किया गया । जर्मन मनोवैज्ञानिकों ने अनेक परीक्षण भी तैयार किये । महायुद्धों के बीच के युद्ध काल में इन प्रयासों के परिणामस्वरूप सैन्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में जर्मनी अमेरिका से आगे निकल गया ।

इंग्लैण्ड में 1918 में यद्यपि एफ ० सी ० बर्टलेट ने सैन्य मनोविज्ञान पर व्याख्यान प्रारम्भ किया । संक्रियात्मक थकान , बुद्धि परीक्षण , कार्य कौशल द अभिरुचि परीक्षण आदि पर विश्वविद्यालयों में मनोवैज्ञानिकों ने काफी कार्य किया लेकिन सैन्य प्रतिष्ठानों में सैन्य मनोविज्ञान का प्रवेश द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारम्भ तक न हो सका ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सैन्य मनोविज्ञानसंपादित करें

1939 में जिस समय द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ , सशस्त्र सेवाओं ने पुनः सैन्य मनोविज्ञान की आवश्यकता का अनुभव किया । इस क्षेत्र में अपनी पूर्व तैयारी के कारण जर्मनी विकसित मनोवैज्ञानिक तकनीकों को युद्ध कार्य हेतु सफलतापूर्वक प्रयोग करने की स्थिति में था । इस कारण अधिकारियों के चयन हेतु अभिरुचि परीक्षण व व्यक्तित्व-परीक्षण पर विशेष बल दिया गया , साथ ही जातीय चरित्र एवं वंश-परम्परा को भी ध्यान में रखा गया । सैन्य प्रशिक्षण का स्वरूप लक्ष्य को सामने रखते निर्धारित किया गया । युद्ध में छोटी इकाइयों के महत्व को स्वीकार किया गया व प्रशिक्षण में सैनिकों की व्यक्तिगत भागीदारी व अनुशासन को सुनिश्चित किया गया । सैनिकों की बर्दी का स्वरूप इस प्रकार निर्धारित किया गया कि उसे धारण करके सैनिक गर्व का अनुभव कर सकें । मनोबल-संवर्धन हेतु वैयक्तिक मूल्यों के विकास पर बल दिया गया तथा भाग्य के स्थान पर कर्म की वरीयता दी गई व प्रोपेगण्डा के महत्व को स्वीकारते हुए इसके प्रयोग पर विशेष ध्यान दिया गया ।

हालांकि दोनों विश्व युद्धों के बीच के काल खण्ड में अमेरिका ने सैन्य मनोविज्ञान के विकास पर विशेष ध्यान नहीं दिया था लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ होने के बाद उसने इस क्षेत्र में अपने प्रयासों को तीव्र कर दिया और शीघ्र ही जर्मनी के समक्ष आ पहुंचा । वहां 1940 में व्यक्तिगत चयन-पद्धति प्रारम्भ की गयी , जिसके लिये मनोविज्ञान में दक्ष सैन्य अधिकारियों की नियुक्ति की गयी । 1941 में आर्मी एयर सर्जन ने मनोवैज्ञानिक शाखा को विकसित किया : 1942 के प्रारम्भ में एविएशन सायकोलाजी सेक्शन का गठन किया गया । इन शाखाओं के सफल संचालन हेतु बड़ी संख्या में मनोवैज्ञानिकों को प्रशिक्षित किया गया ।

