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स्कन्द महेश्वर निरुक्त के प्रमुख टीकाकारों में मान्य हैं। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इन्हें ऋग्वेद के सर्वाधिक प्राचीन भाष्यकार स्कन्दस्वामी से अभिन्न माना है।[1] परन्तु, डॉ॰ श्रीधर भास्कर वर्णेकर का कहना है कि निरुक्त-टीकाकार महेश्वर स्कन्दस्वामी से संबंधित होंगे। इसी कारण स्कन्द-महेश्वर नाम से उनका परिचय दिया जाता है।[2]

इस संबंध में एक विचारणीय तथ्य यह भी है कि आचार्य स्कन्द महेश्वर ने अपनी निरुक्त-टीका में ऋग्भाष्य से बहुत सहायता ली है। फिर भी, उद्गीथ भाष्य का मत स्कन्द महेश्वर को कुछ स्थानों पर स्वीकार्य नहीं हुआ है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि आचार्य उद्गीथ ऋग्भाष्यकार स्कन्दस्वामी के सहकारी थे और आदरणीय भी थे। इसलिए उद्गीथ-मत के विषय में अपनी अस्वीकृति का प्रतिपादन करते समय स्कन्द महेश्वर बड़ी सावधानी से शब्दयोजना करते हैं।[2]

इन्हें भी देखेंसंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

  1. वैदिक साहित्य और संस्कृति, आचार्य बलदेव उपाध्याय, शारदा संस्थान, वाराणसी, पुनर्मुद्रित संस्करण-2006, पृष्ठ-361.
  2. संस्कृत वाङ्मय कोश, प्रथम खण्ड, संपादक- डॉ॰ श्रीधर भास्कर वर्णेकर, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, तृतीय संस्करण-2010, पृष्ठ-489.

बाहरी कड़ियाँसंपादित करें