हरिदास सिद्धांत वागीश को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन १९६० में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। ये पश्चिम बंगाल राज्य से थे।

हरिदास सिद्धान्त वागीश 20वीं शताब्दी के मूर्धन्य नाटककार हैं । इनका समय 1876-1961 ई. है । ये महान आचार्य मधुसूदन सरस्वती के वंशज हैं । इन्होंने किशोरावस्था में ही (सर्वप्रथम 15वर्ष की अवस्था में) ‘कंसवध’ नाटक लिखा तथा 18 वर्ष की आयु में ‘जानकीविक्रम’ नाटक लिखा । इसी क्रम में इन्होंने ‘शंकरसंभवम्’, ‘शिवाजीचरितम्’, ‘वांगीयप्रतापम्’ इत्यादि नातक लिखे । ‘शंकरसंभवम्’, ‘शिवाजीचरितम्’, ‘वांगीयप्रतापम्’ इत्यादि नाटक लिखें । ‘रुक्मिणीहरणम्’ इनका महत्वपूर्ण महाकाव्य है तथा ‘वियोगवैभवम्’ एवं ‘विद्यावित्तविवादः’ खण्डकाव्य । इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘स्मृतिचिन्तामणिः’, ‘काव्यकौमुदी’ और ‘वैदिकविवादमीमांसा’ जैसे शास्त्रीय ग्रन्थ भी लिखें ।

‘विराजसरोजिनी’, ‘मिवारप्रतापम्’, ‘शिवाजीचरितम्’ एवं ‘वंगीयप्रतापम्’ इन चारों नाटकों में नृत्य एवं संगीत क् आप्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ है । ‘विराजसरोजिनी’ नाटक का आरम्भ नटी के नृत्य एवं संगीत से हुआ है । प्रथम अंक में नायिका और उसकी सखियों द्वारा गाया गीत श्रृंगार रस से ओत-प्रोत है । इसके प्रथम अंक में भील सैनिकों के गीत माध्यम से जहाँ आगामी घटनाओं की सूचना दी गई है वहीं मातृभूमि के प्रति भक्ति, निष्ठा एवं रक्षा के भाव को उजागर किया गया । जिससे वीर रस की निष्पत्ति में भी सहायता मिली है । इससे वीर सैनिकों की जीवन शैली का भी परिचय मिलता है तथा संगीत के प्रति उनकी रुचि पर भी प्रकाश पड़ता है कि किस प्रकार संगीत उनको मातृभूमि पर मिटने के लिये उत्प्रेरित करता है ।

‘शिवाजीचरितम्’ नाटक के प्रथम अंक में नायक के साथियों द्वारा गाए गए बालगीत में देशभक्ति की भावना मुखरित हुई है । द्वीतीय अंक में तोरण दुर्ग के विलासी अध्यक्ष करीमबख्श को पकड़ने हेतु शिवाजी द्वारा साधुवेश में अपने सैनिक रूपी नर्तकियों से नृत्य गीत करवाया गया है जिसमें वंशीवादन मुख्यतः नायक द्वारा हुआ है । यहाँ नृत्य एवं संगीत शत्रु को पकड़ने में सहायक सिद्ध हुए हैं ।

‘बङ्गीयप्रतापम्’ में भी नृत्य संगीत की योजना द्वारा आंतरिक भावों की अभिव्यक्ति हुई है । प्रथम अंक में शंकर नामक व्यक्ति द्वारा गाए गए गीत से यवनों द्वारा फैलाई गई अराजकता का चित्रण किया गया है । द्वितीय अंक मे श्रीनिवास नामक वैष्णव साधु के गीत में जीवन की कश्वरता और आध्यात्मिक साधना का वर्णन है । तृतीय अंक में विष्कंभक के प्रारंभ में धीवरों के प्राकृत गीत से नाटक की चारुता में वृद्धि हुई है । पंचम अंक में नृत्य गीत के आयोजन से विजयोल्लास को प्रकट किया गया है । इसी अंक में नवीन कन्याओं द्वारा गाए गए गीत में भावी घटना की व्यंजना है ।

पारिवारिक-सामाजिक विषय-वस्तु को लेकर ‘सरला’ नामक लघु उपन्यास इन्होंने लिखा है । हरिदास सिद्धान्त वागीशजी ने बंगला में भी कुछ पुस्तकें लिखी हैं । हरिदासजी जीनकपुर नरेश के टोल में प्राध्यापक रहे । इनके नाटकों में हिन्दुत्व का जातीय अभिमान और राष्ट्रीय पुनरुत्थान का प्रबल भाव है । रंगमंच की दृष्टि से इनके नाटक सफल हैं और कई बार अभिनीत किए गये हैं । युगानुरूप सरल और ओजस्वी गद्यविन्यास तथा भाषा के प्रवाह के कारण हरिदासजी की रचनाओं में सुपाठ्यता है ।