इस समय सैन्य मनोवैज्ञानिकों के समक्ष प्राथमिक समस्या चयनित अभ्यर्थियों के वर्गीकरण की थी । इस हेतु 1941 में एक शोध अनुभाग का विकास किया गया , जिसका कार्य वर्गीकरण एवं प्रशिक्षण की समस्याओं का निराकरण करना था । सैनिकों की मानसिक बीमारी के उपचार हेतु रोग विषयक मनोवैज्ञानिकों एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध , मनोबल एवं मनोवृत्ति से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु समाज-मनोवैज्ञानिकों की सेवायें ली गयीं ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सैनिकों को अनेक नवीन सैन्य आयुद्धो एवं उपकरणों का प्रयोग करना पड़ा , जिससे इनके दुरुपयोग की समस्या सामने आई । इस समस्या से निपटने के लिये प्रशिक्षण एवं उपकरणों की डिज़ाइन में सुधार हेतु मनोवैज्ञानिकों की सहायता ली गई । इस कार्य में दो नागरिक अभिकरणों- " नेशनल डिफेंस रिसर्च कमेटी तथा नेशनल रिसर्च कौंसिल " ने विशेष रुचि प्रदर्शित किया । इन अभिकरणों ने संचालन करने वाले की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उपकरणों की डिजाइन पर विशेष ध्यान दिया । उपकरणों के संचालन की दृष्टि से वर्गीकरण व प्रशिक्षण-प्रणाली में समुचित सुधार हेतु भी मनोवैज्ञानिकों की सहायता ली गयी ।

महायुद्ध के अन्त तक ब्रिटेन ने भी सैन्य मनोविज्ञान की उपयोगिता को स्वीकार कर लिया तथा वहां भी इसके समुचित विकास पर ध्यान दिया जाने लगा ।

सोवियत रूस में सैन्य मनोविज्ञान “ मिलिट्री सायको फिजिओलाजी " के नाम से आर्मी मेडिकल कोर के एक अंग के रूप में गतिशील थी तथा वहां तीनों ही सेनाओं की अपनी “ सायको फिजिओलाजिकल ” प्रयोगशालायें थीं । वहां बुद्धि , याददास्त , उपकरणों का प्रभाव , नेतृत्व एवं विशेषज्ञों के चुनाव , प्रशिक्षण क्षमता , समूह मनोविज्ञान व स्नायु रोग से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु सैन्य मनोविज्ञान की सहायता ली गई ।

भारत में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ‘ सर्विस सेलेक्शन बोर्ड ' ने कमीशन हेतु परीक्षण के समय मनोवैज्ञानिक सहायता ली ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बादसंपादित करें

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सैन्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई । विशेषकर अमेरिका में नये-नये संस्थान स्थापित किये गये । मनोवैज्ञानिक सेवाओं की आवश्यकता का अनुभव शान्ति-काल में भी किया गया । सैन्य मनोवैज्ञानिकों की सेवायें जारी रहीं । पचास के दशक में इस विषय पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें व लेख आदि प्रकाशित किये गये ।

सैन्य मनोविज्ञान से सम्बन्धित संगठनों का विस्तार किया गया , उदाहरणार्थ-शोध एवं विकास प्रमुख के अधीन गतिशील यू ० एस ० आर्मी परसोनेल रिसर्च आफिस की पहले “ यू ० एस ० आर्मी बिहैवियर साइंस रिसर्च लेबोरेट्री " के रूप में और बाद में आर्मी बिहेवियर एण्ड सिस्टेम लेबोरेट्री के अन्दर एक मनोवैज्ञानिक विभाग खोला गया । प्रेरणा , नेतृत्व , मनोबल तथा मनोवैज्ञानिक युद्ध पर शोध हेतु मानव संसाधन शोध कार्यालय की स्थापना की गई । एक “ विमानन मनोविज्ञान योजना का भी प्रारम्भ किया गया । उपकरणों की डिजाइन पर शोध हेतु 1951 में ह्यूमन लेबोरेट्री की स्थापना की गई ।

सैन्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में शोध को " दिहारलो कमेटी " की संस्तुति से और गति मिली तथा मनोवैज्ञानिक युद्ध पर शोध हेतु एक अलग संगठन बनाने का निर्णय लिया गया एवं मनोवैज्ञानिक संक्रियाओं , गुरिल्ला युद्ध , पलायन और बहानेबाजी , इंजीनियरिंग तथा प्रति-विप्लव पर विशेष शोध हेतु ' दि स्पेशल आपरेशन्स रिसर्च आफिस '( एस ० ओ ० आर ० ओ ० ) की स्थापना की गई । बाद में इसके कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत विदेश क्षेत्र तथा सामाजिक व्यवस्था , समूह अपसरण ( मास-डिफेक्शन ) समूह सम्प्रेषण , अफवाह , विप्लव तथा क्रान्तिकारी युद्ध को सम्मिलित कर लिया गया ।

