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स्वरूप दामोदर गोस्वामी चैतन्य महाप्रभु के सहाध्यायी और परम मित्र थे।

इनके पिता पद्मगर्भाचार्य थे। इनका जन्म नवद्वीप में सं. 1541 में हुआ और नाम पुरुषोत्तम रखा गया। यही संन्यास लेने पर स्वरूप दामोदर नाम से विख्यात हुए। यह श्रीगौरांग के सहाध्यायी तथा परम मित्र थे और उनपर बड़ी श्रद्धा रखते थे। श्रीगौरांग के अंतिम बारह वर्ष राधाभाव की महाविरहावस्था में बीते थे और इस काल में श्री स्वरूपदामोदर तथा राय रामानंद ही उन्हें सँभालते। इनके सुमधुर गायन से वह परम तृप्त होते थे। श्रीगौर के अप्रकट होने पर यह भी शीघ्र ही नित्यलीला में पधारे। इन्होंने गौरलीला पर एक काव्य लिखा था पर वह अप्राप्य है। कुछ श्लोक चैतन्य चरितामृत में उद्धृत हैं।