भारतवर्ष में स्वतन्त्रता के पश्चात् रक्षा सेवाओं में मनोवैज्ञानिक शोध पर विशेष ध्यान दिया गया । 1949 में रक्षा मन्त्रालय एक मनोवैज्ञानिक शोध शाखा ( सायकोलाजिकल रिसर्च विंग ) की स्थापना की गयी , जिसका कार्य चयन की नवीन पद्धतियों को लागू कराना , मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का पुनरीक्षण करना तथा समय-समय पर उसकी वैधता की जांच करना था । रक्षा विज्ञान संगठन के अन्तर्गत इसे एक अन्तर सेवानिकाय के रूप में कार्य करना था तथा अन्य असैनिक संगठनों व मन्त्रालयों को उनकी भरती में सहयोग करना भी था ।

मनोवैज्ञानिक शोध शाखा के अन्तर्गत प्रारम्भ में इंटेलीजेन्स , अभिरुचि ( एप्टीट्यूट ) , व्यक्तित्व , समूह परीक्षण , अनुगमन ( फालोअप ) तथा प्रशिक्षण विद्यालय जैसे अनुभाग रखे गये । इस शाखा ने तीनों सेनाओं के अधिकारियों के चयन तथा व्यक्तित्व-वर्गीकरण ( तकनीकी शाखा ) से सम्बन्धित तकनीकी जानकारी प्रदान की । इसके अतिरिक्त इसने उड़ान के समय पायलट की क्षमता का मूल्यांकन , सैन्य अधिकारियों में गुणवत्ता-मापन व उड़ान प्रशिक्षण में क्षति को कम करने पर महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले ।

1950 में रक्षा मंत्रालय ने मानव-यन्त्र पद्धति पर मनोवैज्ञानिक शोध की आवश्यकता को स्वीकार किया । इस कार्य हेतु प्रारम्भ में रक्षा विज्ञान प्रयोगशाला में एक व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक शोध कक्ष की स्वीकृति मिली । बाद में कोचीन में नेवल सायकोलाजिकल रिसर्च यूनिट तथा रक्षा विज्ञान प्रयोगशाला के अन्तर्गत एक ह्यूमन आपरेटर रिसर्च यूनिट की स्थापना की गयी ।

1958 में रक्षा विज्ञान संगठन को रक्षा अनुसन्धान तथा विकास संगठन ( डिफेन्स रिसर्च एण्ड डेवलपमेन्ट आर्गनाइजेशन्स ) का नाम दिया गया । इसके अन्तर्गत जिन ग्यारह विषयों पर कार्य चल रहा है उसमें मनोविज्ञान भी सम्मिलित है । 1972 में इसे रक्षा मंत्रालय में चिकित्सा सेवा के डाइरेक्टर जनरल के सीधे प्रशासनिक नियन्त्रण में दे दिया गया । वायु सेना मुख्यालय पर मनोवैज्ञानिक शोध की एक छोटी इकाई भी कार्यरत है ।

समय-समय पर यह रक्षा-समस्याओं पर विचार-गोष्ठियों का आयोजन करता है जिसमें सम्बन्धित विषय के मूर्धन्य विद्वानों व प्रोफेसरों को आमन्त्रित किया जाता है । इस श्रृंखला के अन्तर्गत 1960 में सैन्य मनोविज्ञान पर पहली संगोष्ठी का आयोजन किया गया ।

वर्तमान स्थितिसंपादित करें

सैन्य मनोविज्ञान की उपयोगिता को देखते हुए विश्व के अनेक देशों ने इस विषय में विशेष रुचि का प्रदर्शन किया है । अमेरिका में थलसेना , नौसेना एव वायुसेना हेतु पृथक-पृथक मनोवैज्ञानिक शोध-संस्थान स्थापित किये गये है । वहां मनोवैज्ञानिक शोध की अधोलिखित आठ महत्वपूर्ण संस्थायें हैं -

1. दि आर्मी इंस्टीट्यूट फॉर दि बिहैवियरल एण्ड सोशल साइंस
2. ह्यूमन इंजीनियरिंग लेबोरेट्री
3. यू ० एस ० आर्मी मेडिकल रिसर्च लेबोरेट्री
4. यू ० एस ० आर्मी एरो मेडिकल रिसर्च लेबोरेट्री
5 आर्मी रिसर्च इस्टीट्यूट ऑफ इन्वायरनमेण्टल मेडिसिन
6. आर्मी मेडिकल डिपार्टमेन्ट
7. बिहेवियरल साइंस , अल्कोहल ड्रग एब्यूज प्रिवेन्शन एण्ड कन्ट्रोल प्रोग्राम, तथा
8. यू ० एस ० मिलिट्री अकेडमी , आफिस ऑफ मिलिट्री सायकोलाजी एण्ड लीडरशिप

ब्रिटेन में भी सेना के तीनों अंगों में मनोवैज्ञानिक सेवा के पृथक् विभाग है कुछ मामलों में वे एक दूसरे के साथ पूरा सहयोग करते हैं , विशेषकर-व्यवहार विज्ञान शोध-शाखा के साथ । ' सैन्य कार्मिक शोध विभाग ' चयन तथा अन्य मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर अनुसन्धान करता है । वहाँ रक्षा अनुसन्धान पर अधिकतर कार्य विश्वविद्यालयों एवं व्यावहारिक मनोविज्ञान की असैनिक संस्थाओं में किया जाता है रक्षा मंत्रालय विश्वविद्यालयों के साथ इस मामले में निकट सम्पर्क रखता है । इस कार्य हेतु सम्बन्धित को सरकारी सहायता भी दी जाती है ।

फ्रांस में सैन्य मनोविज्ञान के तीन केन्द्र हैं -

( 1 ) दि सेन्टर ऑफ सायकोलाजीकल स्टडीज एण्ड इंस्ट्रक्शन्स ऑफ दि एअरफोर्स एट वर्साइलस ।

( 2 ) दि सेन्ट्रल लेबोरेट्री ऑफ इण्डस्ट्रियल सायकोलाजी एण्ड सायकोमेट्री ऐट आममिण्ट सेण्ट क्लाउड । तथा ,

( 3 ) सायकोटेक्निकल एण्ड रिसर्च सेण्टर एट पेरिस ।

नार्वे में सशस्त्र सेना के अन्तर्गत मनोविज्ञान की एक छोटी इकाई है । डेनमार्क में तीनों ही सेनाओं के अलग-अलग मनोवैज्ञानिक शोध-संस्थान हैं । स्टॉकहोम में एक सैन्य मनोविज्ञान संस्थान हैं ।

युगोस्लाविया ने आर्मी मेडिकल एकेडमी इंस्टीट्यूट ऑफ अप्लायड सायकोलाजी एण्ड हाईजीन में सेनाओं की आवश्यकतानुरूप मनोवैज्ञानिक शोध की सुविधा उपलब्ध है । इराक , कुवैत तथा इटली में भी रक्षा कार्यों हेतु मनोवैज्ञानिकों की सहायता ली जाती है , लेकिन वहाँ उनका कार्य परामर्श देना है । कॉमनवेल्थ के देशो आस्ट्रिया , कनाडा , भारत तथा ब्रिटेन में सैन्य मनोविज्ञान की भूमिका रक्षा सेवाओं हेतु विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है । इन देशों के बीच ' कॉमनवेल्थ सर्विसेज सायकोलाजिस्ट ' नामक एक संगठन है जो अपने वार्षिक बैठक में वैज्ञानिक सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं तथा इससे सम्बन्धित पत्रिकाओं का भी प्रकाशन करते हैं ।